धार्मिकों का गाँव-दादरी

अभी मैं रविश जी का वह दौरा देख रहा था जो उन्होंने अख़लाक़ के गाँव का किया था | उनका तरीका मुझे बहुत ही पसंद आया क्योंकि वह रिपोर्टिंग एक जिन्दा रिपोर्टिंग थी | बाकि रिपोर्टरों की तरह खाना-पूरी के लिए की गई रिपोर्टिंग नहीं थी |

इस एपिसोड में जो मुझे एक बात देखने मिली कि जिन लोगों ने मंदिर के माइक से भीड़ को बुलाया उनको गाँव के लोग नहीं पहचानते थे लेकिन हज़ार से भी अधिक लोग उनके उकसावे में जमा हो गये एक परिवार पर हमला करने के लिए | हत्या भी हो गयी लेकिन वे हज़ार से अधिक गाँव वालों को नहीं पता कि हत्या किसने की | इतना तोड़-फोड़ हुआ लेकिन किसी को नहीं पता कि तोड़-फोड़ किसने किया | एक हज़ार से भी अधिक लोग आये लेकिन किसी को भी नहीं पता कि वे लोग कौन थे | जिन नामजद लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया वे बेक़सूर लोग हैं ऐसा गाँव के लोगों का कहना है | पड़ोसियों ने इस अवसर का लाभ उठाया और छुट्टियाँ मनाने चले गये | और वापस आ भी गये तो उनको नहीं पता होगा कि वे लोग कौन थे | इस प्रकार यह सिद्ध हो जायेगा कि जो भीड़ आई वे आसमान से टपकी थी और जो हत्यारे थे वे भी आसमान से ही टपके थे……

तो फिर ऐसे बेहोश समाज की आवश्यकता ही क्या है ? इन भेड़-बकरियों के समाज में जीने से अच्छा है कि व्यक्ति अकेला ही जिए क्योंकि इनके साथ जीने का कोई लाभ नहीं है | ये धार्मिकों का समाज माँस के टुकड़ों के लिए जान ले लेता है लेकिन खुद को शाकाहारी बताता है | ये मांस के टुकड़ों पर बिलकुल वैसे ही लड़ते हैं जैसे कुत्ते और गीदड़ लड़ते हैं | फिर भी घमण्ड हैं इनको कि ये धार्मिक हैं | ये धर्म, ये मंदिर-मस्जिद जब एक गाँव को ही एकजुट नहीं कर पाया तो क्या लाभ ऐसे मंदिर मस्जिदों का और धर्मों का ? ये धर्मों के दड़बों को ही मिट जाना चाहिए अब क्योंकि इनसे किसी गरीब, आम व्यक्ति का भला नहीं होता, लेकिन नेताओं और अपराधियों की सुरक्षा और दंगा आदि भड़काने का कारण बना हुआ है |

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अब यह नारा लगाना भी बंद कर दिया जाना चाहिए कि हमारा धर्म महान है…. दो कौड़ी का भी नहीं है ये धर्म क्योंकि कहीं दलित बुजुर्ग मारा जाता है तो कहीं मुसलमान बुजुर्ग मारा जाता है धर्म और जाति के नाम पर, लेकिन इन धार्मिक भेड़ों में इतना साहस नहीं होता कि अपराधी को सामने कर सकें | उलटे उन्हें बचाने की जुगत लगाने लगतीं हैं | जब मुसलमान मारा जाए तो हिन्दू कहेंगे कि ठीक हुआ साला मुल्ला मारा गया | जब कोई दलित मारा जाए तो हिंदुत्व के ठेकेदारों के मुँह से आवाज भी नहीं निकलेगी | जब कोई हिन्दू मारा जाए तो मुस्लिम कहेंगे कि अच्छा हुआ | फिर कहते हैं कि हमारा धर्म महान है | क्या वास्तव में महान है ?

यह तो कुछ वैसी ही बात हो गयी जैसे एक आदमी एक मिठाई की दूकान में गया और एक प्लेट समोसे का ऑर्डर देकर बैठ गया | जब समोसे आये तो खाने के साथ भी बोला कि पिछले हफ्ते जो समोसे बनाये थे ये उतने बढ़िया नहीं हैं | वेटर बोला अरे साहब ये उसी दिन के समोसे हैं…. |

इसी प्रकार हम धर्मों की दुहाई दे रहे हैं कि हज़ारों साल पुरानी है | हमारे पूर्वजों ने यह किया और वह किया…. लेकिन वर्तमान में क्या हो रहा है उसकी जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं है | नेताओं ने धर्म को अपना हथियार बना लिया और उसी से हमें आपस में लड़ा रहे हैं और हम लड़े चले जा रहे हैं गर्व के साथ क्योंकि हमारा धर्म महान है | फिर उस धर्म के नाम पर नेताओं के पालतू कुत्ते आकर किसी किसी की भी हत्या करके चले जाएँ, किसी के भी घर में आग लगा दें…. और धर्मों के ठेकेदार कहेंगे कि वे लोग गलत थे, हमारा धर्म सही है | हमा
रा धर्म तो प्रेम प्यार और भाईचारा सिखाता है | लेकिन यही प्रेम प्यार और भाई चारा तब धरा का धरा रह जाता है जब भीड़ बनकर टूट पड़ती है | तब इन धार्मिकों को उस भीड़ में एक भी चेहरा नहीं पहचान में आता है |

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कभी कभी बहुत ही हंसी आती है मुझे ऐसे दड़बों को धर्म मानने वालों पर जिन दड़बों से अपराधियों, आतंकियों, और नफरत के बीज बोने वाले नहीं दिखाई देते | ये हरे भगवा रंग के चश्मों से दागी नेता और मंत्री नहीं दिखाई देते | इन धार्मिक चश्मों से अपने ही धार्मिक कम्बलों में छुपे पिस्सू और खटमल नहीं दिखाई पड़ते | लेकिन गर्व है इनको कि हमारा धर्म महान है | ~विशुद्ध चैतन्य

खबर देखिये…

  • यह देखिये गाँव के लोगों को पता ही नहीं है कि वे हज़ार लोग कौन थे और कहाँ से आये थे….और जाहिर है कि इस गाँव में मंदिर और मस्जिद भी है तो धार्मिकों का ही गाँव है |

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