इन तारों और हमारे बीच एक रिश्ता है…

छत में लेटे हुए आसमान में बिखरे तारों को निहार रहा था । झिलमिलाते तारे मन मोह रहे थे । सोच रहा था कि ये तारे सूरज से भी गई गुना बड़े हैं और अनगिनत हैं इनकी संख्या । रोज इन्हें देखता हूँ और खुश होता हूँ कि इन्हीं कि तरह मेरा भी एक आस्तित्व है । मैं भी इसी विशाल परिवार का एक सदस्य हूँ । ऐसा लगता है कि उनको मुझसे कोई शिकायत नहीं है । वे अपने में मगन हैं और मैं अपने में । लेकिन फिर भी हमारे बीच एक रिश्ता है, वह है पंचतत्वों का…

फिर लौटता हूँ अपने मानवो की दुनिया में जहाँ कोई हिन्दू है कोई मुस्लिम है । कोई सिख है कोई ईसाई है । कोई अमेरिकन है कोई जापानी है… सब अजनबी से लगने लगते हैं । एक ही देश के लोग आपस में कितने पराये हो चुके हैं । अब तो एक छत के नीचे भी अनजान लोग रहते हैं ।

मैं फिर आसमान में देखता हूँ न जाने क्यों फिर से वे तारे अपने से लगने लगते हैं । वे बिना वेद पढ़े, बिना गीता, क़ुरान बाइबल पढ़े भी ईश्वर के बनाये धर्म का पालन करते हैं । उनको कोई पंडित, मौलवी, पादरी नहीं सिखाता कि धर्म क्या है । वे इतने विशालकाय होते हुए भी अपनी अपनी सीमा पहचानते हैं । लेकिन मानव इतने सारे धर्मग्रंथों को पढ़कर भी अपनी सीमा नहीं पहचानता ।

बड़ी बेचैनी होने लगती है । ऐसा लगता है किसी ने हमें तुकसमदों में बाँट कर कैद कर दिया है हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई नामक छोटे छोटे दड़बों में । ये धर्मों के ठेकेदारों और सत्ता के लोभियों ने मानव को मानव का दुश्मन बना दिया । लेकिन हम इन मानवता के दुश्मनों के पैर छूते हैं, सलाम  करते हैं इनको । जयकार लगाते हैं इनके लिए और आपस में मारकाट करते हैं इनके इशारे पर इनको खुश करने के लिये ।
क्या वास्तव में मानवता भी लुप्त हो जायेगी डायनौसौर की तरह । वे भी तो आपस में लड़मर कर मिट गए थे ? ~विशुद्ध चैतन्य

READ  कामना ऐश्वर्य की और नाम ईश्वर का

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of