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वे सभी पलायनवादी ही हैं जो अपनी पत्नी-बच्चों को छोड़कर विदेशों में पड़े हुए हैं चंद रुपयों के लिए |

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Landmafia

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भारतवर्ष स्वयं एक पार्टी है और हर भारतीय सदस्य है उसका । संसद भवन केन्दीय कार्यालय है भारतीयों के प्रतिनिधियों का ।

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असामाजिक तत्त्व व नेताओं के पालतू गुंडे-मवालियों के संगठन में वही एकता होती है, जो लकड़बग्घों, सियारों, भेड़ियों, जंगली कुत्तों में होती है

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वे लोग भी राजनीती ही कर रहे होते हैं जो निष्क्रिय होते हैं या यह कहते हैं कि हमें राजनीती से कोई लेना देना नहीं

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साम्प्रदायिक धार्मिकों की रूचि नहीं होती देश व राज्यों के हितों में, उन्हें रूचि होती है मंदिर-मंदिर खेलने में, हिन्दू-मुस्लिम खेलने में, सवर्ण-दलित खेलने में |

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साम्प्रदायिकों की भीड़ सबसे बड़ी दिखाई देगी जब भी कहीं कोई मंदिर-मस्जिद का खेल चल रहा हो, जब भी कहीं कोई धार्मिक दिखावा व ढोंग का कार्यक्रम चल रहा हो

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डिग्रियाँ प्राप्त कर लेने मात्र से कोई शिक्षित नहीं हो जाता, शिक्षित होने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है | और गुरु का डिग्रीधारी होना अनिवार्य नहीं होता, क्योंकि जीवन की शिक्षा डिग्रियों से नहीं, अनुभवों से प्राप्त होती है |

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तो फिर प्रश्न उठता है कि जब कर्म धर्म नहीं है, रीतिरिवाज, धर्म नहीं है, पूजा-पाठ धर्म नहीं है, कर्त्तव्य धर्म नहीं है तो फिर धर्म है क्या ?

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किसी की नजर में मुफ्तखोर तो किसी की नजर में हरामखोर तो किसी की नजर में समाज और देश पर बोझ होते हैं संन्यासी

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