बचपन में फ़कीर या संन्यासी की रूपरेखा जो मेरे मन बस गयी थी, वह कुछ वैसा था जो सदैव प्रसन्नचित रहता है, हँसता, गाता, नाचता अपनी धुन में मगन रहता है | जब भी उनकी कोई तस्वीरें देखता तो ऐसा लगता था कि उनके जीवन…

संन्यास एक ऐसी अवस्था होती है, जहाँ पहुंचकर आप वह सब देख व समझ पाते हैं, जो समान्य जीवन जीते हुए नहीं समझ पाते | हम यह कभी चिन्तन नहीं कर पाते अपनी दैनिक जीवन के उलझनों में कि समाज हमेशा समर्थ की सहायता को…

कई प्रयोग करते हुए निरंतर बढ़ा चला जा रहा हूँ, लेकिन मेरा प्रयोग केवल मेरे लिए है | मेरे अपने ही आध्यात्मिक उत्थान के लिए | बिलकुल वैसे ही जैसे कोई ऋषि बियाबान में ध्यान करता रहता है, मैं समाज में रहकर ध्यान कर रहा…

भीतर था कोई कहता था कि ये लोग गलत राह पर हैं, लेकिन तुम सही राह पर हो..बेशक तुम आज अकेले हो इसलिए दुनिया तुम्हें गलत मान रही है क्योंकि बहुमत गलत लोगों के साथ है

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 मैं शायद ऐसा व्यक्ति हूँ जो कभी किसी की समझ में नहीं सकता क्योंकि मैं अंधों की उस दुनिया में रहता हूँ जिसके लिए हाथी को समग्रता से देख व समझ पाना लगभग असंभव होता है | कोई हाथी को उसके पैर से जानता है…

न तो कोई स्त्री अधिक समय तक अच्छी लगती है भले ही कितनी सुंदर क्यों न हो, न ही कोई रिश्ते अच्छे लगते हैं | बस वही लोग अच्छे लगते हैं, जिनके सामने आपको मुखौटा लगाकर न रहना पड़े

अक्सर आपने देखा होगा कि कुछ लोग साधना करते हैं | समाज उन्हें साधक के नाम से जानता है | कई बार आपने देखा होगा कि कोई व्यक्ति कहता है कि मैं फ़लाने देवी-देवता की साधना करने जा रहा हूँ, या मन्त्र साधने जा रहा…

‘सभी ऊँची जाति वालो को लगता है की आरक्षण खत्म कर देना चाहिए। मैं भी सोचता हूँ की आरक्षण अब खत्म ही हो जाये तो आईये आरक्षण खत्म करते हैं…….. -शंकराचार्य की कुर्सी पर ब्राह्मण का आरक्षण है, उसे खत्म करें और कुछ सालो के…

गुरु जी आप महान है। लेकिन ये महानता कब एकत्र होगी ओर देश का कल्याण होगा। सभी तरफ गलत ही गलत है। हम सिर्फ अपने को सुधार सकते ओर रहै है लेकिन कुछ नही कर सकते । न भक्त सिंह बन सकते ओर न गांधी…

Alma Deutscher शौक यानि हॉबी को हम सेकंडरी चीज मानते हैं | समय मिला तो कर लिया, नहीं तो और भी ज़रूरी काम है ज़माने में | मैं ऐसा नहीं मानता था, लेकिन मेरे पिताजी, मेरे अड़ोसी-पड़ोसी ऐसा ही मानते थे | मुझे शौक था…

अक्सर देखता हूँ कि लोग सत्य खोजने निकले हैं | वे खोज रहे हैं कि रामायण के पात्र वास्तविक थे कि काल्पनिक, महाभारत के पात्र वास्तविक थे कि काल्पनिक, क़ुरान, बाइबल के पात्र वास्तविक हैं या काल्पनिक | तो पुरातत्ववेताओं की खोजों और शोधपत्रों को…

“मैं भौतिक और अध्यात्मिक जगत के बीच सेतु बनाना चाहता हूँ |” -ठाकुर दयानन्द देव (१८८१-१९३७) यही एक लाइन थी, जिसने मुझे इनके आश्रम में खींच लिया क्योंकि यही है सच्ची शिक्षा और जो ऐसा कह सकता है, वही सही मायने में सही गुरु है…