यदि यही मानवता है तो बेहतर है हम सब पशु-पक्षियों को ही अपना आदर्श मान लें

बचपन में हम कहानियाँ सुना करते थे कि बहुत विशालकाय राक्षस था, जिसके पास असीम ताकत होती थी, कई भुजाएँ और उन सभी में घातक अस्त्र-शस्त्र होते थे, उससे एक नौजवान अकेले लड़ता और फिर उसे परास्त करके आम नागरिकों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाता था | फिर उस देश का राजा उसके साथ राजकुमारी का विवाह करवा देता और फिर सभी सुखपूर्वक रहने लगते थे |
आइये लौट चलें उसी बचपन में एक बार और फिर से याद करें उन कथा-कहानियों को | आप पाएंगे कि वे सभी कहानियाँ समाज व राष्ट्र की समस्या व दुर्दशा से अवगत करवाते थे | शायद कथाकारों को आशा रहती थी कि ये बच्चे बड़े होकर समाज व राष्ट्र को उस राक्षस के आतंक से मुक्त करवाने का कोई प्रयास करेंगे | कोई ऐसा उपाय खोज लें, जिससे समाज को राक्षसों से मुक्ति मिल सके |

अब उस राक्षस को यदि हम समझना चाहें, देखना चाहें तो हमें जंगल जाने की कोई आवश्यकता नहीं है | क्योंकि अब राक्षस जंगलों, बीहड़ों में नहीं, बल्कि समाज में ही घुलमिल कर रहते हैं | अब राक्षस महँगी गाड़ियों में घूमते हैं, पुलिस और प्रशासन उनकी सुरक्षा करती है, वह बड़े बड़े व्यापार करते हैं वे, हजारों लोगों को वह नौकर रखते हैं… सारी जनता उनके सामने नतमस्तक रहती है | अधिकांश राक्षस शाकाहारी होते हैं और केवल आदिवासियों, किसानों का खून चूसकर ही जीवित रहते हैं | किसानों और आदिवासियों से तो इनकी दुश्मनी आदिकाल से ही चली आ रही है क्योंकि ये लोग आत्मनिर्भर प्राणी होते हैं, और अपनी दुनिया में ही मस्त रहते हैं | इसलिए ये लोग राक्षस के गुलाम नहीं बन पाते, जबकि मध्यमवर्गीय गुलाम प्रवृति के होते हैं और उनके लिए गुलामी करने के सिवाय कोई और मार्ग भी नहीं होता | न तो उनके पास अपनी जमीन होती है, न वे जंगलों में रह सकते हैं | इसलिए वे लोग नौकरियों पर निर्भर रहते हैं और पढ़ाई भी करते हैं तो शिक्षा पाने के लिए नहीं, अपितु नौकरी पाने के लिए करते हैं | वहीँ किसान और आदिवासी अपनी खेती और जंगल के कंद-मूल पर निर्भर रहते हैं | हाँ आज आदिवासी और किसान भी आधुनिक हो गये हैं और आत्मनिर्भरता से अधिक नौकरी को महत्व देते हैं और बेरोजगार लोग नौकरी के लिए धरना-प्रदर्शन आदि करके समय काटते हैं | लेकिन राक्षस की गुलामी से अब समाज मुक्त नहीं होना चाहता |

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यह कितने आश्चर्य की बात है कि प्रत्येक मानव ईश्वर की संतान है और प्रत्येक को समान अधिकार प्राप्त हैं ईश्वर से, लेकिन फिर भी मानव गुलाम बनकर जी रहा है मानवों का | ईश्वर व शैतान से आज इतना भयभीत नहीं है मानव, न ही भयभीत है खूंखार पशु-पक्षियों से, लेकिन मानव से ही भयभीत है | मानव ही मानव का शत्रु हुआ पड़ा है और लोग कहते हैं कि मानवता ही श्रेष्ठ धर्म है | क्या यही मानवता है ? क्या कुछ पूंजीपति की गुलामी करना मानवता है ? कुछ गुंडे-बदमाश लफंगों की टुच्ची सेना से भयभीत रहना मानवता है ? क्या अपने ही आस-पड़ोस में किसी की सहायता कर पाने में असमर्थ रहना मानवता है ?

यदि यही मानवता है तो बेहतर है हम सब पशु-पक्षियों को ही अपना आदर्श मान लें और उन्हीं के धर्म यानि सनातन धर्म को अपना लें | वास्तव में मूलतः हम सभी प्राणी सनातन धर्मी ही हैं, यह तो कुछ राजनेताओं, धर्मों के ठेकेदारों ने लोगों को अपना गुलाम बनाये रखने के लिए अलग अलग सम्प्रदायों, पंथों, विचारों को धर्म का नाम दे दिया | सनातन धर्म में सभी पंथ, विचार व मतों के लिए स्थान है क्योंकि सनातन धर्म वह धर्म है जिसका अनुसरण सभी प्राणी ही नहीं, सम्पूर्ण ब्रह्मांड अनुसरण करता है | सभी को अपने अपनी स्वतंत्रता है क्योंकि सभी के अपने अपने मौलिक गुण हैं, अपनी रूचि-अरुचि है, अपने अपने उद्देश्य हैं, अपनी अपनी भूमिकाएं हैं और सभी अपनी अपनी योग्यतानुसार इस सृष्टि को कोई न कोई योगदान देने के लिए ही आते हैं |

लेकिन ब्रांडेड बोतल या प्रोडक्ट की तरह सभी मानवों को एक ही खाँचे में ढालने की कोशिश की जाने लगी | परिणाम यह हुआ कि मानव मानसिक रूप से विकृत होता चला गया और भौतिक रूप से उन्नत | अब मानव व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए दूसरों को कष्ट पहुँचाने से लेकर नामों-निशाँ मिटाने के प्रयास करने से भी नहीं चूक रहा | स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि यदि बाहर से देखे कोई तो यही नहीं समझ में आएगा कि मरने वाला शैतान है या मारने वाला | क्योंकि जिन दानवों व दैत्यों की कहानियाँ सुनते हुए हम बड़े हुए हैं, वे कोई और नहीं यही मानव हैं |

आज समाज यह भूल जाता है कि जो नेता हमारा शोषण कर रहे हैं, जो पूंजीपति हमारा शोषण कर रहे हैं वे सब इसी समाज की पैदावार है | इसी समाज ने पैदा किया है उनको और मालिक बनाया है अपना | तो वे जो कुछ भी हैं, जैसे भी हैं, इसी समाज का खून हैं, उनको जो संस्कार मिले हैं वह इसी समाज ने दिए हैं | अभी हाल ही में राहुल गांधी के खाट रैली में लोगों ने खाट लूटी.. ये लुटेरे कौन थे ? क्या बाहरी थे ? क्या विदेश से आये थे ?

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नहीं ये सभी इसी भारतीय समाज के अंग थे | अब आप स्वयं अनुमान लगाइए कि जो समाज दिन दहाड़े खाट लूटने की हिम्मत रखता हो, वह समाज ताकत मिल जाने पर क्या क्या नहीं लूटेगा ? बस जब तक ताकत नहीं मिली, तब तक गरीबी, बेबसी का रोना रोते रहेंगे, लेकिन जैसे ही मौका मिला तो राक्षस, दानव, दैत्य बनने से नहीं चुकेंगे | मेवात बलात्कार काण्ड, निर्भया काण्ड व अन्य जघन्य बलात्कार व हत्या काण्ड इसी भारतीय समाज के राक्षसी रूप का प्रत्यक्ष उदाहरण व प्रमाण है | और जब ऐसे समाज से निकलकर कोई नेता बन जाता है तो उससे महानता की आशा कैसे की जा सकती है ?

समाज अपना राक्षसी चेहरा छुपाता है दूसरों की व्यक्तिगत सीडी दिखाकर | नैतिकता के नाम पर स्त्री-पुरुषों के स्वाभाविक संबंधों को उछालकर | क्योंकि यह सब उनकी अपनी ही दबी हुई वासना को तृप्ति प्रदान करती है | राक्षसों का यह समाज मासूम लड़कियों की खरीद-फरोख्त से लेकर बलात्कार तक सभी कुछ परदे के पीछे करना पसंद करता है, लेकिन यदि कोई पकड़ा जाता है, सार्वजनिक रूप से उभर जाता है यह सब करते तो लोग तुरंत उसे सजा देने को तैयार हो जाते हैं | क्यों ?

क्योंकि उसका अपराध यह होता है कि वह पकड़ा गया, न की कुकृत्य करने की सजा उसे दी गयी | आज न जाने कितनी लड़कियों को वेश्यावृति में धकेल दिया गया और ऐसा करने वाले क्या आसमान से आते हैं ? उन लडकियों के साथ रातें रंगीन करने वाले कौन होते हैं ? क्या वे आसमान में बैठे हैं ?

नहीं सभी इसी समाज के अंग हैं बस दिन भर शराफत के मुखौटा लगाये घूमते हैं |

और यही दोगला समाज नैतिकता की दुहाई देता फिरता है | यही दोगला समाज धर्म की रक्षा करने का दावा करता है… जबकि समाज स्वयं अधर्म और पतन की राह में अग्रसर है | यही कारन है कि राक्षसी प्रवृति के व्यक्तियों को यह समाज अपना नेता चुनती है | जानते बुझते भी कि जिसे वोट देने जा रहे हैं वह अपराधी है, कई जघन्य अपराध कर रखे हैं फिर भी उसे वोट देते हैं | क्योंकि यदि नेता भ्रष्ट होगा तो इनको भी छूट मिलेगी |

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तो याद कीजिये बचपन की वह कहानी राक्षसों, दैत्यों वाली | आप पाएंगे कि अब राक्षस समाजिक हो गये हैं | अब वे अकेले नहीं रहते | अब वे संगठन समूह बनाकर उपद्रव करते हैं | क्योंकि मानवों के समाज में अब उत्पादक, आत्मनिर्भर लोग नहीं रह गये, बल्कि हर कोई गुलाम होने के लिए बेचैन है | हर कोई नौकरी के पीछे भाग रहा है और ऐसे में बड़े राक्षस छोटे सड़क छाप लफंगों, गुंडों बदमाशों के द्वारा समाज का ही नहीं, पूरे राष्ट्र का शोषण व दोहन करता है | मानवों को धर्म और जाति के नाम पर लड़ाता है और फिर उनकी चिताओं पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकता है | कुछ राक्षस नई नई बीमारियों का अविष्कार करते हैं और फिर उन बीमारियों के इलाज के नाम पर जनता को लूटते हैं | कुछ राक्षस कर्ज देकर किसानों को बर्बाद कर देते हैं…. यदि हम ध्यान दें तो आज इतने राक्षस हैं हमारे आस-पास कि उनके चंगुल से निकल पाना दुष्कर ही दिखाई पड़ता है | लेकिन यदि जो सजग हैं, राष्ट्र व समाज से प्रेम करते हैं, वे प्रयास करें संगठित होकर तो इस राष्ट्र को इन राक्षसों से मुक्त करवा सकते हैं | लेकिन यह भी इतना आसान नहीं है | क्योंकि समाज स्वयं ही राक्षसों से मुक्त नहीं होना चाहता | और इस भीरुता को धर्म और आधुनिकता के घोल में सभी को पिलाया जा रहा है मानवता के नाम पर | क्या इन राक्षसों की गुलामी करना मानवता है ? क्या ऐसा समाज जो स्वयं अनैतिक कार्यो में लिप्त हो, जो स्वयं लूट-खसोट करने वालों का समर्थन करता हो, उस समाज से नैतिकता और धर्म का पाठ सीखना मानवता है ?

नहीं ! न तो यह मानवता है, न ही धार्मिकता है और न ही नैतिकता या आधुनिकता | यह केवल कायरता है, और कायरों के इस समाज के भेड़चाल में चलना किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति को स्वीकार्य नहीं होगा | ~विशुद्ध चैतन्य

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