“पूजिए विप्र ज्ञान गुण हीना, शूद्र ना पूजिए ज्ञान प्रवीणा।”-तुलसीदास (रामचरितमानस) आज इन्टरनेट पर तुलसीदास रचित दोहे के इस अंश को खोजा तो पाया कि जितने भी दलित समाज उद्धारक हैं, सभी के पास अलग अलग रामचरितमानस है और सभी में दोहे भी अलग अलग…

दैत्य, दानव, पिशाच आदि उन्हें कहा जाता है, जिनके पास असीम शक्तियाँ होती हैं | अर्थात सत्ता और पुलिस जिनके सामने नतमस्तक रहती है

अधिकांश गरीब अपने भाग्य को दोष देते हैं, सरकार और समाज को कोसते हैं और रोते-कलपते जीवन गुजारते हैं या फिर किसी नेता-बाबा का दुमछल्ला बन जाते हैं या फिर अपराध जगत में कदम रख देते है |

वे सभी पलायनवादी ही हैं जो अपनी पत्नी-बच्चों को छोड़कर विदेशों में पड़े हुए हैं चंद रुपयों के लिए |

क्या आप किसी ऐसे धर्म या सम्प्रदाय का सहयोग करते हैं जो अपने सम्प्रदाय के लोगों को अत्याचार, शोषण व भुखमरी से बचाता हो ?

चूँकि अधिकाँश मानव प्रजाति सेक्स कुंठा से ग्रस्त है, और सभी को सही समय पर इसका अनुभव नहीं मिल पाता या योग्य साथी नहीं मिल पाता, इसलिए सेक्स विश्व का सबसे प्राचीन व शायद प्रथम व्यवसाय बना

अक्सर हम सुनते हैं कि धर्म खतरे में हैं | गली मोहल्लों से लेकर विश्वस्तर पर धर्म रक्षक बने लुच्चे लफंगों की सेनाएं तैनात हो रहीं हैं | हर किताबी रट्टामार धार्मिक इस बात पर बहुत ही गंभीरता से विश्वास करता है कि धर्म खतरे…

अक्सर देखता हूँ कि आध्यात्म और धर्म के नाम पर समाज दोहरी मानसिकता रखता है | जब भी आध्यात्म या धार्मिकता की बात आती है, तब समाज का व्यव्हार बिलकुल अलग होता है और जब विज्ञान व्यवहार की बात आती है तो बिलकुल अलग |…

एक बहुत ही बड़ा भ्रम पाल लिया है पढ़े-लिखों ने कि भौतिक सुख ही वास्तविक सुख है और बाकी सभी कुछ भ्रम है मिथ्या है | इनको लगता है कि इंसानों ने जो आविष्कार किये वे ही जीवन दायिनी हैं, बाकि सभी कुछ व्यर्थ |…

मेरे एक मित्र श्री D.r. Godara जी ने इस पुस्तक के विषय में जानकारी दी और मुझसे अपनी राय व्यक्त करने का आग्रह किया | मैंने पुस्तक के कुछ अंश पढ़े, लेकिन पूरी नहीं पढ़ी | फिर भी मैं इतना तो समझ ही चुका था कि पुस्तक के लेखक गोकुलजी, बहुत ही सुलझे विचारों वाले, पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं |

“सलाम,  “जनाब एक सवाल था , क्या गरीबी पूंजीवाद का एक महत्वपूण अंग है ??? मैंने कार्ल मार्क्स के कुछ विचार देखे है “YouTube” पर , जिसमे एक बात पे ज़ोर दिया गया है “गरीबी नसीब नहीं बल्कि एक साज़िश है” ! समय मिले तो…

क्या तुम मूर्ख हो जो विश्व के देशों में गरीबी-भुखमरी होते हुए भी अरबों रुपयों का अन्न,, दूध,, घी,, तेल बिना खाए ही नदी नालों में बहा देते हो???