भारत के विशाल वृक्ष है….


हर धार्मिक सफाई देता है कि धर्म की कोई गलती नहीं है, बल्कि नासमझ लोगों की है | धर्म कभी भी कुछ गलत नहीं सिखाता, कभी भी भेदभाव नहीं सिखाता, सबके साथ सामान व्यव्हार रखना सिखाता है, प्रेम सिखाता है, सेवा और परोपकार सिखाता है…….आदि इत्यादि

अब इस नजरिये से देखें तो गलती तो बन्दूक की भी नहीं होती, चलाने वाले कि ही होती है,

गलती तो चाकू की भी नहीं होती, काटने वाले की होती है,

गलती तो पहाड़ की भी नहीं होती, गिरने वाले की होती है,

गलती तो नदी की भी नहीं होती, डूबने वाले की होती है |

इसी प्रकार धर्म की भी कोई गलती नहीं है, फिर चाहे उस धर्म के नाम पर कितने ही मारकाट होते रहे हैं | धर्म की कोई गलती नहीं होती जब धार्मिक लोग अधर्मी का साथ देते हैं | धर्म की कोई गलती नहीं होती, जब धर्म के नाम पर दंगे और फसाद होते हैं और किसी धार्मिक को समझ में नहीं आता कि हमारा धर्म निर्दोषों और मासूमों की हत्या करना नहीं सिखाता | धर्म की कोई गलती नहीं होती जब धर्म के नाम पर बड़े बड़े अपराधी और बदमाश को वोट देकर आ जाते हैं |

हजारों सालों से आप लोगों के अपने ही दड़बे में कोई वर्ग बहुत जीर्ण-शीर्ण स्थिति में जी रहा है, लेकिन कभी उनकी चिंता नहीं हुई लेकिन गाल बजाये जा रहे हैं कि हमारी ईश्वरीय किताबें और दड़बे सही हैं |

हजारों सालों से अधर्मियो, अपराधियों, अत्याचारियों को अपना नेता चुनते आ रहे हो जानते बुझते भी और गाल बजाये जा रहे हैं कि हमारा दड़बा महान है…..

अरे दड़बे और धर्म का अंतर तो समझ लो कभी फुर्सत में बैठकर | हिन्दू, मुस्लिम सिख ईसाई और दुनिया भर के जितने भी पंथ और मान्यताएं हैं, वे भी अब दड़बों में बदल चुके हैं | पंथ का मतलब होता है राह, मार्ग…. जिसपर चलकर आगे बढ़ना है…. लेकिन क्या कोई आगे बढ़ा ? क्या कोई धर्म तक पहुँच पाया ? जितने कर्मकांड हैं वे आरम्भ हैं, प्राथमिक स्टेज हैं…. उससे आगे तो बढ़िये ?

इतना विशाल भारत है और विभिन्न मान्यताओं व संस्कृतियों से लेकर जलवायु व परिवेशों का यह देश है, फिर क्यों नहीं दड़बों से बाहर निकलकर देखते ? क्यों चाहते हो कि सारी दुनिया ही हमारे दड़बे के मालिकों के इशारों पर ही नाचें और जो हम चाहें वह पहने और जो हम चाहें वह खाए ? भारत को लोग सागर मानते हैं तो उसका मूल कारण है यह देश किसी एक दड़बे का देश नहीं है, जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश या अन्य इस्लामिक देश | आज सऊदी भी अपने किसी हुनर की वजह से नहीं, बल्कि प्रकति से प्राप्त तेलों की वजह से समृद्ध है | वरना तो उनकी स्थिति भी बाकी देशों की तरह ही होती |

सारांश यह कि यदि आप कहते हैं कि धर्म कुछ गलत नहीं सिखाता तो पहले धर्म को ही समझ लीजिये, जब तक दडबों को धर्म मान कर चलेंगे, तब का न अपनों का भला हो पायेगा और न ही देश का | ये धर्मों के ठेकेदार किसी न किसी रूप में लड़ाते ही रहेंगे | न सरकार को सही तरीके से काम करने देंगे और न ही खुद कभी पीड़ितों, शोषितों, दलितों, किसानों के लिए काम करेंगे | मुसलमान कहेगा कि हम पीड़ित हैं, दलित कहेगा कि हम पीड़ित हैं, किसान कहेगा कि हम पीड़ित हैं… लेकिन एक सच्चा धार्मिक इंसान ही कह पायेगा कि कमजोर, अशिक्षित व आर्थिक रूप से कमजोर समुदाय पीड़ित है | और जिस दिन यह कहने का साहस आ जायेगा उस दिन सही मायने में यह देश धार्मिक हो जायेगा | लेकिन तब तक सबकी अपनी अपनी ढपली रहेगी और सबका अपना अपना राग | ~विशुद्ध चैतन्य

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