आतंकवाद की घटना निश्चित रूप से उस सबसे जुडी़ है , जो समाज में हो रहा है। समाज बिखर रहा है। उसकी पुरानी व्यवस्था , अनुशासन, नैतिकता, धर्म सब कुछ गलत बुनियाद पर खडा़ मालूम होता है। लोगों की अंतरात्मा पर अब उसकी कोई पकड़…

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ईश्वर की भक्ति भिन्न भिन्न प्रकार से की जाती हैं, जैसे कि पूजा, प्रार्थना, कीर्तन, भजन, आरती, ध्यान, नमाज….आदि | ईश्वर की भक्ति पुर्णतः व्यक्तिगत विषय है और ईश्वर से संपर्क बनाने का एक माध्यम | भक्ति भाव और भावनाओं पर आधारित है और ईश्वर…

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कई बरस पहले एक आर्यसमाजी उपदेशक व प्रचारक के घर ठहरना हुआ मेरा | बहुत ही आदर सम्मान के साथ उन्होंने मेरे ठहरने की व्यवस्था की | लेकिन जब देर रात मुझे अचानक शौच जाने की आवश्यकता पड़ी तो, उन्होंने घर में बने शौचालय की…

बचपन में जब किसी से मेरा झगड़ा हो जाया करता था, और गलती मेरी न भी होती तब भी मैं ही पिटता था | ऐसी ही एक घटना बताता हूँ आज: मुझे ही नहीं मेरे सभी भाई बहनों को पुस्तकें पढ़ने का बहुत ही बुरा…

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कुम्भमेला का बहुत ही महत्व है और विशेषकर मौनी अमावस्या स्नान का | एक धारणा बना दी गयी है कि मौनी अमावस्या के स्नान से अश्वमेघ यज्ञ से दोगुना फल प्राप्त होता है | उसपर गंगा स्नान से सारे पापों से मुक्ति मिल जाती है…

भक्ति दौलत की मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होतीपुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होतीगद्दारी, लोभ की मुट्ठीसबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे बिठाए पकड़े जाना बुरा तो हैसहमी सी चुप्पी में जकड़े जाना बुरा तो हैपर सबसे ख़तरनाक नहीं होती सबसे ख़तरनाक होता हैमुर्दा…

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सिवाय किताबी धार्मिकों व धर्मगुरुओं के सभी दार्शनिक व अध्यात्मिक गुरु यही कहते हैं, कि “स्वयं को जानो”, “स्वयं को समझो”, “स्वयं के विवेकानुसार निर्णय लो” | लेकिन कम ही लोग दुनिया में ऐसे होते हैं जो स्वयं की सुनते हैं | जानने समझने की…

सामान्यतः यही माना जाता है कि स्वच्छता और पवित्रता परस्पर पर्यायवाची शब्द हैं, जबकि ऐसा नहीं हैं | दोनों में बहुत अंतर है | स्वच्छता वास्तव में बाह्य मैल, कूड़ा-करकट व विचारों से मुक्ति को कहा जाता है | जैसे स्थान की स्वच्छता, शरीर की…

संन्यास की अवधारणा पश्चिम में विकसित नहीं हो पायी, क्योंकि संन्यास को समझने के लिए जिस उच्च मानसिक स्थिति की आवश्यकता होती है, जिस मुक्तता व स्वतंत्रता के भाव की आवश्यकता होती है, वह विकसित नहीं हो पायी थी पश्चिम में तब तक | लेकिन…

बड़े गर्व से कहते सुनता हूँ लोगों से, “हम तो फलाने के भक्त हैं…..हम तो फलाने के अनुयायी हैं….!” लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि आप वास्तव में भक्त या अनुयायी हैं भी या नहीं ?? चलिए मान लेते हैं कि आप किसी नेता…

मेरी व्यक्तिगत धारणा है कि समाज जिसे न्याय समझता है वह न्याय नहीं है | धर्म और न्याय दोनों के ही वास्तविक परिभाषाओं को तिरोहित करके समाज ने नई ही परिभाषाएं गढ़ ली हैं इनकी | उदाहरण के लिए सम्प्रदायों, परम्पराओं, मान्यताओं को धर्म कहा…