क्या भोजन-भजन-शयन ही संन्यासी का मूल उद्देश्य है ?

‘ब्रम्हज्ञान’ ! जब हमें इस बात का ज्ञान हो जाता है कि हमारा जन्म, भोजन-भजन-शयन के लिए हुआ है और बाकी सारे काम, मिथ्या हैं, माया हैं |

तत्वज्ञान ! इस बात का ज्ञान हो जाना कि ब्रम्हज्ञानियों को पंचतत्व (डॉलर, बैंक बैलेंस, एक बड़ा नेता, कई प्रशासनिक अधिकारी, सैंकड़ों शिष्य) की प्राप्ति किये बना मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती |

हमारे आश्रम में किसी और आश्रम के मठाधीश व उनके अनुयाई व शिष्य अतिथि के रूप में ठहरे हुए हैं |

चूँकि मैं तो एक दुर्लभ प्राणी हूँ और आश्रम एक ही लोगों को बहुत ही कम दिखता हूँ तो उनकी एक शिष्या सुबह आश्रम की सफाई करते हुए मेरे कमरे के सामने आ गयी | मुझे कंप्यूटर पर लिखते देखकर झाडू वगैरह फेंक कर भाग खड़ी हुई | डरना स्वाभाविक ही था | वे सभी एक ऐसे आश्रम से पहली बार बाहर निकले हैं जहाँ केवल भजन कीर्तन के सिवाय और कुछ होता ही नहीं | कम्प्यूटर तो क्या उन्होंने टाइपरायटर भी न देखा हो कभी किसी बाबा के पास | तो एक गेरुआधारी बाबा और वह भी कंप्यूटर सामने रखे हुए उन्हें सदमा लगना ही था |

तो उनके गुरूजी उनको मिलाने मेरे पास आये | लेकिन मुझे दूर से ही नमस्ते कर सभी खिसक लिए | उनकी आँखों में अविश्वास था, एक भय भी था कि एक बाबा और कम्प्यूटर चला रहा है | तो स्वामीजी से वार्तालाप शुरू हुई | उन्होंने कहा कि एक परंपरा है उसे तो निभाना ही चाहिए और आप तो लोगों से मिलना जुलना भी बंद कर दिए | चलिए बाहर के लोगों से न सही, कम से कम अपने आश्रम के लोगों से तो मिलना जुलना चाहिए, संध्या आरती के समय तो कम से कम नीचे आना चाहिए…..

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मैंने कहा कि भोजन-भजन-शयन ही यदि संन्यासी का मूल उद्देश्य है, तो व्यर्थ हो गया सब कुछ | खैर मेरे विषय में तो आप सभी शुरू से ही जानते ही हैं, तो फ़िलहाल में अपने में कोई बदलाव नहीं लाना चाहता | रही परंपरा की बात तो यदि परम्परा, कर्मकांड, रीतिरिवाज ही निभाना था, तो संन्यास क्यों ? गृहस्थ में भी वही सब निभाये जाते हैं | यहाँ गुरु को पिता माना जाता है और गुरु द्वारा मिले नाम को ही हम अपना मानते हैं, और गृहस्थ में बाइलोजिकल पिता और उनके द्वारा मिले नाम को अपना मानते हैं | यहाँ हम एक गुरु की परंपरा को आगे बढाते हैं उनके पुत्र होने के नाते वहां भी हम वही सब करते हैं…. क्या फर्क आया ?

सब कुछ तो वहीँ का वहीँ है बस यहाँ हम अविवाहित हैं और गेरुआधारी हैं, और वहाँ हम विवाहित होते और दुनियाभर के रंग बिरंगे कपड़े पहनते |

संन्यास क्या परंपरा ढोने के लिए लिया जाता है या आत्मज्ञान और उस ज्ञान के प्रकाश पर आगे कि यात्रा करने के ?

वे बोले कि सत्य को समझने जानने और ईश्वर व मोक्ष की प्राप्ति के लिए संन्यास लेते हैं |

मैंने पूछा कि भोजन-भजन-शयन ही सत्य और सब मिथ्या ? आश्रम की जमीन भूमाफिया हडपते चले गये, तब कहाँ थे आप लोग ? और साल में एक बार पिकनिक मनाने आते हैं और मुझे संन्यास और परम्परा सिखा रहे हैं ? क्या जाना है सत्य आप ने आज तक ? अब तो आप जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुँच चुके हैं | मुझे भी कुछ समझाइये ?

वे बोले कि मैं केवल इतना ही चाहता हूँ कि जब प्रार्थना कीर्तन आदि होता है तो आप सभी के सामने अवश्य ही आयें, उसका प्रभाव पड़ता है लोगों पर भी | आप जैसे हैं वैसे ही रहें, बस पूजा आदि के समय तो लोगों को दर्शन दे दिया करें… आज हमारी शिष्या ही डर गयीं आपको देखकर | जबकि सभी को पता है कि आप हैं इस आश्रम में फिर भी.. डर गयी… बस इसलिए आया था कि उन्हें आपसे परिचय करवा दूं | बाकी हमे आपसे कोई नाराजगी नहीं है ! ~विशुद्ध चैतन्य

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प्रश्न: क्या संन्यास परम्परा निभा
ने के लिए लिया जाता है ? क्या गुरु शिष्य का सम्बन्ध बाप बेटे की तरह पैत्रक सम्पत्ति पर कब्जा जमाये रखने के लिए होता है ?

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