वंदना का अर्थ यह नहीं कि हम बैठ कर ईश्वर का नाम जाप करते रहे हैं

बहुत आश्चर्य होता है, जब देखता हूँ निराकार को पूजने वाले साकार को पूजने वालों का मजाक उड़ाते हैं | बहुत आश्चर्य होता है जब देखता हूँ नास्तिक आस्तिकों का मजाक उड़ाते हैं | क्योंकि इन दोनों ही समुदायों को ईश्वर का कोई ज्ञान नहीं | जिन्होंने ईश्वर को जाना ही नहीं, पहचाना ही नहीं, वे दूसरों का मजाक उड़ाते हुए बिलकुल ऐसे लगते हैं जैसे कुँए के मेंढक झील या सागर के मेंढकों का मजाक उड़ा रहे हों कि हमारे कुँए से बड़ा आकाश तो कहीं और हो ही नहीं सकता, हमारे कुँए में जितना जल है उतना तो कहीं और हो ही नहीं सकता |

हमारे ऋषि-मुनि पंचतत्व की बातें करते हैं और विज्ञान भी यह सिद्ध कर चुका है कि पंचतत्व होते हैं, जैसे कि आकाश (यानि रिक्त स्थान) जल, अग्नि, वायु और भूमि (खनिज) | इनके अलावा एक और चीज है वह है प्राण यानि आत्मा जिसे अब वैज्ञानिक भी स्वीकार चुके हैं | तो इन सभी के समूह को ईश्वर कहा जाता है | ईश्वर इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके बिना हमारा अस्तित्व नहीं है | इनमे से के भी चीज लुप्त हो जाए तो हम जीवित नहीं रहेंगे इसलिए ईश्वर वन्दनीय है |
वंदना का अर्थ यह नहीं कि हम बैठ कर ईश्वर का नाम जाप करते रहे हैं या प्रतिमा बना कर छप्पन भोग लगाएं और रेशम या मलमल के शाल ओढ़ायें | वंदना या पूजन का अर्थ केवल इतना ही था कि हम इनके प्रति आदर का भाव रखें और इनकी सुरक्षा करें | जैसे कि मंदिरों, मूर्तियों पर पुष्प व पत्तियां चढ़ाने का नियम है | तो यह यह नियम इसलिए था कि आप अपने आसपास इन पौधों व वृक्षों की न केवल सुरक्षा करें, बल्कि उन्हें फूलने फलने का अवसर भी प्रदान करें | जब ये नियम बनाए गये थे तब उन्होंने नहीं सोचा होगा कि भविष्य में लोग पढ़े-लिखे हो जायेंगे, अंग्रेजी बोलने लगेंगे और वनस्पति के शत्रु हो जायेंगे | यदि मकान भी खरीदेंगे तो पेड़ पौधों का नामो निशान मिटा देंगे अपने आसपास से क्योंकि उपभोक्तावाद प्रभावी हो जाएगा और उत्पादकता नगण्य हो जायेगा | ये लोग काल्पनिक अनदेखे ईश्वर की स्तुति करेंगे और जीवित, दृश्य ईश्वर को मिटाने के लिए संगठित हो जायेंगे |

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सनातन धर्म का एक नियम आपसी सहयोगिता का भाव यानि वृक्षों से हम ऑक्सीजन लेते हैं, यानि वृक्ष हमें जीवन देता है, इसलिय हम उन्हें सुरक्षा प्रदान करें, वह लुप्त हो गया | क्योंकि विज्ञान ने प्रगति कर ली और अब सिलेंडर में ऑक्सीजन उपलब्ध हो गया | जैसे चीन में सात हज़ार रूपये में एक बोतल ऑक्सीजन मिल जाता है उससे एक व्यक्ति का दिन भर का काम चल जाता है | इसलिए उनको वृक्षों को बचाने की कोई आवश्यकता नहीं है | लेकिन सोचिये जब पृथ्वी से वृक्ष ही लुप्त हो जायेंगे तब ऑक्सीजन कहाँ से लायेंगे ?

अब वैज्ञानिको ने शोध कर पता लगाया है कि जल में याददाश्त होती है, वह अपने साथ यादें लेकर चलता है… यानि जल भी निर्जीव नहीं है उसमें भी प्राण है |

तो वंदना का अर्थ यही था कि हम ईश्वर यानि प्रकृति, ब्रह्माण्ड के प्रति अनुग्रहित रहें उनका सम्मान करें और उन्हें नष्ट न होने दें | लेकिन हम कर क्या रहे हैं ? ढोंग करे रहे हैं पूजा पाठ कर्मकांडों का | हम दिखावा कर रहे हैं और स्वयं व समाज को मुर्ख बना रहे हैं | और जो खुद को वैज्ञानिक सोच का मानते हैं, नास्तिक मानते हैं वे ही सबसे अधिक क्षति पहुंचा रहे हैं प्रकृति को केवल कागज के नोटों के लिए | वे लोग भी प्रकृति को क्षति पहुँचाने में पीछे नहीं हैं जो धर्म और ईश्वर के नाम पर धंधा कर रहे हैं | इनकी खुद की कोई श्रृद्धा नहीं है ईश्वर में लेकिन ढोंग ऐसा करते हैं, जैसे इनसे बड़ा ईश्वर का भक्त दुनिया में कोई और है ही नहीं |

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यदि आप सनातन धर्म यानि आपसी सहयोगिता को महत्व नहीं देते, तो आप अधार्मिक हैं | यदि आप सनातन धर्म यानि सम्पूर्ण सृष्टि के लिए सम्मान का भाव नहीं रखते तो आप अधार्मिक हैं | यदि आप सनातन धर्म यानि सर्वधर्म समभाव का भाव नहीं रखते तो आप अधार्मिक हैं… भले ही दुनिया आपको कितना ही बड़ा धार्मिक माने, लेकिन ईश्वर को आप मुर्ख नहीं बना पाएंगे | आपको उसके परिणाम भुगतने ही होंगे | ~विशुद्ध चैतन्य

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