विचार-धारा और जल-धारा

अक्सर लोग कहते हैं कि मैं फलाँ विचारधारा को मानता हूँ या हमारी अपनी विचारधारा है | पार्टियों की अपनी विचारधारा होती है, पंथों-सम्प्रदायों की अपनी विचारधारा होती है…. ध्यान दें तो सारी दुनिया में कई विचारधाराएँ हैं और लगभग हर कोई किसी न किसी विचारधारा का अनुयाई होता है | बाकियों की छोड़िये मैं भी सनातन विचारधारा का अनुयाई हूँ | अब सनातन विचारधारा क्या है यह बाद में बताऊंगा, पहले हम विचारधारा को समझ लें |


धारा यानि प्रवाह यानि जो गतिशील है, जो ठहरा हुआ नहीं है, जो अपने गंतव्य की ओर बढ़ा जा रहा है | तो धारा विचारों की हो या जल की, दोनों ही लगभग समान है | बस अंतर दोनों में एक ही है और वह यह कि जलधारा नीचे की ओर गतिमान रहती है क्योंकि उसका गंतव्य सागर है, उसका ध्येय सागर से मिलन है और विचारों का ध्येय भिन्न भिन्न हो सकता है |

दूसरे प्रकार की विचारधाराएँ वे विचारधारा हैं जो ऊपर की और गति करती हैं व सभी शुभात्माओं से निकलीं | जैसे कि बौद्ध, जैन, ज़ेन, सुफ़िज्म, इस्लाम, ईसाई, सिख, व अन्य वे सभी जो किसी श्रेष्ठ शुभ व्यक्ति या ईश्वरीय पुस्तकों पर आधारित हैं… आदि | ये सभी श्रेष्ठ विचारधाराएं हैं क्योंकि ये धर्म की ओर गति करतीं हैं इनका उद्देश्य धर्म, आध्यात्म व परमसुख की प्राप्ति है |

तीसरे प्रकार की धाराएं वे धाराएं होतीं हैं जिनका गंतव्य सागर नहीं अपितु झील, तालाब या पोखर या कोई गड्ढा होता है | ऐसी धाराएं बहुत छोटी होती हैं और कुछ अल्पायु होती हैं केवल वर्षाकाल में ही जन्म लेतीं हैं | इनका जन्मस्थान वर्षा जल ही होता है और ये कहीं से भी प्रवाहित हो जायेंगी, जैसे घर की छत से, बालकनी से, सड़क में इकठ्ठा हुए जल से… लेकिन जल्दी ही लुप्त हो जाती हैं |

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तो जलधारा निम्नगामी ही होती हैं जबकि विचारधारा बहुदिशागामी होती हैं | लेकिन दोनों ही धाराएं गतिशील हैं, गमन करती हैं, नए नए क्षेत्रों व अनुभवों से गुजरती हैं, नए नए धाराओं से मिलती हैं उन्हें साथ लेकर आगे बढ़तीं हैं, उसमें दूषित धाराएं भी मिलतीं हैं और स्वच्छ जलधाराएँ भी मिलतीं हैं… लेकिन वे ठहरतीं नहीं क्योंकि उन्हें अपने गंतव्य तक पहुँचना होता है |

लेकिन जो धाराएँ ठहर जाएँ, तो क्या हम उसे तब भी धारा ही कहेंगे ?

नहीं ! तब वह धारा नहीं कहलाएगी, फिर वह विचारधारा हो या जलधारा, जो ठहर गयी वह धारा नहीं कहलाएगी | वह झील तालाब, पोखर कहलाएगी और यदि मानव ने उसे रोका हो तो उसे हम बाँध कहेंगे |

अब ठहरी हुई झील हो और उससे जल निकास का कोई मार्ग न हो सिवाय वाष्पीकरण के, तो वह मृतसागर कहलाता है | और यदि उससे जल का निकास हो रहा हो तो वह मानसरोवर झील कहलाता है | मानसरोवर से ब्रह्मपुत्र नाम की धारा निकलती है जो सागर से जाकर मिलती है | अब दोनों ही झीलों का अंतर आप यदि नहीं जानते तो मैं बता देता हूँ | मृतसागर कोई भी जीव जीवित नहीं रह सकता यहाँ तक कि खारे पानी यानि सागर में रहने वाले जीव भी | जबकि मानसरोवर कई पक्षियों व जीवों के लिए वरदान है, जीवन दायिनी है |

इस प्रकार जो जल ठहर जाता है वह मृत हो जाता है, और मृत जल यदि पोखर या तालाब में हों तो बीमारियों का कारण बनता है | इसी प्रकार जो विचारधारा ठहर जाता है, आगे गति नहीं कर पाता उसमें कोई नई धारा भी नहीं आ पाती और कोई धारा उससे बाहर निकल पाती है, तो वह भी बीमारियों का कारण बनता है | ऐसे ठहरी हुई विचारधारा को मानने वाले रुग्ण मानसिकता के हो जाते हैं | वे नवीनता को सहन नहीं कर पाते, वे बदलाव को सहन नहीं कर पाते और फिर जन्म लेता है कट्टर व क्रूर मानसिकता वाला समुदाय | फिर वह क़त्ल-ए-आम करता है, बलात्कार करता है, लूटपाट करता है, दूसरों पर अत्याचार करता है…क्योंकि ठहरी हुई विचारधारा के कारण उनका मानसिक विकास भी रुक गया होता है |

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कुछ विचारधारा उर्ध्वगामी न होकर निम्नगामी हो जाती हैं और तब कोई विचारधारा हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की ओर अग्रसर होती, कोई इस्लामिक राष्ट्र की स्थापना की ओर अग्रसर होती, कोई आदिवासियों व दलितों का आस्तित्व मिटाने की ओर अग्रसर होता है, कोई सम्पूर्ण पृथ्वी पर अपना अधिपत्य बनाने की ओर अग्रसर होता है…. मेरी नजर में ऐसी विचारधारा अमानवीय प्रवृति के लोगों की विचारधाराएँ हैं | इनका न तो धर्म से कुछ लेना देना रहता है, न अध्यात्म से और न मानवीयता से | ये विचारधाराएँ गटर में प्रवाहित होने वाले दूषित जलधारा जितनी भी सात्विक नहीं है क्योंकि वह भी सागर में विलीन होने के लिए ही प्रवाहित हो रही है | उसका अंतिम लक्ष्य सागर ही है | हाँ इस प्रकार की विचारधारा को हम वर्षाकालीन या मौसमी विचारधारा कह सकते हैं |

इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि जब तक कोई जल या विचार प्रवाहमान है तब तक वह धारा है, लेकिन जैसे ही धारा ठहर गयी, वह धारा नहीं रह जाती, फिर वह जलधारा हो या विचारधारा |

अब सनातन विचारधारा क्या है ?

सनातन विचारधारा वह विचारधारा है जो प्राकृतिक है जैसे नदी, जैसे वर्षा, जैसे वायु, जैसे प्रकाश | यह किसी व्यक्ति या पुस्तक से निकली विचारधारा नहीं है, यह स्वस्फूर्त विचारधारा है | इस विचारधारा के लिए मानव होना आवश्यक नहीं है, पशु-पक्षी यहाँ तक की सभी खगोलीय, प्राकृतिक घटनाएं इसी सनातनधारा का अंतर्गत ही गति या क्रिया करती हैं | विचार केवल मानवों के मस्तिष्कों में आता हो ऐसा नहीं, विचार प्रत्येक प्राणी के मस्तिष्क में आता है और मनुष्यों को छोड़कर लगभग सभी प्राणी सनातन विचारधारा का ही अनुसरण करते हैं | इसलिए पक्षियों को बिना मानव निर्मित यंत्रों के भूकंप का पूर्वाभास हो जाता है, वे लम्बी दूरी की अपनी यात्रायें भी बिना मानव निर्मित यंत्रों के कर लेते हैं, वे आने वाली किसी भी प्राकृतिक आपदाओं को पहले ही भांप लेते हैं | वे सहज रहते हैं वे शांत रहते हैं, एक ही वन में विभिन्न प्रजाति के पशु-पक्षी मिलकर रह सकते हैं… क्योंकि सनातन विचारधारा दूसरों के खान-पान, रहन-सहन में हस्तक्षेप नहीं करता | सबको अपनी अपनी स्वतंत्रता है… जैसे मंगल गृह की अपनी गति है, पृथ्वी की अपनी और ब्रहस्पति के अपनी… सबका अपना अपना वायुमंडल है अपने अपने ट्रेक हैं | कोई ग्रह दूसरे ग्रह के क्षेत्र में घुसपेठ करके उपद्रव नहीं मचाता | इसी प्रकार हिरणों का सामूहिक संहार शेर या भेड़िया भी नहीं करता, जैसे कि मानव करते हैं | क्योंकि मानवों को छोड़कर सभी सम्पूर्ण ब्रहमांड सनातन धर्म का अनुसरण करता है | जिनमें सोचने समझने की शक्ति है वे सनातन धर्म के साथ, सनातन विचारधारा का भी अनुसरण करता है | जैसे कि दया, करुणा, प्रेम, सहयोग… आदि | ये सभी सनातन विचारधारा के ही अंतर्गत आते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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