मौत से भयभीत हैं लोग लेकिन मौत तो आनी ही है दो दिन देर से ही सही लेकिन आनी तो है ही


वर्तमान समाज, राजनीती और राजनीतिज्ञों को देखकर आज फिर सोच रहा हूँ कि नैतिकता, पाप-पुण्य सिवाय भ्रम के और कुछ नहीं हैं | ये कमजोरों निर्धनों पर लागू किये जाते हैं, लेकिन धनाढ्यों, बाहुबलियों, अपराधियों और कट्टरपंथियों पर लागू नहीं होते |

विस्तार से….

जिसके पास धन है, वह इंसानों का माँस भी खाए तो पाप नहीं है, लेकिन दूसरा मछली भी खाए तो पाप हो जाता है | वनों को मिटाकर लाखों वन्यजीवों को मौत देने वाले पुण्यात्मा माने जाते हैं लेकिन केवल भोजन के लिए हत्या करने वालों को पापी और अधर्मी माना जाता है | वाइफ स्वैपिंग, लिविंग इन रिलेशनशिप से किसी को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रेमी जोड़ों को जिन्दा जला दिया जाता है | हज़ारों करोड़ों के घोटाले करने वाले सत्तासुख भोगते हैं, लेकिन एक वक्त की रोटी चुराने वाला जेल में ठूँस दिया जाता है | हज़ारों की भीड़ जाकर एक गरीब वृद्ध की जान ले लेती है, लेकिन यही हजारों की भीड़ भूमाफियाओं, खनन माफियाओं से खौफ खाती है | समाज की कुरीतियों को उजागर करने वाले साधू-संतों, बुद्धिजीवियों को जान से मारने की धमकी दी जाती है और मौका मिलते ही मार भी दिया जाता है, लेकिन जनता को ठगने वाले अय्याश साधू संतों पर कोई आँख उठाने की भी हिम्मत नहीं करता |

एक व्यक्ति की हत्या हो जाती है और समाज सिहर उठता है, आतंकित हो जाता है, लेकिन एकजुट हो जाएँ आतंकियों के विरुद्ध यह विचार कभी नहीं आता | और कानून भी हमारा बड़ा ही अजीब है ! राजनैतिक गुंडों मवालियों की सेना हथियार रखे तो आपत्ति नहीं है, लेकिन आम नागरिक हथियार रखे तो आपत्ति होने लगती है | इस कानून को हज़ारों की भीड़ दिखाई नहीं देती जो हथियारों से लैस होकर किसी गाँव में धावा बोलती है……

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ऐसे समय में कुछ विद्वान्, ब्रम्हज्ञानी कहते हैं ईश्वर को खोजो | कहते हैं खुद का भला सोचो | कहते हैं ध्यान और मेडिटेशन सिखाओ | कहते हैं समाज में अच्छी बातें भी हैं उसे दिखाओ….. जैसे कि अच्छी बातें दिखाने से समाज सुधर जाएगा और आतंकी, उपद्रवी उत्पात मचाना बंद कर देंगे | अगर यह संभव था तो हजारों सालों से रामलीला दिखाई जा रही है… समाज सुधरा क्यों नहीं ? हज़ारों सालों से कीर्तन भजन से लेकर नमाज, रोजा सब कुछ हो रहा है समाज सुधरा क्यों नहीं ?

मौत से भयभीत हैं लोग लेकिन मौत तो आनी ही है दो दिन देर से ही सही लेकिन आनी तो है ही | फिर भय कैसा ? क्यों नहीं खुल कर सभी कहते कि ठीक है अब हम भी तैयार हैं आतंकियों की सेनाओं से लड़ने के लिए यदि कानून और पुलिस भी उनके साथ है तब भी हम सब निपटने के लिए तैयार हैं | अब हम आमने सामने कि लड़ाई के लिए तैयार हैं | जिस दिन हम अपनी कायरता त्याग देंगे उसी दिन यह देश नेताओं के पालतू कुत्तों के आतंक से स्वतंत्र हो जाएगा | जिस धन के दम पर ये कुत्ते पाले जाते हैं, वे धन हम ही इनको देते हैं चाहे हमारे घर में खाने को रोटी ही न हो, लेकिन इन नफरत फैलाने वाले, दंगा करवाने वाले नेताओं और उनके पिल्लों को हम ही पालते हैं |

क्या आज भी हम अपनी कायरता से मुक्त नहीं होना चाहते ?

क्या कभी सोचा है कि आज राजपूतों की सेना जाकर एक वृद्ध की हत्या कर देती है और हिंदुत्व के ठेकेदार और मंत्री उसे जायज मानते हैं | कल मुस्लिम सेना जाकर इनके किसी आदमी को मार देगी, शुद्र और दलितों की सेना जाकर किसी भूमाफिया पण्डे को मार देगी….. और इसी प्रकार सभी अपने अपने न्याय खुद ही करने लगेंगे तब क्या होगा ? ~विशुद्ध चैतन्य

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