अर्थात, धर्म की रक्षा करने पर ही सुरक्षित रहोगे | अब चूँकि धर्म के ठेकेदारों, धर्म रक्षकों और कट्टर धार्मिकों को ही धर्म का ज्ञान नहीं, धर्म से परिचय नहीं, इसीलिए धर्म की रक्षा करने की बजाय, सम्प्रदाय, पंथों के विचारधाराओं, मत-मान्यताओं, कर्मकांडों, तिलक-टोपी और…

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शब्दों के अर्थ और परिभाषाएं बदल चुके हैं अब | अब भक्त का अर्थ भक्ति नहीं, अंधभक्ति है | अब देशभक्ति का अर्थ देश के प्रति भक्ति नहीं, मोदी और भाजपा के प्रति भक्ति है | अब देशसेवा का मतलब देश की सेवा नहीं, पूंजीपतियों,…

इस दीवार को देखिए ! क्या आप अपने घर की दीवार इसी प्रकार रंगीन देखना पसंद करेंगे ? क्या आपके मित्र व परिचित ऐसी दीवार के पास बैठकर चर्चा करना पसंद करेंगे ? पर्सनल आईडी और फेसबुक पेज, दो अलग अलग उद्देश्यों के लिए होते…

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ईश्वर की भक्ति भिन्न भिन्न प्रकार से की जाती हैं, जैसे कि पूजा, प्रार्थना, कीर्तन, भजन, आरती, ध्यान, नमाज….आदि | ईश्वर की भक्ति पुर्णतः व्यक्तिगत विषय है और ईश्वर से संपर्क बनाने का एक माध्यम | भक्ति भाव और भावनाओं पर आधारित है और ईश्वर…

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कई बरस पहले एक आर्यसमाजी उपदेशक व प्रचारक के घर ठहरना हुआ मेरा | बहुत ही आदर सम्मान के साथ उन्होंने मेरे ठहरने की व्यवस्था की | लेकिन जब देर रात मुझे अचानक शौच जाने की आवश्यकता पड़ी तो, उन्होंने घर में बने शौचालय की…

संन्यास की अवधारणा पश्चिम में विकसित नहीं हो पायी, क्योंकि संन्यास को समझने के लिए जिस उच्च मानसिक स्थिति की आवश्यकता होती है, जिस मुक्तता व स्वतंत्रता के भाव की आवश्यकता होती है, वह विकसित नहीं हो पायी थी पश्चिम में तब तक | लेकिन…

मेरी व्यक्तिगत धारणा है कि समाज जिसे न्याय समझता है वह न्याय नहीं है | धर्म और न्याय दोनों के ही वास्तविक परिभाषाओं को तिरोहित करके समाज ने नई ही परिभाषाएं गढ़ ली हैं इनकी | उदाहरण के लिए सम्प्रदायों, परम्पराओं, मान्यताओं को धर्म कहा…

दैत्य, दानव, पिशाच आदि उन्हें कहा जाता है, जिनके पास असीम शक्तियाँ होती हैं | अर्थात सत्ता और पुलिस जिनके सामने नतमस्तक रहती है

राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों के भक्त और अनुयायी नहीं होते, केवल समर्थक होते हैं, चापलूस होते हैं, चाटुकार होते हैं |

अधिकांश गरीब अपने भाग्य को दोष देते हैं, सरकार और समाज को कोसते हैं और रोते-कलपते जीवन गुजारते हैं या फिर किसी नेता-बाबा का दुमछल्ला बन जाते हैं या फिर अपराध जगत में कदम रख देते है |

पिछले कुछ वर्षों से देख रहा हूँ कि समाज घृणा व द्वेष में ऐसा डूबा कि होश ही खो बैठा | ऊपर से सोशल मिडिया ने और बर्बाद कर दिया