पूरी ईमानदारी से स्वीकारता हूँ कि मैं बहुत ही महत्वाकांक्षी हूँ

एक भ्रम समाज में व्याप्त है कि महत्वाकांक्षाविहीन जीवन ही बैराग्य है या सिद्धि का मार्ग है | जो त्यागी हो जाते हैं वे महत्वाकांक्षा से मुक्त हो जाते हैं |

लेकिन मैंने अपने अनुभव से जाना कि महत्वाकांक्षाविहीन जीवन जीने वाला सिद्धपुरुष होना तो दूर, एक मनुष्य भी नहीं रह जाता | मैंने स्वयं पर प्रयोग किया था यह महत्वाकांक्षा विहीन होने वाला सिद्धांत | मैंने सब कुछ छोड़ दिया यहाँ तक कि जीने की लालसा भी मिट चुकी थी | जीने की लालसा तो अब भी नहीं है इसलिए ही पंगे लेता रहता हूँ smile emoticon

एक समय ऐसा भी आया था कि मैंने जब सब कुछ छोड़ दिया था…. तो शरीर में परिवर्तन आने शुरू हो गये | भूख लगनी बंद हो गयी और शरीर जर्जर होने लगा | अब दस पन्द्रह दिन भी खाना न मिले तो कोई फर्क नहीं पड़ता था… चेहरे की रौनक जाने लगी थी | एक प्रकार से शरीर ने मान लिया था कि अब आत्मा कभी भी शरीर छोड़ देगी |

मैं ऐसे ही एक पेड़ के नीचे लेटा हुआ था किसी पार्क में और दिमाग अपने सुनहरे दिन याद कर रहा था | वह दिन याद कर रहा था, जब मेरे नखरे उठाने के लिए प्रोडूसर तैयार रहते थे, सिंगर कोई भी हो, पैर छूने के बाद ही अंदर जाता था… नया सिंगर कोई आता था तो आशीर्वाद लेता था और उनमें से कितने आज टॉप स्टार हैं….. और इसी प्रकार की बहुत सी बातें याद आती रहीं….यानि ब्रेन मुझे फिर जिन्दा करना चाह रहा था….. लेकिन मन अब डिप्रेशन में चला गया था | और स्वाभाविक ही होता है कि जब महत्वाकांक्षा ही मिट जाये तो सबसे पहले डिप्रेशन ही घेरता है | मेरे पास कई रस्ते थे कि मैं बोम्बे चला जाऊं और अपने पुराने साथियों से मिलूँ, उन प्रोड्यूसरों से मिलूं जो दस पंद्रह साल पहले स्ट्रगलर थे और हम साथ साथ काम करते थे, लेकिन आज बड़ी बड़ी फिल्में करते हैं….. लेकिन फिर विचार आया कि जब सब कुछ छोड़ ही दिया… कुछ दिनों बाद शरीर भी छूट ही जाना है तो चिंता किस बात की ?

READ  अनजान राह पर चलने से दुनिया डरती है इसलिए उन्हें हमसफ़र न बनाएं

फिर दिमाग में आया कि मैं डिप्रेशन में क्यों आया ? क्या गौतम बुद्ध भी डिप्रेशन में रहे थे ? क्या वे भी मेरी तरह महत्वाकांक्षा विहीन हो गये थे ? फिर उत्तर आया कि वे न डिप्रेशन में थे और न ही महत्वाकांक्षा विहीन | उनकी महत्वाकांक्षा थी कुछ पाने की | कुछ ऐसी चीज पाने की जो उन्हें जीवन मरण के रहस्यों को समझा सके | जो समझा सके कि कोई पशु किसी पशु को क्यों खा जाता है…. कोई किसी पर अत्याचार क्यों करता है….. आदि इत्यादि | और वह उत्तर खोजने की उनकी चाह ही उन्हें जीवित रखे हुए थी | फिर एक दिन उन्हें भी लगा कि शरीर को भोजन की आवश्यकता है और उन्होंने भोजन किया… फिर उन्हें लगा कि समाज को दिशा दिखाने की आवश्यकता है तो वे समाज को दिशा दिखाने फिर समाज में आ गये…. .यानि जो व्यक्ति त्याग भी कर रहा है तो वह कुछ पाने के लिए ही कर रहा है, चाहे वह नाम कुछ भी दे | जैसे ईश्वर को पाने की बात करते हैं… तो ईश्वर को ही क्यों पाना चाहते हैं लोग ? क्योंकि ईश्वर यानि ऐश्वर्य | तो जब ईश्वर मिल गया तो ऐश्वर्य भी मिल गया और सारी तकलीफों से छुटकारा मिल जाएगा | तो कुल मिलाकर तकलीफों से मुक्ति ही मोक्ष है, और ईश्वर कि प्राप्ति है | यदि कोई कह दे कि ईश्वर यानि नरक या शैतान… तो कोई भी नहीं पाना चाहेगा ईश्वर को smile emoticon

बस जैसे ही या विचार मेरे मन में आया मैं फिर उठ खड़ा हुआ और भोजन की खोज में चल पड़ा…. रास्ते में एक मंदिर मिला जहाँ भंडारा चल रहा था वहीं भंडारा खाया तब शरीर में जान आई….

READ  विश्वरूप और मूर्ति पूजा

आज मेरे पोस्ट में मेरे नाम देखकर, सोशल मिडिया में हर जगह मैं किसी और का नहीं, केवल अपना नाम ही प्रयोग करता हूँ यह देखकर लोग कहते हैं कि मैं बहुत बड़ा महात्मा बनने की चाह लिए बैठा हूँ | लोग कहते है कि मैं चा
हता हूँ कि पुरी दुनिया में मेरा नाम हो और पूरी दुनिया मेरी जय जयकार करे….. धार्मिक लोग सलाह देते हैं कि मुझे गेरुआ उतार देना चाहिए क्योंकि मैं गेरुए का अपमान कर रहा हूँ….. लेकिन यही लोग उनको गेरुआ उतारने की सलाह नहीं देते जो धर्म के नाम पर नफरत फैलाते हैं, जो ज़ेड सिक्यूरिटी लेकर घूमते हैं, जो करोड़ों का कारोबार करते हैं, जो दंगे भड़काने वाले बयान देते है….उन सब लोगों के कारण गेरुआ कलंकित नहीं होता, लेकिन मेरे कारण हो रहा है |

तो यहाँ पूरी ईमानदारी से स्वीकारता हूँ कि मैं बहुत ही महत्वाकांक्षी हूँ आज | लेकिन मेरी महत्वाकांक्षा आप लोगों के समझ से परे है | हो सकता है कि कल मेरे पास भी सारी लक्ज़री हों, हो सकता है कि मेरे पास भी ज़ेड सिक्यूरिटी हो…. हो सकता है कि मेरे पास भी वह सब हो, जो आज के आधुनिक संत महंतों के पास होता है…. .या फिर हो सकता है कि यह शरीर ही न हो…. लेकिन मेरी महत्वाकांक्षा को इन सब से कोई अंतर नहीं पड़ने वाला | ये सब बाहरी हैं.. इनको देख कर सामने वालों के व्यवहार में अंतर आएगा, लेकिन मेरी खोज कुछ और है… कुछ और है जो मैं पाना चाहता हूँ | इसलिए मैं अपने नाम का प्रचार अधिक करता हूँ…… अब आप लोग स्वतंत्र हैं मुझे पाखंडी कहने के लिए | क्योंकि जिन्हें मैं पाखंडी मानता हूँ उन्हें भी आप लोग हिंदुत्व की शान मानते हैं… तो फिर मेरा तो पाखंडी होना ही ठीक है और वही वास्तव में सम्मान है | यदि आप लोग मुझे सच्चा संन्यासी कहने लगे तो मेरा अपमान हो जायेगा क्योंकि फिर आप लोग मुझे भी उसी केटेगरी में रख देंगे जिन्हें मैं पाखंडी मानता हूँ |

READ  मैं कोई धर्मगुरु नहीं हूँ

तो फिर एक बार समझ लीजिये कि जिस दिन आपके भीतर से महत्वाकांक्षा मिट जाएगी, जिस दिन आप सपने देखना छोड़ देंगे, आपके चेहरे से रौनक जाने लगेगी… यदि विश्वास न हो तो आजमा कर देख लीजिये | मैंने तो आजमा लिया है | ~विशुद्ध चैतन्य

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of