Earth-शास्त्र

मेरी अनपढ़ बुद्धि फिर से आज इस विषय पर विचार कर रही थी कि अर्थ-शास्त्र, अर्थ-शास्त्री, आर्थिक उत्थान आदि हैं क्या ? विकास क्या है ? आत्मनिर्भरता क्या है ? समृद्धि क्या ?

जानता हूँ कि पढ़े-लिखों के पास दुनिया भर के तर्क और प्रमाण मिल जायेंगे यह सिद्ध करने कल लिए आर्थिक उत्थान का अर्थ है विदेशियों को अपनी भूमि का मालिक बनाकर उनकी नौकरी करना ही आरती उत्थान व विकास है | पढ़े-लिखे लोग सिद्ध कर देंगे कि आत्मनिर्भरता का अर्थ है महँगी डिग्री लेकर अच्छी नौकरी पाना और लोन लेकर ब्याज चुकाना | गाँव की जमीन बेचकर शहर में लोन लेकर मल्टीस्टोरी छत्तों में से एक फ्लैट लेना समृद्धि है | पढ़े-लिखे लोग मानते है कि सुख का अर्थ है पैसे कमाना आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए और आवश्यकताएँ बढाते जाना | पढ़े-लिखे मानते है कि शिक्षा का अर्थ है अच्छे नंबरों से पास होना और उन नंबरों को रुपयों में कन्वर्ट करना….. लेकिन मेरी अनपढ़ बुद्धि इन सबसे सहमत नहीं है |

विस्तार से…..

मेरी बुद्धि कहती है कि अपनी ही जमीन को उपजाऊ बनाकर कम से कम दो वक्त के भोजन कि व्यवस्था करना ही आर्थिक समृद्धि है | मेरी बुद्धि कहती है कि नौकरी करने और सहयोगी होने में अंतर है | मेरी बुद्धि कहती है कि अपने लिए इतनी भूमि कि व्यवस्था करना कि उससे वह इतना उत्पादन कर सके, जिससे वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके | मेरी अनपढ़ बुद्धि कहती है कि सुख का अर्थ है दिन भर कड़ी मेहनत करके शाम को कीर्तन, भजन, नाचने गाने का और सुबह ध्यान, योग, सामाजिक विषयों पर चर्चा करने के लिए समय निकाल सके | लेकिन मैं जानता हूँ कि आप लोग पढ़े-लिखे हैं, बड़ी बड़ी विलायती डिग्रियां हैं आप लोगों के पास और ऊपर अंग्रेजी बोलते हैं….. .इसलिए मेरे जैसे अनपढ़ों कि बातें गँवारू, और मुर्खतापूर्ण ही लगेंगी |

अभी थोड़ी देर पहले एक मास्टरजी आये और कहने लगे कि गुरूजी आप चाहें तो हम लोग कहीं और आश्रम के जमीन कि व्यवस्था कर लेते है और आप अपने हिसाब से जैसा चाहें वैसा उसे चलायें | यहाँ तो ये लोग कुछ करने देंगे नहीं और धीरे धीरे भूमाफिया सारी जमीन हड़प ही जायेंगे | अभी तक देवघर के बीस से भी अधिक आश्रमों की जमीनें ये लोग हड़प चुके हैं तो यह भी जाएगा ही जल्दी ही | तो आप हमारे साथ चलिए……

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सुनने में अच्छा लगता है….. लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि नये आश्रम की भूमि भी कोई हडपने के लिए न पहुँचे | में तो जिस भी आश्रम में गया हूँ, उसी आश्रम में भूमि-विवाद मिला मुझे | मथुरा में भी एक आश्रम है जो वीरान पड़ा है लेकिन उसपर भी भूमाफियाओं की कुदृष्टि पड़ी हुई है | क्योंकि आश्रम की जमीन काफी अधिक होती हैं और उसे बेचने पर करोड़ों का लाभ होता है | दो ढाई लाख जज को रिश्वत देने में खर्च होते हैं और दस पन्द्रह हज़ार गुंडों-बदमाशों पर खर्च करना होता है….. बस….. फिर केस कोर्ट में और बूढ़े साधू संन्यासी केस लड़ते लड़ते मर जाते हैं एक दिन और जमीन हो जाती है उनकी |

तो सिद्धांत बदल गया नई शिक्षा पद्धति के कारण | पहले आश्रमों के पास अपने खेत होते थे, अपने गौशाला हुआ करते थे और वे आत्मनिर्भर हुआ करते थे | आज आश्रम दान और भीख पर निर्भर होते हैं या फिर ट्रस्टियों के रहमो करम पर | ट्रस्टी आश्रम के मालिक और होते है संन्यासी उनके अवैतनिक नौकर | इसलिए यदि मैं नए आश्रम में भी गया तो बात वहीँ की वहीँ रहेगी | यहाँ कम से कम
मैं किसी का नौकर तो नहीं हूँ |

मैं जिस प्रकार का आश्रम बनाना चाहता हूँ इसे वह है आत्मनिर्भर और सामाजिक हितार्थ कार्य व शिक्षा प्रदान करने वाला | क्योंकि मेरी अनपढ़ बुद्धि अर्थ शास्त्र को कुछ इस प्रकार देखती है;


अर्थ = धन/सम्पत्ति | अर्थ = Meaning | Earth = पृथ्वी |

अर्थ यानि विनिमय की योग्यता | यह योग्यता किसी भी रूप में हो सकती है, जैसे ध्यान करने की सुविधा अपनी भूमि पर दिया जाए और उसके बदले आवश्यक शुल्क लिया जाए | गौशाला, पाठशाला, आदि से आवश्यक आय किया जाए | यदि कृषि योग्य भूमि है तो उससे आवश्यक सब्जियाँ, फल व अन्न उपजाकर एक भाग अपने लिए रखकर और दूसरा भाग विनिमय में लगाकर आर्थिक रूप से समृद्ध रहा जाए बिना मानसिक असहजता व अराजकता के |

अर्थ का दूसरा मतलब परिभाषा भी है | जैसे फलाँ शब्द का अर्थ बताओ यानि मीनिंग बताओ | अंग्रेजी में पृथ्वी को अर्थ कहते हैं | पृथ्वी अर्थ पूर्ण ही है और प्रत्येक प्राणी के लिए पृथ्वी में इतनी व्यवस्था है कि वह अपने जीवनयापन लायक भूमि की व्यवस्था कर सकता है | लेकिन एक भेड़-चाल में चल पड़े सभी लोग और शहरों में भाग रहे हैं | क्योंकि पढ़ाया गया, समझाया गया कई वर्षों से कि नौकरी से ही सुख समृद्धि मिलेगी, खेती करने से नहीं मिलेगी…. और हमारे पास उदाहरण भी है कि किसान गरीबी में जी रहे हैं और आदिवासियों की स्थिति तो पूछिये ही मत | जबकि इनके पास इतनी जमीन होती है कि ये चाहें तो कभी भूखों न मारें | लेकिन विलायती डिग्रीधारी अर्थ शास्त्रियों ने अपने देश की उत्पादकता को समाप्त करके विदेशियों के तलुए चाटने को ही अपनी गरिमा समझ रखी है | आज यह प्रचार किया जा रहा है कि विदेशी यदि निवेश नहीं करेंगे तो हम कहीं के नहीं रह जायेंगे…. जबकि मेरा मानना है कि हम फिर से अपनी उत्पादक क्षमता को विकसित करने के प्रयत्न करें तो हमें किसी पर निर्भर रहने की आवश्यकता ही नहीं है | हम भी सऊदी के शेषों से अधिक धनी व समृद्ध हो सकते हैं | लेकिन दुर्भाग्य हमारा यह है कि आज पढ़े-लिखों की ही चलती है और पढ़े-लिखे विलायती नस्ल का कहलाने में ही गर्व करते हैं | उन्हें गर्व होता है कि माइक्रोसॉफ्ट और जुकरबर्ग ने हमारे प्रधानमन्त्री का स्वागत किया, हमारे प्रधान-मंत्री ने तीन सौ से अधिक कॉरपोरेट्स के साथ डिनर किया…. पाकिस्तान के लोग जलन से भर गये, विदेशी अख़बारों ने अब तक श्रेष्ठ प्रधानमंत्री बताया…..

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अब कोई भी प्रोपर्टी डीलर, किसी व्यापारी को कौड़ियों के भाव जमीन बेचने जाएगा, तो वे तो रॉकस्टार की तरह स्वागत करेंगे ही | फिर वह रॉकस्टार इतना ताकतवर है कि अपने ही देश के किसानों को मौत के मुँह में झोंककर, आदिवासियों की जमीनों को भूमाफियाओं के माध्यम से हथियाकर, विश्वभ्रमण पर निकला हुआ है….. उनके चमचे यहाँ गाल बजा रहे हैं, “अच्छे दिन आयेंगे !”

क्योंकि मोदी जी विदेश में जमीनों का सौदा करके आयेंगे, एक एक इंच विदेशियों को बेच दी जायेगी और और हमारी ही जमीन में हम किसी और की नौकरी कर रहे होंगे… क्योंकि नौकरी करना आज सबसे बड़े सम्मान की बात है हर भारतीय के लिए |

मैं नौकरी के विरोध में नहीं हूँ, जिन्हें नौकरी करने का शौक हैं वे करें नौकरी | क्योंकि मैं वर्ण व्यवस्था से इनकार नहीं करता | कुछ लोग शूद्र या सेवा भाव के गुण लिए ही जन्म लेते हैं,
उनके लिए नौकरी करना सहज है और वे चाहें भी तो व्यापार आदि नहीं कर सकते | लेकिन हर व्यक्ति को नौकर बना देना कहाँ तक उचित है ?

कुछ दिन पहले एक पंडा महोदय मेरे पास आये, बहुत ही परेशान थे | उन्होंने ३० वर्ष से भी अधिक नौकरी की… लेकिन आज तक उस नौकरी के पैसे से अपने लिए एक मकान भी नहीं खरीद पाए | जबकि उनके पैत्रक शहर में उनके पास प्राइम लोकेशन में जमीन है जहाँ वे होटल, या मॉल खोलकर अच्छी आमदनी पा सकते हैं | मुझसे सलाह मांगे तो मैंने उन्हें अपना खुद का व्यापार करने की सलाह दी | लेकिन वे राजी नहीं हुए… बोले कि नहीं…. जितनी इज्ज़त नौकरी करने में मिलती है, उतनी इज्ज़त व्यापार करने में नहीं मिलती | हमारे यहाँ तो यदि कोई व्यक्ति स्वरोजगार से एक लाख महीना कमाता है और दूसरा व्यक्ति पच्चीस हज़ार की नौकरी करता है… तो स्वरोजगार वाले को कोई लड़की नहीं मिलेगी, जबकि पच्चीस हज़ार वाले के पास लड़की वाले लाइन लगाकर आयेंगे |

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अब बताइये यह तो आधुनिक समाज और इसी समाज से निकलता है आधुनिक विकास करने वाला नेता, मंत्री और प्रधानमंत्री…. तो भारत आर्थिक रूप समृद्ध होगा या गुलाम ?

हमने आर्थिक उदारीकरण के नाम पर मानव को गुलाम और मजदूर ही बना लिया… जरा अपनी दिनचर्या देखें और चिंतन-मनन करें | हमें हरे-भरे खेतों और वनों को उजाड़कर, ज़हर उगलने वाले कारखाने लगवा दिए, हमें अपने खनिजों और वन्य संपदाओं को नीलाम कर दिया… केवल चंद रुपयों के लालच में | कल ये सब समाप्त हो जायेंगे… तब कहना जायेंगे ? तब क्या ये डॉलर और ये नोट हमें सुख दी पाएंगे ?

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