जो नवीन विचार या अविष्कार या मार्ग की खोज में रहते हैं वे नौकरी करने में स्वयं को असमर्थ पायेंगे

मैं जब ब्रॉडकास्ट मीडिया में काम करता था, तब वहां कभी कोई भेदभाव देखने नहीं मिला कि कोई हिन्दू है, मुस्लिम है शूद्र है, ब्राह्मण है… आदि इत्यादि | लेकिन एक प्रोड्यूसर मुझे मिली जिसका मानना था कि उसे मीन राशि वालों से नफरत है क्योंकि वे विश्वास के काबिल नहीं होते, कभी भी धोखा दे देते हैं | अर्थात उसकी नजर में मीन राशि वाले शूद्र हो गये….. वह अक्सर लोगों से दोस्ती भी करती थी तो राशियाँ देखकर |

तभी मेरे दिमाग में यह बात आई कि इसी प्रकार मानवों के गुण धर्म के अनुसार जो चार वर्गीकरण किया गया था, उसमें कोई शूद्र निम्न कैसे हो गया और ब्राह्मण श्रेष्ठ कैसे हो गया ?

आइये पहले हम जान लें कि बारह राशियों को चार वर्गों में किस प्रकार रखा गया है |

अग्नि तत्व वाली राशियाँ:-
अग्नि तत्व के अंतर्गत तीन राशियाँ आती हैं- मेष, सिंह और धनु | इन राशियों में अग्नि का गुण विशेष रूप से पाया जाता है, सर्वप्रथम तो ये कि इन्हें अपना पूर्ण प्रभाव दिखने के लिए विशेष माध्यम व परिस्थितियों की आवश्यकता होती है, जिनमें ये अपना सौ प्रतिशत दे पाते हैं, अन्यथा नहीं | इनमें सदैव आगे बढ़ने की ऊर्जा विद्यमान रहती है | इनकी रोग-प्रतिरोधक शक्ति काफी अच्छी होती है | इनकी सदैव जीतने की इच्छा होती है | इन्हें आत्मविश्वास की कोई कमी नहीं होती है | कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करने में हिचकते नहीं हैं | ये राशियाँ जीवन बल से सम्बंधित होती हैं | सबसे महत्वपूर्ण बात की इनका अध्यात्मिक पक्ष आतंरिक रूप से काफी प्रबल होता है, क्योंकि नैसर्गिक कुंडली में ये एक, पांच और नौ मिलकर चार त्रिकोणों में से धर्मं त्रिकोण का निर्माण करते हैं | अब बात करे तीनों के अलग-अलग तो मेष राशि कालपुरुष के सिर को सूचित करती है और मंगल के स्वामित्व में होने के कारण स्वयं के शरीर और दूसरों को भी जला देने वाले क्रोध पर इसीका अधिकार होता है | या कहें तो मष्तिष्क की शक्ति पर प्राकृतिक रूप से इसी राशि का अधिकार होता है | सिंह राशि कालपुरुष के उदर को व्यक्त करती है और सूर्य के स्वामित्व में होने के कारण एक तो जठराग्नि पर इसका पूर्ण नियंत्रण होता है, क्योंकि जठराग्नि ही भोजन का पाचन कर हमें जीवन जीने की ऊर्जा प्रदान करती है और यही कार्य सूर्य भी करता है, जीवन जीने की ऊर्जा देने का | धनु राशि जंघा का स्वामित्व रखती है और धर्मं त्रिकोण की सबसे महत्वपूर्ण राशि होने कारण श्रद्धा पर इसका अधिकार होता है | ये धार्मिक अग्नि से प्रखर राशि है | मेष राशि तमोगुणी, सिंह राशि रजोगुणी और धनु राशि सत्वगुणी है |

पृथ्वी तत्व वाली राशियाँ:-
पृथ्वी तत्व के अंतर्गत भी तीन राशियाँ आती हैं-वृषभ, कन्या और मकर | इन राशियों में पृथ्वी का गुण विशेषरूप से पाया जाता है, कि ये कुछ न कुछ छिपाकर रखते हैं, जो केवल इनके गर्भ में ही रहता है | गति धीमी होती है पर धैर्य, लाजवाब | इनके अंदर की खूबी को कोई पहचान ले तो इन्हें आसमान की ऊंचाइयों तक ले जा सकता है, ये स्वयं को पहचान नहीं पाते | इनका व्यक्तित्व बहुमुखी होता है | कभी एक दायरे में नहीं बांध पाते | ये तीन राशियाँ वृषभ,कन्या और मकर मिलकर चार त्रिकोणों में से अर्थ त्रिकोण का निर्माण करते हैं इसलिए ये राशियाँ अर्थ प्रधान होती है और स्थिरता की सूचक होती हैं |

पृथ्वी-तत्वीय राशियाँ शारीरिक ढाँचे से सम्बंधित होती है | अलग-अलग बात करें तो वृषभ राशि शुक्र के स्वामित्व में होने के कारण फल-फूल से सम्बंधित | चेहरे की सुंदरता को बढ़ाने के लिए काम में ली जाने वाली मिट्टी भी इसी राशि के द्वारा देखी जायेगी | कन्या राशि पर बुध का आधिपत्य है और छठे भाव अर्थात पेट से सम्बंधित होने कारण खेती की जमीन इस राशि के अधिकार क्षेत्र में आती है | मकर राशि शनि के स्वामित्व में होने के कारण रेतीली,बर्फीली जमीन बियाबान उजाड जमीन इस राशि के आधिपत्य में आती है |

वायुतत्व वाली राशियाँ:
वायुतत्व के अंतर्गत तीन राशियाँ आती हैं, मिथुन, तुला और कुम्भ | वायु अर्थात लगातार गतिशील अतः ये लोग निरंतर गतिशील होते हैं | वायु तत्व वाले आवश्यकता पड़ने पर किसी प्रकार के माहौल में गुजर तो कर लेते हैं पर उनके मूलभूत स्वभाव को बदलना मुश्किल होता है | इनकी कल्पनाशक्ति काफी अच्छी और तेज होती है | इनके मष्तिष्क में नए विचारों का आवागमन बड़ी तेजी के साथ होता है | इन राशियों का सम्बन्ध मष्तिष्क के अनुभवों के साथ होता है | ये कला प्रेमी होते हैं | ये अच्छी सलाहकार हो सकते हैं | जिन कार्यों में शरीर की अपेक्षा मष्तिष्क का अधिक प्रयोग करना पड़ता हो वहाँ वायु तत्व वाले अच्छी तरह सामंजस्य बैठा सकते हैं मिथुन राशि का सम्बन्ध बुध से होने के फलस्वरूप इनका भाषा पर अच्छा प्रभुत्व होता है कल्पनाशक्ति, गणित, तर्क-शक्ति और लेखन कला अच्छी होती है | तुला राशि पर शुक्र का प्रभाव है अतः ये लोग कला-मर्मज्ञ होते हैं | कारोबारी समझ अच्छी होती है | स्वाभाव सौम्य होता है | शनि कुम्भ राशि का मालिक है अतः कुम्भ वाले लोग एकांत में चिंतन के शौक़ीन होते हैं | कुम्भ लगातार अभ्यास करने वाली राशि है | कुम्भ राशि की वैचारिक शक्ति बड़ी ही उच्च कोटि की होती है | अलग तरीके से देखें तो मिथुन की वायु नयी शक्ति का संचार करने वाली, तुला की वायु शीतलता प्रदान करने वाली, कुम्भ की वायु ठंडी हवा के समान होती है | 

जल तत्व वाली राशियाँ:
जल तत्व के अंतर्गत तीन राशियाँ आती हैं, कर्क, वृश्चिक और मीन | जल तत्व की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है, कि यह पात्र के आकार के साथ-साथ उसकी प्रकृति को भी ग्रहण कर लेती है | ये राशियाँ शारीरिक संरचना में थोड़ी कमजोर होती है | ये स्वाभाव से थोड़े से संनकी होते हैं!ऊर्जा की कमी से जूझते हैं | ये जातक बहुत ही भावुक किस्म के होते हैं | कर्क राशि चूंकि चन्द्रमा के अधीन होती है और चन्द्रमा स्वयं भी जल्कारक ग्रह है अतः इस पर जल तत्व का पूर्ण प्रभाव दृष्टिगोचर होता है!कर्क राशि नैसर्गिक कुंडली में चतुर्थ यानि कि घर के स्थान में पड़ती है इसीलिये इस राशि से घर में पाए जाने वाले जल का विचार किया जाता है | जबकि वृश्चिक राशि अष्टम भाव में होने के कारण गन्दा जल या उत्सर्जित जल का विचार इसके द्वारा किया जाता है | मीन राशि या कहें तो दो मछलियों वाली राशि सागर के जल से सम्बंधित होती है | ये भावनाओं को दबाकर रखने वाले, संवेदनशील और रहस्मयी सोच वाले होते हैं |

तो इस प्रकार ज्योतिष में १२ राशियों का वर्गीकरण किया गया | लेकिन मैंने आज तक सिवाय एक लड़की को छोड़कर किसी को नहीं देखा कि वह किसी राशि विशेष के प्रति नफरत का भाव रखता हो | आपके अपने ही परिवार में विभिन्न राशियों के सदस्य होंगे, किसी से पटती होगी और किसी से नहीं, कोई बहुत गुस्सैल होगा तो कोई बहुत शान्त, कोई एकांकी होगा तो कोई मिलनसार, लेकिन कोई बैर भाव या छूत वाली कोई बात नहीं होगी आपस में |

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ठीक इसी प्रकार वर्ण व्यवस्था भी थी, जिसे बाद में लोगों ने जाति बना लिया और ब्राह्मण के घर ब्राह्मण पैदा होने लगा और शूद्र के घर शूद्र | जबकि एक परिवार में यदि चार सदस्य हैं तो उनमें से कोई ब्राहमण प्रवृति यानि उपदेशक, शिक्षक, विद्यार्थी, शांत चित्त, परोपकारी होगा तो कोई शूद्र प्रवृति यानि शारीरिक श्रम को महत्व देने वाला, कर्म ही पूजा है वाले सिद्धांत पर चलने वाला होगा | कोई वैश्य प्रवृति का यानि हिसाब किताब रखने में रूचि लेने वाला, क्रय-विक्रय में रूचि लेने वाला व्यापारिक मानसिकता का होगा तो कोई सुरक्षा के लिए हमेशा तत्पर हर किसी से लड़ने-मरने पर आमादा रहने वाला होगा | लेकिन सभी मिलजुल कर ही रहते हैं कोई भेदभाव तो नहीं होता होगा | कोई ऐसा भी भी व्यक्ति होगा जिनमें ये चारों की गुण होंगे | वैसे देखा जाए तो आज जितने भी नौकरी के लिए लाइन पर लगे हुए हैं, वे सभी शूद्र ही हैं | और शायद यही कारण है कि ब्राह्मणों यानि उपदेशकों, दार्शनिकों के प्रति इनका नजरिया नकारात्मक रहता है | क्योंकि इन्हें भ्रम है कि दुनिया इन्हीं की मेहनत की वजह से चल रही है | जबकि शूद्रों के पास वह बुद्धि नहीं होती जो ब्राहमणों के पास होती है क्योंकि वे केवल आदेश का पालन ही कर सकते हैं, कोई नवीन विचार या खोज नहीं कर सकते | और यह तो प्रमाणित ही है बेरोजगारों की लाइन देखकर कि उन शूद्रों में इतनी बुद्धि नहीं कि वे अपनी आजीविका के लिए कोई ऐसा विकल्प खोज पायें जिससे उन्हें बेरोजारों की लाइन पर न लगना पड़े |

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जो नवीन विचार या अविष्कार या मार्ग की खोज में रहते हैं वे नौकरी करने में स्वयं को असमर्थ पायेंगे | वे किसी की गुलामी नहीं कर सकते उलटे भूखे रहना पसंद कर लेंगे, लेकिन कोई न कोई काम ऐसा अवश्य खोज लेंगे जिसमें उन्हें किसी के नीचे काम न करना पड़े… जैसे कि थॉमस एडिसन, स्वामी विवेकानन्द, ओशो… आदि |

अब जरा सोचिये कि कल कोई अपनी अपनी राशियों के अनुसार जाति बना ले और दूसरी राशियों से लड़ने झगड़ने लग जाये जैसे कि यहाँ ब्राहमण और शूद्र जातियाँ लड़ रहीं हैं तो क्या होगा ?

~विशुद्ध चैतन्य

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