ऐसा ही धर्म है सनातन धर्म जो शास्त्रों पर आधारित नहीं, बल्कि प्रकृति पर आधारित है

एक बेल होती है लजावंती, जिसे छुईमुई भी कहते हैं | इसके पत्तों को छू लेने मात्र से लजा कर सिमट जाती है | वहीँ एक पेड़ होता है बरगद का जो आंधी तूफ़ान का सामना करता है और उसका कुछ नहीं बिगड़ता |

ठीक यही अंतर होता है सम्प्रदायों और धर्मों में | सम्प्रदाय लाजावंती के बेल की तरह फैलती चली जाती है, लेकिन जरा जरा सी बात पर इनकी धार्मिक भावनाएं आहत हो जाती हैं | जबकी धर्म बरगद के पेड़ की तरह सदैव सनातन अटल सत्य बनकर खड़ा रहता है |

अब जितने भी धर्मों के ठेकेदार चीख रहे हैं धर्म खतरे में हैं, वे वास्तव में अपने अपने दडबों को खतरे में बता रहे हैं | वे सही कह भी रहे हैं क्योंकि जिस दिन लोगों को वास्तविक धर्म की समझ हो जायेगी, वे दड़बों से मुक्त होना चाहेंगे | जिस दिन लोगों को यह समझ में आ जाएगा कि इन दड़बों में सिवाय शोषण और गुलामी के कुछ नहीं है, वे वास्तविक धर्म से जुड़ना चाहेंगे | क्योंकि वास्तविक धर्म में संकीर्णता नहीं होती | उस धर्म में शेर और हिरण एक ही जंगल में रह सकते हैं | उस धर्म में कोई किसी पर अपनी मान्यताएं नहीं थोपता |

ऐसा ही धर्म है सनातन धर्म जो शास्त्रों पर आधारित नहीं, बल्कि प्रकृति पर आधारित है | अर्थात जैसी जिसकी प्रकृति हो वैसा ही वह जी सकता है | शेर को शाकाहारी होने की आवश्यकता नहीं है और न ही गाय को माँसाहारी होने की आवश्यकता है | गेंदे के फूल को भी महत्व मिलता है और गुलाब के फूल को भी इस धर्म | कमल को भी महत्व मिलता है और बेल पत्र को भी | सभी का अस्तित्व महत्वपूर्ण हैं और सभी एक दूसरे से बंधे हुए हैं | इसी प्रकार एक प्राकृतिक व्यवस्था बनी हुई है ताकि पृथ्वी में जीवों में संतुलन बना रहे और सभी के लिए आवश्यक भोजन व पानी की व्यवस्था बनी रहे |

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लेकिन जब से शास्त्रों पर आधारित धर्मों ने अपना साम्राज्य फैलाना शुरू किया, पृथ्वी में जल से लेकर भोजन तक की समस्या खड़ी होने लगी | अब तो वायु प्रदुषण से लेकर ध्वनि प्रदुषण तक हम झेल रहे हैं | मानव कभी भी ईश्वर से श्रेष्ठ नहीं सोच सकता और न ही उसके नियम कानून कभी इतने उन्नत व न्यायसंगत हो सकेंगे | इसलिए एक समय आएगा जब सभी स्वतंत्र होना चाहेंगे और वास्तविक यानि सनातन धर्म की और लौटना चाहेंगे |

हिन्दू धर्म का आधार भी शायद सनातन धर्म पर ही रखा गया था, लेकिन अब यह धर्म भी धर्म और राजनीती के ठेकेदारों की भेंट चढ़ चुका है | पहले भारतवर्ष का निवासी होना ही हिन्दू माना जाता था, फिर वह किसी भी पंथ या मान्यता का हो, फिर वह शाकाहारी हो या माँसाहारी, फिर वह मूर्ति पूजक हो या वैदिक…. सभी हिन्दू ही हुआ करते थे | लेकिन अब यह संकीर्ण होते होते, केवल ब्राहमणों और वैदिकों का ही धर्म रह गया | बाकियों को हीन भावना से देखा जाने लगा… शायद यह बौद्ध काल से पहले ही शुरू हो चुका था, तभी बौद्ध धर्म के प्रति लोगों की रूचि बढ़ी थी | ऋषियों के बाद आये लोगों ने धर्म को समझा होता तो शायद भारत आज खंडो में मानसिक व भौगोलिक रूप में न बंटा होता | आज नेता हमको जात-पात में बांटकर अपनी राजनीती न चमका रहे होते और न ही हमारा शोषण कर पाते | आज हम मूल समस्याओं पर चर्चा कर रहे होते और समाधान ख़ोज रहे होते, न कि दूसरे पंथों की निंदा करने में अपना समय व्यर्थ कर रहे होते |

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इसलिए लजावंती जैसी मानसिकता के दड़बों में रहने से अच्छा है दड़बों से मुक्त होकर राष्ट्र के उत्थान व समृद्धि के लिए चिंतन करने के साथ साथ स्वयं के विकास को महत्व दें | ~विशुद्ध चैतन्य

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