नास्तिकों के देवता पेरियार के अनुत्तरित प्रश्न और अनपढ़ विशुद्ध चैतन्य के उत्तर

Swami Ji – I saw one post on face book –

पेरियार नायकर के ईश्वर से सवाल
————————————————-

1) क्या तुम कायर हो जो हमेशा छिपे रहते हो,,, कभी किसी के सामने नहीं आते…???

2) क्या तुम खुशामद परस्त हो जो लोगों से दिन रात पूजा,,अर्चना करवाते हो..???

3) क्या तुम हमेशा भूखे रहते हो जो लोगों से मिठाई,, दूध,,घी आदि लेते रहते हो..???

4) क्या तुम मांसाहारी हो जो लोगों से निर्बल पशुओं की बलि मांगते हो..???

5) क्या तुम सोने के व्यापारी हो जो मंदिरों में लाखों टन सोना दबाये बैठे हो..???

6) क्या तुम व्यभिचारी हो जो मंदिरों में देवदासियां रखते हो..???

7) क्या तुम कमजोर हो जो हर रोज होने वाले बलात्कारों को नही रोक पाते… ???

क्या तुम मूर्ख हो जो विश्व के देशों में गरीबी-भुखमरी होते हुए भी अरबों रुपयों का अन्न,, दूध,, घी,, तेल बिना खाए ही नदी नालों में बहा देते हो???

9) क्या तुम बहरे हो जो बेवजह मरते हुए आदमी,,, बलात्कार होती हुयी मासूमों की आवाज नहीं सुन पाते..??

10) क्या तुम अंधे हो जो रोज अपराध होते हुए नहीं देख पाते…???

11) क्या तुम आतंकवादियों से मिले हुए हो जो रोज धर्म के नाम पर लाखों लोगों को मरवाते रहते हो….???

12) क्या तुम आतंकवादी हो जो ये चाहते हो कि लोग तुमसे डरकर रहें?

13) क्या तुम गूंगे हो जो एक शब्द नहीं बोल पाते लेकिन करोड़ों लोग तुमसे लाखों सवाल पूछते हैं…???

14) क्या तुम भ्रष्टाचारी हो जो गरीबों को कभी कुछ नहीं देते,, जबकि गरीब पशुवत काम करके कमाये गये पैसे का कतरा-कतरा तुम्हारे ऊपर न्यौछावर कर देते हैं..??

I know it is written by left wing person but looks like it has valid points ..
would you be able to comment on this or point me to some resources to explain truth ?

 पेरियार एक विद्वान् व्यक्ति हैं इसमें कोई संदेह नहीं है | लेकिन उनकी विद्वता किताबी है और बुद्धि जड़ | उनमें और ईश्वरीय किताबों को अखण्ड, सनातन सत्य मानने वाले धार्मिक विद्वानों में केवल इतना ही अंतर है कि धार्मिक विद्वान ईश्वर को स्वीकारते हैं और पेरियार नकारते हैं | फिर भी देखिये कि उनके सारे प्रश्न उस ईश्वर के प्रति ही है जो ईश्वर को नहीं मानते | आइये उनके प्रश्नों के उत्तर देता हूँ हूँ अपनी अनपढ़ बुद्धि से |

1) क्या तुम कायर हो जो हमेशा छिपे रहते हो,,, कभी किसी के सामने नहीं आते…??? 

नहीं ईश्वर कायर नहीं है, कायर हैं वे लोग जो ईश्वर के भरोसे बैठे हुए हैं | इसे इस प्रकार समझिये:

मानव ने मंगल ग्रह में स्वचालित मशीन छोड़ दी | उन मशीनों के भगवान मानव हुए क्योंकि मानव ने ही उन्हें बनाया और मंगल में उतारा | अब वहाँ जो भी समस्या होगी उन मशीनों को स्वतः ही सुलझाना होगा | सूर्य के प्रकाश से आने लिए उर्जा लेने से लेकर अन्य सभी काम उन्हें अपने विवेकानुसार ही करने होंगे | अब कोई विपदा आ जाये और वे रेत में मुँह छुपाकर बैठ जाएँ तो यहाँ पृथ्वी लोक के नासा सेंटर में बैठे उनके भगवान कुछ नहीं कर सकते | वे केवल उन मशीनों तक सन्देश भेज सकते हैं, लेकिन मशीन यदि उन संदेशों को भी ग्रहण करने की स्थिति में न हों तो मानव का क्या दोष ?

हमारा मॉडेम यानि पायिनियल ग्लेंड यानि थर्ड आई लगातार सन्देश प्राप्त करती रहती है कि हमें क्या करना है | क्या सही है और क्या गलत वह भी लगातार समझाया जाता रहता है, लेकिन हमने तय कर रखा है कि हम उसका प्रयोग नहीं करेंगे | हमने अपना जमीर, अपना विवेक सब गिरवी रख दिया और कभी नेताओं की धोती पकड़े भागते रहते हैं और कभी बाबाओं की, अपने विवेक का प्रयोग करने के स्थान पर दूसरों की बुद्धि से चलने लगे | तो ईश्वर का क्या दोष ?

2) क्या तुम खुशामद परस्त हो जो लोगों से दिन रात पूजा,,अर्चना करवाते हो..??? 

बिलकुल भी नहीं ! न तो ईश्वर खुशामद पसंद है और न ही पूजा अर्चना का शौक़ीन | उसे इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता… इसे इस प्रकार समझिये

मानव ने कुछ रोबोट बनाये और उन्हें किसी ग्रह में छोड़ आयें | अब रोबोट वहां जाकर मानव की कोई प्रतिमा बना लें और वहीँ बैठकर भजन-कीर्तन करने लगें तो क्या होगा ? क्या मानव खुश होगा ?

भजन कीर्तन और पूजा पाठ मानव अपने ही मन की शांति के लिए करता है, न कि ईश्वर को खुश करने के लिए | यह तो बहाना बना रखा है कि उपर कोई ईश्वर है जो स्तुति से प्रसन्न होता है, वस्तुतः मानव ही ऐसा प्राणी हैं जो स्तुति से प्रसन्न होता है | इसलिए वह स्तुति करता है और वह स्तुति वह स्वयं के लिए कर रहा होता है |

3) क्या तुम हमेशा भूखे रहते हो जो लोगों से मिठाई,, दूध,,घी आदि लेते रहते हो..??? 

बिलकुल नहीं, जो अन्नदाता है वह भूखा कैसे रह सकता है ? हाँ पृथ्वी में जो उसके रूप यानि किसान हैं वे अवश्य भूखे रहते हैं | लेकिन मूर्खों ने किसानों को भूखा रखकर पत्थर की मूर्तियों को भोग लगाना शुरू कर दिया, ताकि वे पापबोध से मुक्त हो सकें | फिर पत्थरों को भोग लगाने से पत्थर कभी नहीं कहेगा कि उसे डाईबिटिज़ है इसलिए मिठाई मत खिलाओ | वह तो यह भी नहीं कह सकता कि उसे क्या पसंद है और क्या नहीं… बस जिसे जो पसंद है वही खिलाने चला आता है | तो इसमें ईश्वर का कोई दोष नहीं…. इसे इस प्रकार समझिये:

मंगल ग्रह में उतरे रोबोट मानव की मूर्ती बनाकर बैटरी, डिस्टिल्ड वाटर का भोग लगाने लगें तो क्या मानव प्रसन्न होगा ?

बाकि सभी प्रश्नों के उत्तर भी आप आप इसी प्रकार किसी अन्य ग्रह में मानव द्वारा उतारे रोबोट और ईश्वर द्वारा पृथ्वी पर उतार स्वचालित रोबोट से तुलना करके पा सकते हैं | वस्तुतः ईश्वर वह शक्ति है जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक नियम के अंतर्गत क्रिया करते है, गति करती है | उस नियम को हम सनातन धर्म कहते हैं | और उस नियम को संचालित व सुव्यवस्थित रखने के लिए जो शक्ति कार्य कर रही है, उसे हम ईश्वर कहते हैं |

इसलिए ईश्वर और सनातन धर्म दोनों ही किताबी सीमाओं से परे हैं | किताबों को रट कर आप डिग्रीधारी बन सकते हैं, मौलवी, पादरी, पंडित-पुरोहित बन सकते हैं, नास्तिक बन सकते हैं, धार्मिक बन सकते हैं, हिन्दू या मुस्लमान या इसाई या सिख या बौद्ध या जैन बन सकते हैं, लेकिन रहेंगे कूपमंडूक ही जब तक आपका विवेक जागृत नहीं होता  | क्योंकि ईश्वर को समझने के लिए विवेक का जागृत होना आवश्यक है | उसे समझने के लिए अपनी अंतरात्मा में झाँकने की क्षमता का विकसित होना आवश्यक है |

यदि आप बहुत अधिक धार्मिक हो, नित्य प्रति आराधना, पूजा उपासना करते हो, लेकिन छल-कपट, शोषण व अत्याचार करने की प्रवृति हावी है, तो आप ढोंग कर रहे हैं | यदि आप पूजा ईश्वर का नाम जिस मुँह से लेते हो, उसी मुँह से माँ-बहनों का मौखिक बलात्कार करते हो, तो आप ढोंग कर रहे हो… क्योंकि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, भीतर है और वह इस ढोंग को साक्षात् स्वयं देख रहा है | आप उसे मुर्ख नहीं बना सकते मंदिर में हाजिरी लगाकर | ~विशुद्ध चैतन्य

उत्तिष्ट भारतः
“तुम्हारे पतन का कारण तुम स्वयं हो, हमारे पतन का कारण हम स्वयं हैं | झूठ कहते हैं वे लोग, जो दूसरे सम्प्रदायों के उदय को अपनी आस्था के पतन का कारण मानते हैं | आस्था तुम्हारी है, वह डिग कैसे सकती है ? और यदि तुम्हारी आस्था को सत्य का आधार नहीं है, तो उसका पतन होना चाहिए | तुम्हारा मार्ग भिन्न हो सकता है, उसका मार्ग भिन्न हो सकता है | सत्य तक पहुँचने के मार्ग भिन्न-भिन्न हो सकते हैं | इसलिए जो अपने मार्ग पर अपने साथ नहीं, वह गलत है, यह मानना गलत है | ‘एकम सत्यम विप्रा बहुदा वदन्ति’ अर्थात एक ही सत्य को विद्वान अलग-अलग रूपों में व्यक्त करते हैं…..” -आचार्य चाणक्य
Posted by विशुद्ध ब्लॉग on Thursday, 25 February 2016

READ  तालिबानी मुसलमानों को इस्लाम से खारिज करने का एलान किया

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of