मैं धन्यवाद् देता हूँ हिंदुत्व के नाम पर उपद्रव कर रहे सड़क-छाप लफंगों की सेनाओं और इनके आकाओं का

झारखण्ड के आदिवासी आरएसएस से हुए नाराज | ग़ुस्साए आदिवासियों ने रांची में संघ प्रमुख डा मोहन भागवत और सह सरकार्यवाह डा कृष्णगोपाल के पुतले फूंके.

रांची में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में सरना कोड को अलग धर्म मानने से इनकार किया गया था. आरएसएस के सह सरकार्यवाह डा कृष्णगोपाल ने रांची में पत्रकारों से कहा था कि सरना कोई अलग धर्म नहीं है.

इन आदिवासियों का गुस्सा इसलिए भी फूट पड़ा क्योंकि इन्हें अब दुःख हो रहा है कि इन्होने भाजपा को वोट दिया था | अब इन्हें अपनी गलती का एहसास हो रहा है कि जिन्हें ये हिदुत्व के प्रहरी समझ रहे थे, वास्तव में वे हिंदुत्व के नहीं, ब्राह्मणवाद के प्रहरी हैं | शायद इन्हें पहली बार पता चला कि वे आज तक कितनी बड़ी गलत-फहमी में थे कि जिस हिन्दू धर्म को वे सनातन मानते आये थे, वह वास्तव सनातन नहीं अन्य सम्प्रदायों की तरह एक सम्प्रदाय मात्र है | उस सम्प्रदाय में आदिवासियों के लिए कोई स्थान नहीं है और उन्हें भी ब्राहमणों की गुलामी ही करनी पड़ेगी | ब्राह्मणवाद को स्वीकारना पड़ेगा और अपना मौलिक गुण-धर्म का त्याग करना पड़ेगा जो इन्हें स्वीकार्य नहीं है |

ब्राहमण किसी दूसरे की मान्यताओं, परमपराओं को महत्व नहीं देते वास्तव में ब्राहमणवाद और कुछ नहीं, मुस्लिमों के विरोध में खड़ा हुआ एक सम्प्रदाय मात्र है | और विरोधी होने के कारण बिलकुल उनकी नकल करने पर तुला हुआ है | जैसे इस्लामिक देशों में हिन्दुओं को कोई सम्मान नहीं, उनकी परम्पराओं व मान्यताओं को सम्मान नहीं, वैसे ही ये लोग भी दूसरों की परम्पराओं को सम्मान नहीं देते | ये लोग दिन भर पाकिस्तान और बांग्लादेश टीवी देखते रहते हैं और फिर तुलना करते हैं कि उनकी नकल करने में कहीं चूक तो नहीं रहे हैं | ये लोग दूसरों को भी पकिस्तान और बांग्लादेश की तस्वीरें दिखा कर कहते हैं कि यह देखो….. हमें भी बिलकुल ऐसा ही बनना है | जैसे लोग हिन्दुओं पर अत्याचार करते हैं, हमें भी करना है, हर वह काम करना है जो वे लोग करते हैं | लेकिन वह सब करते हुए भी हम श्रेष्ठ बन सकते हैं यदि हम माँसाहार छोड़ दें, हम जनेऊ धारण कर लें और तिलक लगा लें…. बस ! फिर हम कलिबुर्गी की हत्या करें, दाभोलकर की हत्या करें, गौरक्षा के नाम पर हत्या करें, निर्दोषों की हत्या करें… सब जायज है |

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तो आदिवासियों को अब अक्ल आ गयी कि वे तो प्रकृति के उपासक हैं किसी पण्डे पुरोहित द्वारा थोपे गये भगवान् या अवतारों के उपासक नहीं हैं और न ही अनदेखे ईश्वर के ही उपासक हैं | वे जानते हैं कि उनके ईश्वर वृक्ष हैं, वन हैं, नदी पहाड़ हैं | वे जानते हैं कि उनके अराध्य सूर्य हैं, चन्द्र हैं, वायु हैं, वर्षा हैं… और ये सभी ईश्वर उनको जीवन देते हैं | उनको प्राण देते हैं उनको उर्जा देते हैं | इसलिए मुझे भी लगता है कि इनको ब्राह्मणों द्वारा थोपा गया धर्म स्वीकारने की अब आवश्यकता ही नहीं | इनका अपना धर्म जिसे ये लोग ‘सरना’ के नाम से जानते हैं, उसे ही मानने का पूरा अधिकार है |

मैं धन्यवाद् देता हूँ हिंदुत्व के नाम पर उपद्रव कर रहे सड़क-छाप लफंगों की सेनाओं और इनके आकाओं का, मैं धन्यवाद् करता हूँ साक्षी-महाराज, साध्वी प्राची और तोगड़िया जैसे महान हिंदुत्व के ठेकेदारों का कि उन्होंने हर भारतीय को यह एहसास करवा दिया कि हिन्दू धर्म भी एक दड़बा ही है, सनातन नहीं है | ~विशुद्ध चैतन्य

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