कल संस्कृत के एक विद्वान् ने कहा मुझसे कि संस्कृत तो आती नहीं तुम्हें और सम्प्रदाय को परिभाषित करने निकले हो ? पता भी है तुम्हें कि सम्प्रदाय संस्कृत का शब्द है ? चाहो तो मैं तुम्हें संस्कृत पढ़ा सकता हूँ | मेरा उत्तर था…

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बचपन में जब किसी से मेरा झगड़ा हो जाया करता था, और गलती मेरी न भी होती तब भी मैं ही पिटता था | ऐसी ही एक घटना बताता हूँ आज: मुझे ही नहीं मेरे सभी भाई बहनों को पुस्तकें पढ़ने का बहुत ही बुरा…

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मैं यहाँ आपको भुत-प्रेत वशीकरण या उनके चमत्कारिक किस्से कहानियाँ नहीं सुनाने जा रहा | इन सबके लिए तो ढेर सारी पुस्तकें हैं, धार्मिक ग्रन्थ हैं, हदीसें हैं, पुराण हैं…..

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अधिकांश गरीब अपने भाग्य को दोष देते हैं, सरकार और समाज को कोसते हैं और रोते-कलपते जीवन गुजारते हैं या फिर किसी नेता-बाबा का दुमछल्ला बन जाते हैं या फिर अपराध जगत में कदम रख देते है |

थाईलैंड का नागरिक भारतीय संस्कृति को धरोहर के रूप में नहीं सजा कर रखा, बल्कि आज भी अपने दैनिक जीवन में अपने आचरण से व्यक्त करता है

वे सभी पलायनवादी ही हैं जो अपनी पत्नी-बच्चों को छोड़कर विदेशों में पड़े हुए हैं चंद रुपयों के लिए |

तो फिर प्रश्न उठता है कि जब कर्म धर्म नहीं है, रीतिरिवाज, धर्म नहीं है, पूजा-पाठ धर्म नहीं है, कर्त्तव्य धर्म नहीं है तो फिर धर्म है क्या ?

काम, क्रोध, लोभ मोह से हर धार्मिक, ब्राह्मण-पुरोहित, साधू-संत इतने भयभीत क्यों रहते हैं, इतनी घृणा क्यों करते हैं, कभी सोचा आप लोगों ने ?

लोग कार्लमार्क्स, बुद्ध, जीसस या अन्य किसी भी महान व्यक्तित्व के अनुयाई (follower) बनकर समझते हैं कि उन्होंने कोई महान कार्य कर लिया | जबकि उन्होंने सिवाय जय जय करने के, एक नया सम्प्रदाय खड़ा करने के कुछ नहीं किया

क्या तुम मूर्ख हो जो विश्व के देशों में गरीबी-भुखमरी होते हुए भी अरबों रुपयों का अन्न,, दूध,, घी,, तेल बिना खाए ही नदी नालों में बहा देते हो???

—●●●||| साकार बिना निराकार कैसे |||●●●—- साधना यदि इतनी आसान होती तो निराकार ब्रह्म को बार – बार साकार रूपों में इस धरा पर न आना पड़ता ।  विशुद्ध चैतन्य साधना तो बहुत ही आसान है केवल साधक नहीं हैं | ईश्वर को बार बार आना…

आपने किसी के कहने पर गुरु मान लिया क्या आपने उनकी उपयोगिता को परखा? अगर नहीं तो आप अंधभक्ति में लीन हैं | –सोनिका शर्मा कुछ घटनाएँ होती हैं जिन्हें हम नियंत्रित कर पाते हैं, लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसे होती हैं जो नियति तय करती…