मेरी व्यक्तिगत धारणा है कि समाज जिसे न्याय समझता है वह न्याय नहीं है | धर्म और न्याय दोनों के ही वास्तविक परिभाषाओं को तिरोहित करके समाज ने नई ही परिभाषाएं गढ़ ली हैं इनकी | उदाहरण के लिए सम्प्रदायों, परम्पराओं, मान्यताओं को धर्म कहा…

अधिकांश गरीब अपने भाग्य को दोष देते हैं, सरकार और समाज को कोसते हैं और रोते-कलपते जीवन गुजारते हैं या फिर किसी नेता-बाबा का दुमछल्ला बन जाते हैं या फिर अपराध जगत में कदम रख देते है |

थाईलैंड का नागरिक भारतीय संस्कृति को धरोहर के रूप में नहीं सजा कर रखा, बल्कि आज भी अपने दैनिक जीवन में अपने आचरण से व्यक्त करता है

डिग्रियाँ प्राप्त कर लेने मात्र से कोई शिक्षित नहीं हो जाता, शिक्षित होने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है | और गुरु का डिग्रीधारी होना अनिवार्य नहीं होता, क्योंकि जीवन की शिक्षा डिग्रियों से नहीं, अनुभवों से प्राप्त होती है |

आइये आज मैं ऐसे शब्दों के आधुनिक अर्थ व परिभाषाएं बताता हूँ, जो भारतीय जनमानस के हृदय में बसता है, जिनके बिना भारतीय समाज का आस्तित्व नहीं

मैं साक्षरता के विरुद्ध नहीं हूँ और न ही विरुद्ध हूँ धार्मिकता के | साक्षर होना चाहिए हर इंसान को और धार्मिक भी | लेकिन न तो किताबी विद्वानों बने रहना लाभदायक है और नहीं किताबी धार्मिक बने से कोई भला होने वाला है

भीड़ में कोई किसी की फ़िक्र नहीं करता, सभी अपनी अपनी फ़िक्र में खोये हुए हैं और सभी इसी भ्रम में जी रहे हैं कि भीड़ के साथ हैं इसीलिए सुरक्षित हैं

त्यागी, बैरागी, करोड़पति, अरबपति साधू-संतों की तरह धन, स्त्री, ऐश्वर्य, भौतिक सुखों को अछूत नहीं मानता हूँ मैं | न ही त्यागी बैरागी साधू-संतों की तरह धन को हाथ नहीं लगाता स्वयं अपितु उसके लिय सेक्रेटरी, या सेवक रखता हूँ |

स्वयं की उपेक्षा मत कीजिए::: स्वयं ही स्वयं का आदर कीजिए ::::दूसरों के साथ भी प्रेमपूर्ण बर्ताव कीजिए

आपसे कहा जाता है कि जो पूर्वजों ने अपने अनुभवों से लिखा या कहा वही सही है और आप अपने अनुभवों से जो कुछ भी जानते समझते हैं वह गलत | इसका अर्थ तो यह हुआ कि प्राचीन काल के लोग हमसे अधिक बुद्धिमान व विद्वान थे ? इसका अर्थ तो यह हुआ कि उन्होंने जितना जाना, समझा, उससे आगे की यात्रा हमने की ही नहीं, उन प्राचीनकालीन विद्वानों के लेवल तक भी नहीं उठ पाए, बल्कि उस लेवल पर ही टिके रह गये, जिस लेवल के लोगों को वे विद्वान समझा रहे थे ?

मुझे आज भी दिल्ली के अंडे के पराठें अवश्य याद आते हैं | सर्दियों के दिनों में ये पराठें मेरी पहली पसंद हुआ करती थी | लेकिन आज मैं इन परांठों के विषय में सोच भी नहीं सकता क्योंकि तब मेरा भगवा कलंकित हो जाएगा

बचपन में एक गीत बहुत पसंद था मुझे, ‘गंगा तेरा पानी अमृत’ | जब भी गाँव में कोई धार्मिक या वैवाहिक समारोह होता था, तो लाउडस्पीकर मंगवाया जाता और यह गीत अवश्य बजता था और दिन में कई बार बजता था | मैंने कभी गंगा…