तो फिर प्रश्न उठता है कि जब कर्म धर्म नहीं है, रीतिरिवाज, धर्म नहीं है, पूजा-पाठ धर्म नहीं है, कर्त्तव्य धर्म नहीं है तो फिर धर्म है क्या ?

यदि आपकी मान्यताओं व धारणाओं के विरुद्ध कोई हो, तब उसके विचार या व्यक्तित्व कितने ही अच्छे क्यों न हों, कितने ही कल्याणकारी क्यों न हों, आपको प्रभावित नहीं कर पाएंगे

Definition of Humanity

किसी को लगता है कि उसका मजहब ही मानवता सिखाता है और बाकी सभी मजहब पशुता या दानवता सिखाते हैं | किन्तु परिभाषा किसी को नहीं पता |

बीबीसी न्यूज़ की एक हेडिंग; चीन की ऐसी ‘जेल’ जहां बंद हैं दस लाख मुसलमान? पर नजर पड़ी तो सहसा ही स्क्रोल करते-करते ठहर गया. पूरा लेख पढकर और कुछ खोजबीन की तो और भी कई लेख मिले इसी विषय से सम्बंधित | उन्हें भी…

हज़ार वर्ष पहले जिस प्रकार ऐसी ही मानसिकता के लोगों ने देश को विदेशियों के हाथों बेच दिया, उन्हें समर्थन देकर क्या आप पुनः यह सिद्ध करना चाहते हैं कि हिन्दुओं के पास बुद्धि-विवेक का आभाव है ?

मैं साक्षरता के विरुद्ध नहीं हूँ और न ही विरुद्ध हूँ धार्मिकता के | साक्षर होना चाहिए हर इंसान को और धार्मिक भी | लेकिन न तो किताबी विद्वानों बने रहना लाभदायक है और नहीं किताबी धार्मिक बने से कोई भला होने वाला है

मैं जानता हूँ कि मेरे इस लेख को पढ़कर आप मुझे गालियां देंगे, मुझे नारीविरोधी कहेंगे, इस लेख को स्त्री जाति का अपमान मानेंगे…..मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता…

आपके खून पसीने की मेहनत से खड़ी की कम्पनी कुछ ही दिनों बाद आपकी नहीं रह जाती, बल्कि आप खुद उस कम्पनी के नौकर बनकर रह जाते हैं…..क्या आप इसे कम्पनी और स्वयं का उत्थान कहेंगे ?

आपसे कहा जाता है कि जो पूर्वजों ने अपने अनुभवों से लिखा या कहा वही सही है और आप अपने अनुभवों से जो कुछ भी जानते समझते हैं वह गलत | इसका अर्थ तो यह हुआ कि प्राचीन काल के लोग हमसे अधिक बुद्धिमान व विद्वान थे ? इसका अर्थ तो यह हुआ कि उन्होंने जितना जाना, समझा, उससे आगे की यात्रा हमने की ही नहीं, उन प्राचीनकालीन विद्वानों के लेवल तक भी नहीं उठ पाए, बल्कि उस लेवल पर ही टिके रह गये, जिस लेवल के लोगों को वे विद्वान समझा रहे थे ?

मुझे आज भी दिल्ली के अंडे के पराठें अवश्य याद आते हैं | सर्दियों के दिनों में ये पराठें मेरी पहली पसंद हुआ करती थी | लेकिन आज मैं इन परांठों के विषय में सोच भी नहीं सकता क्योंकि तब मेरा भगवा कलंकित हो जाएगा

भ्रष्ट नेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों में कोई आपका रिश्तेदार होगा, कोई अपनी जात, धर्म, पार्टी या गाँव का होगा । अब अपनों का बहिष्कार भला कोई कर सकता है ?