पहली सीढ़ी पर खड़े हुए संन्यासी को, फकीर को अंतिम अवस्था का संन्यासी भ्रष्ट मालूम पड़ सकता है

एक बार राबिया बीमार थी। सहानुभूति में दो फकीर देखने आये। एक थे हसन और दूसरे मलिक।

हसन ने कहा : ‘राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे, फकीर को कोई शिकायत नहीं होती। वह उसे चुपचाप सह लेता है।’

फिर मलिक बोले : राबिया फकीर शिकायत तो मानता ही नहीं, बल्कि मिले हुए दंड में भी खुशी मानता है।’

राबिया थोड़ी देर चुप रही फिर वह बोली : ‘मुझे माफ करना, लेकिन जब से मैंने खुदा को जाना है, तब से मुझे दंड जैसी कोई प्रतीति नहीं होती। तो फिर कैसी शिकायत ? क्या सहना ? और किसकी खुशी ?’

ओशो, तीन फकीरों की इस परिचर्चा पर प्रकाश डालने की कृपा करें।


राबिया उन थोड़ी-सी अत्यल्प, अंगुलियों पर गिनी जा सकें, ऐसी थोड़ी सी स्त्रियों में एक है-जो बुद्धत्व को उपलब्ध हुई। पुरुषों में बड़ी संख्या है-बुद्धत्व को पाने वाले लोगों की। स्त्रियों में वैसी बड़ी संख्या नहीं है इसलिए राबिया का उठना बैठना, उसका बोलना-कहना-सब मूल्यवान है। और यह छोटी-सी चर्चा उसके बुद्धत्व की खबर देती है।

फकीरी के तीन तल हैं; फकीरी के तीन मुकाम हैं। पहले तो हम साधारण आदमी को समझ लें, फिर इन तीन स्थितियों को समझ लेंगे। इस कहानी में ये तीन फकीर तीन स्थितियों के फकीर हैं। साधारण आदमी की स्थिति क्या है, मनोदशा क्या है ?

साधारण आदमी-जब उसके जीवन में दुख आता है, तब शिकायत करता है। सुख आता है तब धन्यवाद नहीं देता। जब दुख आता है, तब वह कहता है कि ‘कहीं कुछ भूल हो रही है। परमात्मा नाराज है। भाग्य विपरीत है।’ और जब सुख आता है, तब वह कहगता है कि ‘यह मेरी विजय है।’

मुल्ला नसरुद्दीन एक प्रदर्शनी में गया-अपने विद्यार्थियों को साथ लेकर। उस प्रदर्शनी में एक जुए का खेल चल रहा था। लोग तीर चला रहे थे धनुष से और एक निशाने पर चोट मार रहे थे। निशाने पर चोट लग जाये तो जितना दांव पर लगाते थे, उससे दस गुना उन्हें मिल जाता था। निशाने पर चोट न लगे, तो जो उन्होंने दांव पर लगाया, वह खो जाता।

नसरुद्दीन अपने विद्यार्थियों के साथ पहुँचा; उसने अपनी टोपी सम्हाली; धनुष बाण उठाया; दांव लगाया और पहला तीर छोड़ा तीर पहुंचा ही नहीं-निशान तक। लगने की बात दूर, वह कोई दस-पंद्रह फीट पहले गिर गया। लोग हंसने लगे।

नसरुद्दीन ने अपने विद्यार्थियों से कहा, ‘‘इन नासमझों की हंसी की फिक्र मत करो। अब तुम्हें समझाता हूं कि तीर क्यों गिरा।’

लोग भी चौंककर खड़े हो गये। वह जो जुआ खिलाने वाला था, वह भी चौंककर रह गया। बात ही भूल गया।

नसरुद्दीन ने कहा, ‘‘देखो, यह उस, सिपाही का तीर है, जिसको आत्मा पर भरोसा नहीं-जिसको आत्म-विश्वास नहीं। वह पहुंचता ही नहीं है-लक्ष्य तक; पहले ही गिर जाता है। अब तुम दूसरा तीर देखो।’

सभी लोग उत्सुक हो गये। उसने दूसरी तीर प्रत्यंचा पर रखा और तेजी से चलाया। वह तीर निशान से बहुत आगे गया। इस बार लोग हंसे नहीं।

नसरुद्दीन ने कहा, ‘देखो, यह उस आदमी का तीर है, जो जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास से भरा हुआ है।’ और तब उसने तीसरा तीर उठाया और संयोग की बात कि वह जाकर निशान से लग गया।

नसरुद्दीन ने जाकर अपना दांव उठाया और कहा, ‘दस गुने रुपये दो।’

भीड़ में थोड़ी फुसुसाहट हुई और लोगों ने पूछा, ‘‘और यह किसका तीर है ?’

नसरुद्दीन ने कहा, ‘‘यह मेरा तीर है। पहला तीर उस सिपाही का था, जिसको आत्म-विश्वास नहीं है। दूसरा, उस सिपाही का था, जिसको ज्यादा आत्म-विश्वास है। और तीसरा-जो लग गया, वह मेरा तीर है।’

यही साधारण मनोदशा है। जब तीर लग जाये, तो तुम्हारा; चूक जाये, तो कोई और जिम्मेवार है। और जब तुम किसी को जिम्मेवार न खोज सको, तो परमात्मा जिम्मेवार है ! जब तक तुम दृश्य जगत में किसी को जिम्मेदार खोज लेते हो, तब तक अपने दुख उस पर डाल देते हो। अगर दृश्य जगत में तुम्हें कोई जिम्मेवार न दिखाई पड़े तब भी तुम जिम्मेवारी अपने कंधे पर तो नहीं ले सकते; तब परमात्मा तुम्हारे काम आता है। वह तुम्हारे बोझ को अपने कंधे पर ढोता है।

तुमने परमात्मा को अपने दुखों से ढांक दिया है। अगर वह दिखाई नहीं पड़ता है, तो हो सकता है, सबने मिलकर इतने दुख उस पर ढांक दिये हैं कि वह ढंक गया है; और उसे खोजना मुश्किल है।

हम शिकायत तो करते हैं-साधारण जन धन्यवाद कभी नहीं देते। सुख से अपने अहंकार को भर लेते हैं; दुख में परमात्मा से शिकायत कर देते हैं। यह साधारण सांसारिक व्यक्ति की दशा है। इससे ऊपर उठी दशा फकीर की है, उस संन्यासी की है, जो दुख को स्वीकार कर लेता है; शिकायत नहीं करता। लेकिन स्वीकर में भी दुख तो दुख ही है। बे मन से ही तुमने स्वीकार किया है; तुम किसी अहोभाव से नहीं भर गये हो। चाहते तो तुम थे कि यह न होता, लेकिन हुआ तो ठीक; जैसी परमात्मा की मर्जी। लेकिन विवशता है, मजबूरी है। तुम्हारे हृदय से कोई अहोभाव नहीं उठ रहा है। तुमने ऊपर से शिकायत नहीं की है, भीतर शिकायत पड़ी है।

तुम कितना ही कहो कि ‘मेरी कोई शिकायत नहीं है’ लेकिन तुम्हारी आंखें, तुम्हारा व्यक्तित्व-सब कहेगा कि ‘शिकायत है।’ तुम यह कह रहे हो ‘चीज तो बुरी है; न होती तो अच्छा था। अब हो गयी है, तो हम स्वीकार करते हैं।’ लेकिन यह स्वीकार अधूरा है; ऊपर-ऊपर है। भीतर गहरे में इसका कोई अस्तित्व नहीं है। और अगर तुम झांकोगे, तो तुम पाओगे कि भीतर कहीं इनकार है। उस इनकार को दबाने के लिए ही तुमने स्वीकार का उपयोग किया है। क्योंकि जब स्वीकार होता है, तो जीवन का फूल खिलता है। जब स्वीकार होता है-बिना इनकार के, तो तुम उस जगह पहुंच गये, जिसके आगे जाने को कोई जगह ही नहीं।

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इसलिए फकीरों को तुम नाराज तो न देखोगे, लेकिन उदास देखोगे। मुनियों को, साधुओं को तुम नाराज तो न देखोगे, लेकिन हताश देखोगे। नाराजगी सांसारिक आदमी का लक्षण है-वह शिकायत कर रहा है। उसकी जो उदासी है, वह परमात्मा पर फेंक रहा है।

फकीर ने, संन्यासी ने यह काम बंद कर दिया। वह उदासी को परमात्मा पर नहीं फेंकता। वह राजी है कि ठीक है, लेकिन प्रसन्न नहीं है। न होता तो अच्छा था; हो गया तो राजी है। भीतर अस्वीकार है-बहुत गहरे में शिकायत है। ऊपर से आवरण है कि ‘मेरी कोई शिकायत नहीं।’

असल में जब तुम कहते हो कि ‘मेरी कोई शिकायत नहीं’ तो तुमने शिकायत कर दी। अन्यथा तुम कहते क्यों ? अगर सच में ही कोई शिकायत न थी, तो ‘शिकायत नहीं है मेरी कोई’-यह बात भी क्यों उठती ? शिकायत हो गई। जब तुम किसी से कहते हो : ‘मैं नाराज नहीं हूं’ तो तुम अगर सच में ही नाराज नहीं थे, तो यह बात क्यों उठती ? यह तुमने कहा क्यों होता ? कहने में तुमने नाराजगी ही जाहिर की है। लेकिन यह जाहिर करना अब सूक्ष्म है।

सांसारिक आदमी की नाराजगी स्थूल है; तुम्हारी नाराजगी सूक्ष्म है सांसारिक आदमी इतना कुशल नहीं है, लेकिन परमात्मा की आंखों को धोखा देना तो इतना आसान न होगा। वह तुम्हारे भीतर छिपी हुई शिकायत को भी देख रहा है। तुम उसे कितने वस्त्रों में ओढ़ लो और तुम कितने ही सुंदर आभूषणों में सजा लो, तो भी इतना हो सकता है कि शिकायत नाराजगी न बने; लेकिन वह प्रसन्नता कभी नहीं बन सकती। और जब तक जीवन में प्रसन्नता न हो, जब तक एक उत्फुल्लता का प्रवाह न हो, जब तक तुम नाच ही न उठो-तब तक कैसी फकीरी ! तब तक कैसा संन्यास !

दूसरी स्थिति है : जब शिकायत के लिए प्रसन्नता है; जब शिकायत के लिए धन्यवाद है; जब दंड भी मिलता है, तो तुम पुरस्कार समझते हो। और जब परमात्मा तुम्हें गिराता भी है गड्ढों में, तो तुम बहुत गहरे में जानते हो कि उठाने के लिए ही उसने गिराया। तुम्हारी नजर उठाने पर रहती है। ‘उसने कुछ सिखाने के लिए ही मिटाया है। उसकी अनुकंपा है कि उसने तुम्हें चुना-गिराने के लिए। तुम पर उसका ध्यान है। उसने तुम्हें दुख दिया, तो तुम्हें ध्यान दिया; उसने तुम्हारी तरफ नजर की।’

उसकी तरफ से आया हुआ दुख भी सौभाग्य है। तब अभिशाप वरदान बन जाते हैं; तब जीवन में एक प्रसन्नता आती है।

पहली घड़ी है : नाराजगी की। दूसरी घड़ी है : उदासी की। तीसरी घड़ी है: प्रसन्नता की-कि तुम अहोभाव से भरते हो। एक अनुग्रह है-तुम्हारे भीतर कि ‘तूने मुझे दुख दिया; मेरी तरफ नजर की। मुझे इस योग्य माना कि दुख दे। मुझे बदलने योग्य समझा-मुझे काटने, निखारने योग्य समझा। मुझे पीड़ा दी ताकि मैं निखर के निकल सकूं; जैसे सोना निखरता है आग से। तूने आग फेंकी, ताकि कचरा जल जाये और मेरा स्वर्ण प्रकट हो जाये।’ एक प्रसन्नता है।

ऐसा फकीर तुम्हें नाचता हुआ मिलेगा। तुम उसे दुख में न पा सकोगे। उसे दुख देने का कोई उपाय ही नहीं है। क्योंकि वह दुख को भी सुख में बदलने की कीमिया जानता है। अनुग्रह का भाव वह कीमिया है, वह जादू है, जिससे दुख सुख बन जाता है; अभिशाप वरदान हो जाते हैं, मृत्यु जीवन जैसी मालूम पड़ती है और अंधकार रोशन हो जाता है।

यह दूसरी स्थिति है; लेकिन यह अंतिम स्थिति नहीं है। क्योंकि जब तुम शिकायत में भी प्रसन्न होते हो, तब भी तुमने शिकायत तो स्वीकार कर ली।

पहला आदमी नाराज हुआ, दूसरा आदमी उदास हुआ, तुम प्रसन्न हुए; प्रतिक्रिया हो गई। माना कि तुम्हारी प्रतिक्रिया प्रसन्नता की है और पहले आदमी की प्रतिक्रिया नाराजगी की थी और दूसरे आदमी की प्रतिक्रिया उदासी की थी। लेकिन एक बात तीनों में है कि तुम तीनों ने ‘रिएक्ट’ किया, प्रतिक्रिया की; तुमने कुछ किया। तुम्हारे करने में ही भूल है। चोट तो लगी है; एक नाराज हो गया है; एक उदास हो गया है। एक ने चोट पर फूल रख लिए हैं; उसने चोट को ढांक लिया। लेकिन ढांक तुम क्या रहे हो ! तुम्हारी प्रसन्नता के पीछे क्या छिपा है ? तुम किस बात की धन्यवाद दे रहे हो ? अगर शिकायत ही न उठी थी, तो धन्यवाद कैसा !

सब धन्यवाद शिकायत का ही शीर्षासन करता हुआ रूप है। जब तुम धन्यवाद देते हो, तब तुम यही कह रहे हो कि ‘तेरी बड़ी कृपा है।’ लेकिन अगर अकृपा मालूम नहीं पड़ी, तो कृपा कैसे मालूम पड़ेगी। और उसकी तरफ से आती हुई चोट नहीं दिखाई पड़ी, तुम उसे सुख में कैसे बदलोगे ? माना कि अनुग्रह का भाव दुख को सुख में बदल देता है, अभिशाप को वरदान बना देता है; लेकिन इस कीमिया का उपयोग तो तुम तब भी करोगे, जब अभिशाप दिखाई पड़ जाये। फिर तुम उसे बदलोगे वरदान में। दुख पकड़ में आ जाये, फिर तुम उसे सुख में बदलोगे। लेकिन पहली चोट दुख की हो गई। माना कि तुमने उसे बदला और तुम बड़े कारीगर हो, और तुम्हारे पास एक महामंत्र है। तुम्हारे जीवन में दुख न आयेगा। तुम्हें कोई दुखी न कर सकेगा। तुम प्रसन्न रहोगे-नाचते रहोगे। लेकिन तुम्हारे नाच, तुम्हारे पैरों में बंधे हुए घुंघरू से भी-अंतिम अवस्था का आदमी जानता है-शिकायत का स्वर उठ रहा है। अन्यथा तुम नाचोगे क्यों ?

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जिसने शिकायत ही नहीं की, वह धन्यवाद भी नहीं दे सकता। वह चौधी दशा है-वह बुद्धत्व की दशा है। वहां बुद्ध प्रतिक्रिया ही नहीं करते न नाराज हैं, नाराजगी का अर्थ है : आक्रमण। न उदास, हैं, उदासी का अर्थ है: अनाक्रमण। न वे प्रसन्न हैं; क्योंकि प्रसन्न व्यक्ति फिर आक्रमक हो गया। उदासी मध्य में है। एक तरफ-नकारात्मक उदासी है, जो नाराजगी बनती है; शिकायत बनती है। एक तरफ-विधायक स्थिति है, जिसको कि हम प्रसन्नता बना देते हैं। फिर बुद्धत्व है-जो दोनों से शून्य है।

बुद्ध को किसी ने नाचते नहीं देखा। बुद्ध को किसी ने प्रसन्न भी नहीं देखा; उदास भी नहीं देखा-न कभी दुखी, न कभी सुखी; न कभी हंसते हुए, न कभी रोते हुए। बुद्धि को लोगों ने ऐसे देखा, जैसे वे हों ही न। क्योंकि जब तुम मिट जाओगे, तो कौन प्रतिक्रिया करेगा ! कौन धन्यवाद देगा ?

इन तीनों स्थितियों में एक बात समान है, वह है-प्रतिक्रिया रिएक्शन। और तब तीनों के पीछे अहंकार मौजूद है। क्योंकि प्रतिक्रिया कौन करेगा ? तुम मौजूद हो, अभी तुम मिटे नहीं कभी तुम नाराज थे, तब भी तुम थे। कभी तुम उदास थे, तब भी तुम थे। कभी तुम प्रसन्न हो तब भी तुम हो; अहंकार मौजूद है। ये अहंकार की ही तीन दशाएं हैं। अभी निर-अहंकारफलित नहीं हुआ, अन्यथा कौन रहेगा। उस चौथी की सूचक है।

अब हम इस कहानी को पढ़े।
एक बार राबिया बीमार थी। सहानुभूति में दो फकीर उसे देखने आये; एक थे हसन और दूसरा था मलिक। दोनों प्रसिद्ध सूफी फकीर हैं। हसन ने कहा : ‘राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे, फकीर को उससे कोई शिकायत नहीं होती। वह उसे चुपचाप सह लेता है।’

ये शब्द समझने जैसे हैं। क्योंकि हसन ने समझा होगा कि राबिया की बीमारी परमात्मा के द्वारा दिया गया कोई दंड है। तो हसन ने सांत्वना देने के लिए राबिया को कहा :‘राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे…।’ लेकिन बीमारी हसन को सजा मालूम पड़ती है ! यह हसन पहली दशा में है। यह सांसारिक तो नहीं रहा, संन्यासी हो गया है। लेकिन अभी संन्यासी पूरा नहीं हो पाया है; रास्ते पर है। अभी मंजिल नहीं आई है; अभी उसने पहला कदम ही उठाया है। और इसे पता भी नहीं है कि जिससे बात कर रहा है, वह मंजिल पर पहुंच गई है।

इसी हसन और राबिया के संबंध में एक घटना और है। हसन एक बार राबिया के घर मेहमान हुआ तो उसने सुबह ही कहा, ‘‘कुरान कहां है ? सुबह की प्रार्थना के बाद मैं सदा कुरान से कुछ पढ़ता हूं।’ तो राबिया ने कहा, ‘तुम ढूंढ़ों। कहीं न कहीं घर में होगा। हसन को हैरानी हुई, उसने कहा, ‘कुरान ! और क्या इस तरह व्यवहार किया जाता है, कि कहीं न कहीं होगा। और क्या तुम रोज कुरान नहीं पढ़ती हो, जो तुम्हें पता न हो कि कुरान कहां रखा है ?’ राबिया ने कहा, ‘पढ़ लिया एक बार। समझ लिया एक बार। फिर बात हो गई; फिर तब से कुरान नहीं पढ़ीं हूं। तुम्हीं ने पूछा है, इसलिए कहती हूँ कि होगा कहीं। था जरूर-इस घर में। अगर कोई ले न गया हो, तो जरूर कहीं पड़ा होगा।’

हसन को बड़ी पीड़ा हुई। उसने कहा, ‘पड़ा होगा ! कुरान के लिए ऐसे शब्द।’ और जब हसन ने ढूंढ़ा तो निश्चित ही कुरान एक कोने में पड़ा था, उसमें बहुत दिन की धूल जम गई थी; किसी ने उसे छुआ भी नहीं था। उसने कुरान के ऊपर की धूल झाड़ी और कहा, ‘राबिया, यह तो उचित नहीं है।’ फिर उसने कुरान पढ़ा, तो और हैरान हुआ; क्योंकि कई जगह कुरान में राबिया ने कुछ पंक्तियां काट दी थीं। इससे बड़ा कुफ्र नहीं है। यह बड़े से बड़ा पाप है। कुरान में तरमीम-संशोधन ? जैसे मुहम्मद से कुछ भूलें हो गई हों। उसने कहा, ‘यह किस नासमझ ने कुरान में सुधार किये हैं ? लकीरें कटी हैं !’ राबिया ने कहा, ‘वे मैंने ही किये हैं। क्योंकि जब मुझे कुरान समझ में आया, तो लगा कि ये वचन ठीक नहीं हैं। जब तक समझ में नहीं आ या था, तब तक सब ठीक था। क्योंकि लिखा है-इस वचन में कि ‘शैतान को घृणा करो।’ लेकिन जब से मैंने परमात्मा को जाना, तो घृणा असंभव हो गई। अब शैतान भी मेरे सामने खड़ा हो, तो घृणा करने का कोई उपाय नहीं है। अब तो शैतान खड़ा हो कि परमात्मा खड़ा हो, मैं तो प्रार्थना ही और प्रेम ही कर सकती हूं। इसलिए लकीर काट दी।’

हसन…कहते हैं, छोड़कर चला गया-उस कुरान को। उसने कहा, ‘यह कुरान अपवित्र हो गया। सुधारा हुआ कुरान किसी ने सुना है ! और राबिया, तू भ्रष्ट हो गई है।’

पहली सीढ़ी पर खड़े हुए संन्यासी को, फकीर को अंतिम अवस्था का संन्यासी भ्रष्ट मालूम पड़ सकता है। क्योंकि जिसको वह बड़ी मुश्किल से साध रहा है, उसको यह आखिरी अवस्था का आदमी साधता ही नहीं। जिसके लिए वह चेष्टा कर रहा है, उसके लिए यह आखिरी अवस्था का आदमी चेष्टा ही नहीं करता।

जो नाच रहा है, वह अगर बुद्ध के पास जायेगा, तो वह यही सोचेगा कि शायद यह आदमी उदास बैठा है, इसलिए नाचता नहीं है। वह बुद्ध से कहेगा, ‘‘उठो भी, नाचो भी, परमात्मा को धन्यवाद दो !’ उसे पता नहीं आखिरी अवस्था में धन्यवाद खो जाते हैं, नाच खो जाते हैं।

एक बात समझ लें; उदासी के साथ ही प्रसन्नता जुड़ी है। जब उदासी खो जाती है, तब प्रसन्नता भी खो जाती है। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो आदमी उदास, नहीं हो सकता, वह प्रसन्न कैसे होगा ? और जिसकी आंखों से आंसू नहीं गिर सकते, वह हंसेगा कैसे ? कठिन है ? ये दोनों जुड़े हैं।

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तुम रोते हो, तुम हंस सकते हो तुम्हारी हंसी के पीछे आंसुओं का हाथ है। तुम्हारी हर हंसी में आंसुओं का स्वाद है। और अगर तुम गौर से देखोगे, तो तुम आंसुओं को भीतर छुपा पाओगे।

गांव में ग्रामीण स्त्रियां बच्चों को ज्यादा नहीं हंसने देतीं; वे कहती हैं: ‘ज्यादा मत हंसो, नहीं तो रोओगे।’ बच्चा अगर ज्यादा हंस ले, तो फिर रोता है। क्योंकि जब एक चीज खतम हो गई, तो दूसरा पहलू प्रकट हो जाता है। तुम भी अगर ज्यादा हंस लोगे, तो आंख में आंसू आने लगेंगे। कभी हंस के देखो तो तुम धीरे से पाओगे कि जब हंसी चुक जाती है, तो तुम उदास हो जाओगे। शायद इसलिए हम हंसने में कंजूसी करते हैं, हम उसे रोक-रोककर खर्च करते हैं, क्योंकि डर है कि पीछे जो छिपा है, वह प्रकट न हो जाये।

नीत्से का वचन है कि ‘मैं हंसता रहा हूं, तो लोग समझते हैं: मैं बहुत प्रसन्न हूं। लेकिन जहां तक मैं जानता हूं, अपने बाबत, बात बिलकुल उलटी है। मैं इसलिए हंसता हूं कि कहीं रोने न लग जाऊं। तो हंसी में रोने को छिपाये हूं।’ तुम्हारे सब नाच बहुत गहरे में शिकायत को छिपाये हुए हैं।
कहा हसन ने : ‘राबिया, अल्लाह जो भी सजा दे…।’

आखिरी अवस्था के आदमी को न तो कोई सजा है, न कोई पुरस्कार है। सजा और पुरस्कार तो तभी तक हैं, जब तक पुरस्कार की आकांक्षा है। दुख तो तभी तक दुख मालूम पड़ता है, जब तक सुख की वासना है। जब तक तुम फूल की मांग करते हो, तब तक कांटा कांटा जैसा लगता है। जब फूल की मांग ही छूट गई, तो कांटे की चुभन भी चली गई। कांटे की चुभन फूल की आकांक्षा में छिपी है।

तुम जो मांगते हो, उससे विपरीत मिल जाये, तो सजा मालूम पड़ती है। यह हसन मांगता तो होगा स्वास्थ्य, इसलिए बीमारी सजा मालूम पड़ती है। हसन मांगता तो होगा धन, इसलिए गरीबी सजा मालूम पड़ती है। यह हसन मांगता तो होगा शाश्वत जीवन, इसलिए मृत्यु सजा मालूम पड़ती है। इसका क्या अर्थ हुआ ?

कोई चीज न तो सजा है और न पुरस्कार। तुम्हारी व्याख्या पर, तुम्हारी वासना पर निर्भर है कि वह कैसी दिखाई पड़ेगी। राबिया सिर्फ बीमार है। हसन को दिखाई पड़ता है, यह सजा है। तथ्य तो इतना ही है कि ‘राबिया बीमार है।’ इसमें सजा और पुरस्कार का क्या सवाल है !

तथ्य को हम सीधा क्यों नहीं देख पाते ? हम क्यों अपने मंतव्य उसमें जोड़ते हैं ? यह हसन बीमार नहीं होना चाहता। यह हसन बीमारी से डरता है। यह हसन सदा स्वस्थ रहना चाहता है। और जो यह राबिया से कह रहा है असल में वह अपने से ही कह रहा है। राबिया तो एक निमित्त है। वह अपना मन प्रकट कर रहा है। कह रहा है : ‘अल्लाह जो भी सजा दे, राबिया, फकीर को कोई शिकायत नहीं होती।’ शिकायत हो गई। और क्या शिकायत होगी ? सजा दी है अल्लाह ने-यह शिकायत हो गई। ‘शिकायत नहीं होती’, यह कहा कि शिकायत हो गई। बात समाप्त हो गई। वह उसे चुपचाप सह लेता है।

‘सह लेने’ का अर्थ क्या होता है ? सह लेने का अर्थ होता है: तुम विरोध में हो। तुम खुशी को तो नहीं सहते ! तुम सदा दुख को ही सह सकते हो। कोई नहीं कहता है कि ‘मैं खुशी को चुपचाप सह लेता हूं।’ तुम कभी नहीं कहते कि ‘मैं सौभाग्य को चुपचाप सह लेता हूं।’ तुम सदा दुर्भाग्य को ही चुपचाप सहते हो।

‘सहने’ का शब्द ही फकीर के होंठों पर शोभा नहीं देता। सहिष्णुता-सह लेना-असहिष्णुता का एक रूप है। उसके पीछे विपरीत हुआ है। और फिर-‘चुपचाप’।

चुपचाप का मतलब है : तुम दूसरे से न कहो, लेकिन अपने तईं तो तुम जानते ही हो।। चुपचाप में दूसरे को पता न चलेगा; लेकिन क्या तुमको भी पता नहीं चल रहा है ? यह तो बात सही नहीं है।
चुपचाप सहने का अर्थ होता है कि मैं जानता हूं कि दुख है, लेकिन किसी को कहता नहीं हूं क्योंकि क्या शिकायत करनी; फकीर का वह लक्षण नहीं। तब फकीरी सहज नहीं है-इस अवस्था में। जिसको कबीर कहते हैं: साधो सहज समाधि भली’-यह समाधि नहीं है। हसन उस समाधि से परिचित नहीं है। हसन चेष्टा कर रहा है; और चेष्टा से जीवन की जो परम धन्यता है, वह कभी नहीं खिलती। चेष्टा से यही होने वाला है।

शिकायत करते थे, तो तुम उलटा साध लोगे कि शिकायत नहीं करते। पहले दुख दुख जैसा मालूम पड़ता था, तुम कहते फिरते थे..। साधारण आदमी अपने दुखों का रोना रोता रहता है। अगर तुम लोगों की बातचीत सुनो, तो नब्बे प्रतिशत बातचीत तो दुख का रोना होती है। लोग अपना दुख बताते फिरते हैं; बढ़ा-चढ़ाकर अपने दुखों की चर्चा करते रहते हैं। जैसे अपने घाव को उघाड़ने में कुछ बड़ा मजा आता है ! या जैसे कि कोई दूसरा तुम्हारे घाव को देख लेगा, तो कुछ राहत मिलती है ! शायद सहानुभूति की आकांक्षा है कि कोई सहानुभूति दे। कोई कहे कि बहुत बुरा हुआ है, तो तुम्हारे मन पर मरहम पट्टी हो जाती है। इसलिए हम अपने दुख का रोना रोते हैं। लेकिन फकीर इससे उलटा करता है; वह अपने दुख को छिपाता है; वह रोता नहीं। वह किसी से कहता नहीं; वह चुपचाप सहता है।

-ओशो (जीवन क्रान्ति)

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