अगर विशेषज्ञता यही है तो एक अनपढ़ आप लोगों से लाख गुना बेहतर है

कुछ विद्वानों का तर्क है कि जिन्हें राजनीती का क, ख, ग नहीं पता होता, वे राजनेताओं में मीन-मेख निकालने में लगे रहते हैं | कुछ विद्वान कहते हैं, जिन्होंने कभी धर्मग्रंथों को नहीं पढ़ा होता, वे धर्मगुरुओं और धर्मों के ठेकेदारों को कोसते फिरते हैं |

यह कुछ वैसी ही बात हो गयी कि जिन्होंने पाकशास्त्र न पढ़ा हो उन्हें अधिकार नहीं है, खाना को खराब या अच्छा कहने का, रसोइये को यह बताने का कि आज खाने में नमक अधिक पड़ गया या नहीं पड़ा | क्योंकि पाककला की जिन्हें जानकारी नहीं होती उन्हें यह भी नहीं पता होता कि खाना सही है या खराब, ताजा है या बासा |

मैं किसी और की बात नहीं करता, मैं स्वयं उन लोगों में से एक हूँ, जिसने संविधान नहीं पढ़ा, न ही कोई धर्मग्रन्थ पढ़ा, न ही कोई पाककला की पुस्तक या शास्त्र पढ़ा, लेकिन जानता हूँ कि किस प्रकार लोग संविधान का मजाक बना रखे हैं और उसकी आढ़ में देश और जनता को बंधुआ बना रखा है | जानता हूँ कि धर्मग्रंथों और धर्म का कैसे दुरुपयोग किया जा रहा है और कमजोरों असहायों का न केवल शोषण कर रहे हैं धर्म के नाम पर, बल्कि उनका रक्त भी पिए चले जा रहे हैं सदियों से | जानता हूँ कि भोजन स्वादिष्ट है या बेस्वाद है और वह भी बिना कोई पाकशास्त्र पढ़े | और यह प्रतिभा मुझे जन्मजात मिली है और मुझे गर्व है अपनी प्रतिभा पर | मुझे किसी और के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है |

जिन्हें संविधान का ज्ञान है वे खामोश क्यों रहते हैं जब राजनेता संविधान विरुद्ध बयान देते हैं ? जब वे दो सम्प्रदायों के बीच फूट डालने का प्रयास करते हैं ? जब वे द्वेष व नफरत का प्रचार करते हैं,  तब संविधान के प्रहरियों की बोलती बंद क्यों हो जाती है ?

धर्मग्रंथों के विशेषज्ञ क्यों खामोश हो जाते हैं जब धर्म के नाम पर लोगों को उकसाया जाता है, दंगे करवाए जाते हैं, निर्दोषों की हत्या करवाई जाते हैं ? क्यों उन धर्मगुरुओं और ठेकेदारों के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं होती ?

न्याय व कानून के जानकार आज तक न्यायव्यवस्था को न्यायोचित बनाने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठा पाए ? क्यों न्याय के नाम पर वर्षों तक केस लटकाए रखने का फैशन चल आ रहा है ? क्यों न्याय व्यवस्था कछुए और घोंघे की चाल से चलता है जब आज तकनीकी 4G और 5G में पहुँच गयी है ?

अगर विशेषज्ञता यही है तो मैं आप सभी से लाख गुना बेहतर हूँ कि मैं अनपढ़ हूँ | कम से कम इतना तो जानता तो हूँ कि भोजन स्वादिष्ट है या नहीं | कम से कम इतना तो जानता हूँ कि न्याय हुआ या नहीं | कम से कम इतना तो जानता हूँ कि धर्मों के ठेकेदार धर्म संगत हैं या नहीं | ~विशुद्ध चैतन्य

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