सर्जिकल स्ट्राइक

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कई हज़ार वर्ष पुरानी बात है | रामराज्य नामक एक देश में बहुत अराजकता फैली हुई थी | जनता ‘मैं सुखी तो जग सुखी’ के सिद्धांत को आत्मसात कर चुकी थी और यह भाव उनके खून में भी इस तरह जड़ें जमा चुकी थी कि बच्चे भी उसी भाव के साथ जन्म लेने लगे | लोग किसी को पानी भी पिलाते तो लाभ-हानि देखकर पिलाते, भलाई भी करते तो दस गुना अधिक लाभ होगा इस बात की गारंटी मिलने पर ही करते | शादी-ब्याह से लेकर माँ-बाप से रिश्ते तक व्यापारिक आधार पर तय होने लगे | परिणाम यह हुआ कि राजा भी उसी नस्ल का और राजकीय अधिकारी और मंत्रीगण भी उसी नस्ल के | तो कमजोरों की रक्षा व सहयोग करने की जिम्मेदारी किसी की भी नहीं थी सब अपनी अपनी चिंता करने में लगे हुए थे | व्यापारीगण मंत्रियों राजकीय अधिकारीयों को मोटा कमीशन देकर किसानों और आदिवासियों की जमीनों पर कब्ज़ा ज़माने लगे हुए थे विकास के नाम पर | जो विरोध करता उसे राजा के सैनिक गोलियों से छलनी कर देते क्योंकि कुछ हो न हो, विकास होना आवश्यक था |
जिनकी भूमि से खनिज व कोयला निकलता वही बेघर हो जाता या नक्सली की उपाधि देकर मार दिया जाता | क्योंकि अपनी भूमि की रक्षा करना, उसे लुटने से बचाना नक्सलवाद माना जाता था | एक प्रकार से अपने ही देश में लोग अपनी ही भूमि बचाने के लिए संघर्ष कर रहे थे और राजा के सैनिक उनको खोज खोज कर मार रहे थे | और यह सब केवल इसलिए हो रहा था क्योंकि हर कोई स्वार्थी हो चुका था | अपने पड़ोसी की भी सहायता न करने की मानसिकता के कारण बाहर से लोग आकर मंत्री से लेकर राजा तक को खरीद लेते और फिर बिना युद्ध किये ही उस देश के किसानों और आदिवासियों की भूमि में कब्ज़ा जमा लेते, वह भी उसी देश के सैनिकों के दम पर | एक एक कर खेत और जंगल लुप्त होते चले जा रहे थे, लेकिन राजा मगन था विदेश-यात्राओं में और मंत्री व अधिकारी मस्त थे अय्याशियों में |

प्रजा की सहनशक्ति अब टूटने लगी थी और हर जगह राजा के विरुद्ध विद्रोह उभरने लगे थे | इससे दूसरे देशों में भी राजा को शर्मिंदा होना पड़ रहा था | धर्म और नैतिकता के ठेकेदारों, मंत्रियों, अधिकारीयों को भी चिंता सताने लगी थी कि अगर ऐसे ही हम खामोश बैठे रहे, तो हमारे विकास का क्या होगा ? हमारे घर में अभी दस एसी लगे हुए हैं… आशा थी कि देशी-विदेशी उद्योगपतियों को किसानों और आदिवासियों की भूमि बेचकर जो लाभ मिलेगा उससे दस पन्द्रह एसी और लगाकर हम और विकास कर लेते | वेतन मान का भी विकास होता और हमारी अय्याशियों का भी विकास होता | लेकिन यहाँ जनता भूमि पर कब्ज़ा करने से पहले ही विद्रोह पर उतर आती है | जबकि सबको गौमाता की कसम खाकर विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि तुम लोग बेघर हो जाओ हम तुमको स्थाई गुलाम बना लेंगे, लेकिन ये मुर्ख ग्रामीण मान ही नहीं रहे | अभी हाल ही में राँची में सर्जिकल स्ट्राइक करना पड़ा और पाँच-सात लोग मारे गये और सत्तर से अधिक घायल हो गये | पहले भी हमने कितने लोगों को नक्सली बनाकर मोक्ष दिलवा दिया लेकिन ये लोग सुधरने को ही तैयार नहीं है | ऐसे में तो हमारी सत्ता भी खतरे में पड़ सकती है |

तो सभी राजा के पास गये और अपनी चिंता से उन्हें अवगत करवाया | राजा भी चिंतित हो गया क्योंकि उन्हें तो पता ही नहीं था कि देश में कोई समस्या भी है… वे तो देशाटन में ही व्यस्त रहे देश की समस्याओं को सुनने देखने का कभी समय ही नहीं मिला | फिर इतने सारे नगरसेठ जो उनके मित्र थे, उनके लिए विदेशों में मार्केटिंग की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधो पर थी | उन्हें भी लगा कि समस्या गंभीर हो गयी है और कोई समाधान भी नहीं सूझ रहा | तभी राजपुरोहित ने एक सुझाव रखा कि क्यों न हम धर्म की रक्षा के लिए लोगों को प्रेरित करें ? यदि धर्म सुरक्षित रहेगा तो सभी सुरक्षित रहेंगे | सभी ने आश्चर्य से राजपुरोहित की ओर देखा कि ये धर्म बीच में कहाँ से आ गया ?

राजपुरोहित ने समझाया कि हम धर्म की रक्षा के नाम पर सभी को आपस में ही उलझा देंगे | हिन्दू को मुस्लिमों विरुद्ध, मुस्लिमों को हिन्दुओं के विरुद्ध, दलितों को ब्राहमणों के विरुद्ध और ब्राह्मणों को दलितों के विरुद्ध…. बस सभी अपने अपने धर्मों की रक्षा में उलझ जायेंगे और हम लोग आराम से अपनी अय्याशी में डूबे रहेंगे |

सभी को राजपुरोहित की बात में वजन दिखाई दिया और बस फिर क्या था…. बहुरूपियों को बुलाकर समाज में धर्म की रक्षा के लिए फूट डालने की जिम्मेदारी सौंप दी गयी | देखते ही देखते लोग आपस में ही लड़ने मरने लगे, अब किसी को मारने के लिए सेना भी नहीं भेजनी पड़ती थी….अब राजा, मंत्री और अधिकारी चैन से बैठे तमाशा देख रहे थे और जनता मूल समस्या भूलकर आपस में ही लड़-मर रही थी धर्म की रक्षा के लिए |

लेकिन कुछ ही दिनों बाद जनता को समझ में आ गया कि इस मुर्खता से उन्ही का नुक्सान हो रहा है जबकि लाभ कुछ नहीं हो रहा | तो जनता फिर एकजुट होनी शुरू हुई अत्याचार व शोषण के विरुद्ध | इसी समय राजा को पता चला कि पड़ोसी शत्रु देश के राजा ने स्पेशल बिरयानी बनवाई है, तो राजा सारी शत्रुता भुलाकर पहुँच गये पडोसी देश के राजा के पास क्योंकि उन्हें बिरयानी बहुत पसंद थी | वहीँ राजा ने अपने देश की समस्या रखी पड़ोसी देश के राजा के पास | वह राजा भी ऐसी ही समस्या से परेशान था तो दोनों ने तय किया कि धर्म की रक्षा वाला फार्मूला अब काम नहीं करेगा, इसलिए देश की रक्षा की बात की जाए | तो पडोसी देश के राजा ने सुझाव दिया कि हम तो आपके देश में आतंकी भेजकर सर्जिकल स्ट्राइक करवाते ही रहते हैं, आप भी किसानों और आदिवासियों पर सर्जिकल स्ट्राइक करवाते ही रहते हैं, लेकिन कोई बहुत बड़ी कामयाबी नहीं मिलती | क्यों न इस बार हम आपके सैनिक केम्प पर हमला करें तो आप अपने पालतू मीडिया से उसे हाईलाइट करवा दें ? आपसे पहले जो राजा था वह तो मुर्ख था…. कभी मीडिया में हाईलाइट नहीं करता था हमारी मेहनत से तैयार किये गये आतंकियों की कुर्बानियों को | इससे लाभ यह होगा कि हर को देशभक्ति में डूब जाएगा और हम दोनों एक दूसरे पर कीचड उछालकर प्रजा को भरमाये रहेंगे | इससे आपकी भी समस्या सुलझ जाएगी और हमारी भी | आप आराम से आदिवासियों किसानों की जमीन पर कब्ज़ा करते रहें और हम अपनी अय्याय्शी में डूबे रहें |

राजा को यह सुझाव बहुत पसंद आया…. तुरंत बिरयानी समाप्त किया और वापस लौट आये | उसके बाद से हर आये दिन सैनिकों के केम्प पर हमले होने लगे और मीडिया और जनता देशभक्ति में डूब गयी | जगह जगह सर्जिकल स्ट्राइक होने लगे… सैंकड़ों की संख्या में आतंकवादी मरने लगे… लेकिन आश्चर्य की बात यह कि किसी की भी लाश नहीं मिलती थी | साइलेंसर लगे हेलिकॉप्टर का प्रयोग किया जा रहा था सर्जिकल स्ट्राइक के लिए, इसलिए उस जगह रहने वालों को भी हेलिकॉप्टर के आने का पता नहीं चलता था, जहां हेलिकॉप्टर से सैनिक उतरते थे | लेकिन दोनों देश की, मीडिया खुश थी क्योंकि टीआरपी बढ़ रही थी, शहरी खुश थे क्योंकि शत्रु देश को सबक सिखाया जा रहा है, भूमाफिया, बिल्डर, अधिकारी, मंत्री, उद्योगपति… सभी खुश थे | बस दुखी थे जो आदिवासी, किसान क्योंकि इस सर्जिकल स्ट्राइक में उनके अपने खो रहे थे, उनकी जमीने खो रही थी, उनके जंगल खेत खो रहे थे और सबसे बड़ी बात यह कि उन्हें अपनों की लाशें भी मिल रहीं थी |

यह सब देख राजा को समझ में आया कि यदि देश का विकास करना है तो आतंकवाद, युद्ध, धार्मिक उन्माद, दंगे-फसाद कितने आवश्यक हैं | बिना ये सब किये देश का विकास हो ही नहीं सकता | राजा को यह भी समझ में आया कि प्रजा को युद्ध, हिंसा, मारकाट आदि में रूचि है या फिर क्रिकेट में | तो ये दोनों चीजें चलती रहें तो प्रजा खुश रहेगी और हमारा विकास भी हो जाएगा | न गरीब बचेंगे देश में, न खेत, न किसान, न आदिवासी, न जंगल… हर तरफ कंक्रीट के जंगल होंगे और उन कंक्रीट के जंगलों में रहेंगे उनके गुलाम और वे लोग जो उनके समर्थन में रहेंगे | युद्ध करके ही एक देश इतना अमीर हो गया कि खुद को दुनिया का मालिक समझने लगा…. क्योंकि युद्ध दुनिया में कहीं भी हो,  सारे अस्त्र शस्त्र उसी की दूकान से खरीदे जाते हैं… इसलिए वह तो चाहता ही है कि सारी दुनिया काम-धाम छोड़ कर केवल युद्ध करे | इससे जनसँख्या भी नियंत्रित रहेगी और विकास भी हो जाएगा | ~विशुद्ध चैतन्य

#यह_कलयुग_नहीं_जुमला_युग_है

 

 

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