सनातन संस्कृति व धर्म

सनातन संस्कृति और अन्य संस्कृतियों में अंतर यह है कि सनातन ब्रह्मज्ञान है और अन्य संस्कृतियाँ भौगोलिक, व भौतिक ज्ञान पर ही सिमित हैं | सनातन में सभी कुछ आ जाता है और द्वैत का भाव मिट जाता है, लेकिन अन्य सभी में द्वैत का भाव प्रबल रहता है और अद्वैत के भाव में कोई एक आध ही पहुँच पाता है सदियों में |

सनातन ज्ञान की उपलब्धि ऋषियों के लुप्त होने और ब्राह्मणवाद के शुरू होने से पहले सभी में सहज था और उस समय एक आम बात थी शायद | इसलिए दडबों की आवश्यकता ही नहीं पड़ी | लेकिन ब्राहमणवाद के शुरू होने और उनके उपद्रव बढ़ने के साथ ही सनातन संस्कृति का विनाश होना शुरू हो गया और तब ऐसे समय में गौतम बुद्ध आये | गौतम बुद्ध ने सनातन को पुनः सबके सामने लाया जो कि उस समय के पीडित वर्ग को बहुत ही सहज लगा…. सहज तो लगना ही था क्योंकि भारत का मूल सनातन पर ही आधारित है | तो जनमानस का रुझान गौतम बुद्ध की तरफ हुआ |

तब तक उत्तर भारत का समाज सनातन से सिमट कर वैदिक धर्म में आ गया था या शुद्ध शब्दों में ब्राह्मणवाद के दड़बे में कैद हो चुका था | अब ब्राहमणों ने ब्रम्ह को समेट कर किताबों में सीमित कर लिया था और धर्म एक प्रकार से किसी एक वर्ग की बपौती बनकर रह गया | सनातन धर्म मिटने लगा था वैदिक धर्म हावी होने लगा था….. तो गौतम बुद्ध जो सनातन का प्रचार कर रहे थे, वे कट्टरवादी ब्राहमणों को अखरने लगा था | जिसके कारण गौतम बुद्ध के अनुयाइयों पर अत्याचार बढ़ गये और उन्हें भारत छोड़कर अन्य देशों में शरण लेनी पड़ी थी |

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आज भी आप देखें तो जितने लोग खुद को कट्टर ब्राहमण या वैदिक या हिन्दू मानते हैं, वे सभी आज भी दडबों को ही महत्व देते हैं | उनकी सोच बहुत ही संकीर्ण होती है और स्वार्थ पर आधारित होती है | जैसे कि ब्राह्मण मांसाहारियों का छुआ पानी भी नही पी सकते और अभी पिछले ही दिन खबर आई कि एक दलित ने भोजन की थाली को छू लिया थो उसके टीचर ने उसे इतनी बुरी तरह मारा कि उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और टीचर को गिरफ्तार करवाना पड़ा | लेकिन मैं आज तक नहीं सुना कि किसी माँसाहारी द्वारा स्थापित फेसबुक करने वाले को छूत लगा हो | मैंने आज तक नहीं सुना कि सेमसंग, सोनी, आईफोन का प्रयोग करने वालों ने इन फोन को गंगाजल से नहलाया हो और फिर प्रयोग किया हो | यहाँ तो सनातनी हो जाते हैं… लेकिन जब दलितों की बात आती है तब ब्राह्मणवाद सर पर चढ़ जाता है |

सनातनी होना, ब्रह्मज्ञानी होना एक समान है | संकीर्णता से मुक्त व्यक्ति ही सनातनी हो सकता है और सनातनी ही ब्रह्मज्ञानी हो सकता है, बाकी सभी दडबों में ही सीमित रहेंगे, चाहे कितने ही बड़े कर्मकांडी, विश्वविख्यात धार्मिक ही क्यों न हो जाएँ | चाहे वे योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, साध्वी प्राची, ओवैसी, तोगड़िया जितने सिद्ध महात्मा और संत महंत ही क्यों ना हो जाएँ…. दडबों से बाहर की दुनिया से अनजान ही रहेंगे और सोच ढाई सौ ग्राम से अधिक बढ़ ही नहीं सकती |

सनातनी थे गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, ओशो और आज के युग में जुकरबर्ग, ओबामा, पुतिन आदि नाम सार्थक दीखते हैं | सनातनी होने का सीधा सा अर्थ है सहज होजाना सभी के प्रति | जुकरबर्ग ने आज बिना भेदभाव किये हमें फेसबुक उपलब्ध करवाया क्योंकि वह सनातनी मानसिकता के थे, जरा सोचिये संघियों या मुसंघियों ने बनाया होता तो क्या होता ? जरा सोचिये पाकिस्तानी या सऊदी के किसी कट्टर मुस्लिम ने बनाया होता तो क्या होता ?

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दुनिया भर की शर्ते होतीं फेसबुक खुलते ही कोई श्लोक या आयत सुनाई पड़ती… फिर पूछा जाता कि आप मांसाहरी हैं या शा
काहरी हैं, गाय का मांस खाते हैं या सूअर का मांस खाते हैं, तिलक या टोपी लगाया या नहीं…. सऊदी का होता तो कहते कि महिला हैं तो कृपया बुरका डालकर फेसबुक चलायें…

तो मुझे आशा है कि मेरे इस लेख से आप लोगों को सनातन और दड़बा छाप (हिन्दू, मुस्लिम सिख ईसाई…. आदि ) संस्कृति का अंतर समझ में आ गया होगा | ~विशुद्ध चैतन्य

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