अनपढ़ का रिक्शा

एक विलायती कॉलेज से पंडित की डिग्री लेकर पंडितजी अपने पूर्वजों के गाँव यानि पैत्रक गाँव पधारे | पैदा विदेश में हुए  पले बढ़े विदेश में तो हर चीज सिस्टम से होते हुए ही देखी समझी और जानी | भारत में सिस्टम का अर्थ होता है रिश्वतखोर, भूमाफिया, जल-माफिया, ड्रग-माफिया और बाकी सभी माफिया, व्यापारियों द्वारा शोषित व पीड़ित होने के लिए,  देश व देश की जनता को मानसिक व आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए बनाए गये सिस्टम के अंतर्गत चुने हुए नेताओं और उनके चापलूसों की पूरी व्यवस्था |

तो वे पंडितजी जब ट्रेन से गाँव पहुँचे तो स्टेशन पर उन्हें लेने आये सज्जन उन्हें रिक्शे के पास ले गये कि इसी में हमें गाँव जाना होगा | गाड़ी की व्यवस्था हो नहीं पायी क्योंकि गाड़ी ठीक होने गयी हुई है और बैलगाड़ी मैं आपको ले जाना हमें जँचा नहीं | पंडित जी ने रिक्शे वाले को देखा और पूछा कि लाइसेंस है ?

रिक्शे वाले ने सर हिला दिया न में |

“पढ़े लिखे कहाँ तक हो ?” पंडित जी ने फिर पूछा

“जी कभी स्कूल नहीं गया |” रिक्शे वाले ने मासूमियत से उत्तर दिया

पंडित जी का पार चढ़ गया, ” एक तो या अनपढ़ है और उपर से लाइसेंस भी नहीं है… मैं अपनी जान जोखिम में नहीं डाल सकता | गाड़ी मंगवाओ और ड्राईवर पढ़ा-लिखा होना चाहिए और लाइसेंस भी होना चाहिए उसके पास…. “

उन्हें लिवाने आये सज्जन बोले, “ऐसी बारिश में अब गाड़ी कहाँ से लेकर आऊं ? और फिर यह गाँव के स्टेशन है कोई शहर नहीं है कि रात दिन टैक्सी मिल जाय… ये रिक्शा वाला मुश्किल से राजी हुआ इतनी बारिश में और आप हैं कि,…. “

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“ठीक है मैं वापस चला जाऊंगा अगली ट्रेन से ही | मुझे नहीं जाना इस रिक्शे में |” पंडित जी तुनक कर बोले |

“महाराज एक तो पहली बार आप यहाँ आये हैं, हम आपको नाराज होकर कैसे जाने देंगे… फिर अगली ट्रेन तीन दिन बाद ही है यहाँ से… इस स्टेशन में तो एक चाय वाले के सिवाय और कोई मिलेगा भी नहीं… कैसे काटेंगे तीन दिन यहाँ ?”

पंडित जी के होश उड़ गये, “क्या बकवास कर रहे हो ? तीन दिन बाद ट्रेन ? हमारे यहाँ तो हर दो मिनट बाद ट्रेन मिल जाती है….!”

“महाराज वह विलायत है और यह स्वदेश….. अंतर तो होगा ही न ? फिर उनकी अमीरी हमें लूटकर ही तो हुई है कौन से उन्होंने अपनी मेहनत से यह सब हासिल किया… मेहनत करते होते तो हमारी ही तरह हालत होगई होती उनकी भी | अब हमारे नेता लोग विलायती शिक्षा लेकर आये हैं… हम तो इसी बात से खुश हैं कि अपनों से ही लुट रहे हैं…. खैर आ जाइए और अब कोई रास्ता भी नहीं है…. इसी रिक्शे से जाना पड़ेगा |

पंडित जी ने राम का नाम लिया और रिक्शे पर बैठे गये…. अनपढ़ का रिक्शा चल पड़ा | ~विशुद्ध चैतन्य

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