हमारे दड़बे में आइये, प्रेम और भाईचारे की मिसाल है यह दड़बा, कोई भेदभाव नहीं है…

मेरा दड़बा सबसे महान का नारा लगाने वाले जब भाईचारा और सौहार्द की बातें करें तो उनका तात्पर्य केवल अपने दड़बे के लोगों की आपसी भाईचारा और सौहार्द तक ही होता है, यह और बात है कि यह एकता केवल राजनैतिक या धार्मिक रैलियों में ही देखने को मिलती है |कहीं दाना मांझीं लाश लिए चला जा रहा होगा तब एकता छोड़िये कोई उसीके दड़बे का व्यक्ति नहीं आएगा सहायता के लिए | कहीं किसी की पत्नी की मृत्यु चलती बस में हो जाये तो बस का कंडक्टर उनको बारिश में भीगने के लिए बीच राह में ही उतार देगा और बस में एक भी व्यक्ति उसके दड़बे का नहीं मिलेगा जो कहे कि अरे वे लोग भी अपने ही दड़बे का है |

कहीं पड़ोस में किसी परिवार पर कोई विपदा आ जाये तो सबसे पहले यह देखेंगे कि वह अपने दडबे का है या नहीं और उसके बाद देखेंगे उसकी आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक स्थिति.. यदि वह इनमे से कहीं फिट नहीं हो रहा तो चद्दर तानकर सो जायेंगे |

कहीं कोई हिंदुत्व के दड़बे में खड़ा होकर दहाड़ रहा है तो कहीं कोई इस्लाम के दडबे में, कहीं कोई आदिवासियों के दड़बे से चिंघाड़ रहा है तो कहीं कोई दलितों के… और भीड़ इकट्ठी हो भी जाती है, लाखों की भीड़ इकट्ठी हो जाती है | भीड़ इकट्ठी हो जाती है जब कहीं दंगा करना हो, भीड़ इकट्ठी हो जाती है जब कोई रैली करनी हो, भीड़ इकट्ठी हो जाती है, जब दड़बे का अपमान हो कर दे कोई, भीड़ इकट्ठी हो जाती है जब किसी को मरना-पीटना हो या किसी घर या गाँव में आगजनी करनी हो….लेकिन यह भीड़ गायब हो जाती है जब अपने ही दड़बे का कोई पीड़ित सड़क पर मारा-मारा फिर रहा हो | जब अपने ही दड़बे के किसी परिवार का घर उजाड़ा जा रहा हो भूमाफियाओं के द्वारा…. और फिर यही लोग बड़े गर्व से कहते हैं हमारा दड़बा महान है, हमारे दड़बे की किताबों में प्रेम और भाईचारा की बातें लिखीं हुईं हैं, हमारे दड़बे में कोई भेदभाव नहीं होता… और फिर प्राइवेट बस या टेम्पों वालों की तरह आवाजें लगाते फिरते हैं… हमारे दड़बे में आइये, प्रेम और भाईचारे की मिसाल है यह दड़बा, कोई भेदभाव नहीं है, सबको सीट मिलेगी, सभी आराम से सफर करेंगे…..

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लेकिन जैसे ही उस दड़बे के भीतर घुस जाओ तो पता चलता है कि पैर रखने की जगह नहीं है सीट तो बहुत दूर की बात है | आप कहते हैं कि यहाँ तो बहुत भीड़ है तो उत्तर मिलता है सबसे अच्छा दडबा यही है इसलिए भीड़ है… यहाँ खड़े मत रहिये पीछे जाइए और भी सवारियां चढ़ानी हैं अभी….

क्या आपने कभी ऐसे बसों में सफर का आनंद लिया है ?

मैंने तो बहुत लिया है आनंद जब तक दिल्ली में रहा | और उसी बस में जेबकतरे भी होंगे और जेब कट गई आपकी तो कितना ही शोर मचाएं, ड्राईवर बस नहीं रोकेगा… फिर आप देखेंगे एक जगह बस की स्पीड हलकी होगी और कुछ लोग बस से कूद जायेंगे और बस फिर आगे चल पड़ेगी और अगले स्टॉप पर रोकेगी | और आप जानते हैं कि अब आपका पर्स वापस नहीं मिलने वाला इसलिए पुलिस में शिकायत करके अपना समय बर्बाद करने से बेहतर है अपने दुर्भाग्य को स्वीकार लो | ~विशुद्ध चैतन्य

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