बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना !

राजभक्त पूंजीवादी मीडिया ऐसी खबरें और हेडलाइन अक्सर बड़े जोर शोर से उछालती हैं | कारण भी है क्योंकि तनखा और सारी सुविधाएँ इनको मिलती भी इन्हीं के कारण है तो इनका खुश होना स्वाभाविक ही है | लेकिन क्या इन खबरों से राष्ट्र का कुछ भला होता है ?

किस राष्ट्र में कितने अमीर हैं और कौन अमीर किस नम्बर या पायदान पर है… उसे जानने या गाने से क्या राष्ट्र का कोई हित होता है ?

नहीं ! राष्ट्र का कोई हित नहीं होता, यदि होना होता तो अमेरिका में कोई गरीब न होता, ब्रिटेन में कोई गरीब न होता, चीन में कोई भूख से न मरता, भारत में कोई भूख से न मरता |

वास्तव में जब भी कोई प्राणी सुखी हो जाए, अमीर हो जाए, धनी हो जाए, सत्तासुख पा जाये…. तो वह एक आम गरीब व्यक्ति की तुलना में कई गुना अधिक स्वार्थी हो जाता है | और यह प्राकृतिक नियम या सनातन धर्म है | “मैं सुखी तो जग सुखी” प्रत्येक प्राणी का मूलभूत गुण है, इसलिए ही कहा गया है, “मनुर्भवः” ! क्योंकि मनुष्य और पशु-पक्षियों में कुछ तो अंतर होना ही चाहिए, मनुष्य को पशु-पक्षियों से कुछ तो ऊपर उठना ही चाहिए और वह तभी संभव होगा जब मनुष्य ”मैं सुखी तो जग सुखी” की पशुवत मानसिकता से ऊपर उठ पायेगा |

मैंने अपने अनुभवों से पाया कि जो व्यक्ति कल तक बहुत ही अधिक शोषित व आर्थिक रूप से असहाय था, वही व्यक्ति जब आर्थिक रूप से समृद्ध हो जाता है, शोषितवर्ग से ऊपर उठ जाता है, तो वह भी वही करने लगता है, जिससे वह दुखी था और जिसके लिए वह दूसरों को बद्दुआ देता फिरता था | और यह अनुभव मैंने कोई एक दो व्यक्ति से नहीं पाए, आज भी मैं ऐसे लोगों को जानता हूँ जो कल तक असहाय थे, लाचार थे लेकिन आज समर्थ हैं पर किसी असहाय की सहायता नहीं करना चाहते |

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तो जो लोग अमीर हैं और उनके अमीर होने से किसी पीड़ित या आर्थिक रूप से कमजोर को आत्मनिर्भर होने में कोई सहयोग न मिलता हो, उनके होने या न होने से भला क्या लाभ ? वे लोग अपने लिए इस दुनिया में आये, अपने सुख के लिए मेहनत किये, उसका फल पाए और भोग कर चले जायेंगे… उसके लिए हम क्यों उछल-कूद मचा रहे हैं ? यह तो कुछ वैसी ही बात हो गयी, “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना” !

अमीरों के अपने भगवान् है अपने मंदिर हैं और वे सभी बहुत ही महँगे चढ़ावे यह कमिशन लेने वाले भगवान् होते हैं | गरीबों के चढ़ावे को वे भगवान् तो देखते भी नहीं होंगे | इसलिए वे अमीर भगवान् उनके लाखों करोड़ों के टैक्स और बैंककर्ज माफ़ करवा देते हैं, लेकिन किसानों से उनकी चिताओं में भी जाकर कर्ज वसूल लेते हैं बैंक वाले और भगवान् कोई सहायता नहीं करता |

तो वे अमीर हैं.. होने दीजिये… उनको कोसने या उनकी चड्डीपकड़ कर उनकी जय जय गाने से कोई लाभ नहीं होने वाला, स्वयं को समर्थ व आत्मनिर्भर कैसे बनाया जाए वह सोचिये | यदि आप यह सोच रहे हैं कि नौकरी मिल जाएगी तो आप सुखी हो जायेंगे तो यह आपका भ्रम है | स्वयं को इस योग्य बनाइए कि आप दूसरों को नौकरी देने लायक बने | और यह तभी संभव होगा, जब आप गांवों की अपनी जमीन छोड़कर भागने की बजाय उस जमीन को उपजाऊ बनायें, उसे अधिक से अधिक उपयोगी बनायें |

सारांश यह कि दूसरों की नकल मत करिए, मनुष्य बनिए और जो आपके पास है, जितना है, उसी के भीतर खोजिये कि आप उससे श्रेष्ठ स्थिति पर कैसे जाएँ | न तो दूसरों से छीनिए और न ही दूसरों से ईर्ष्या करिए | स्वयं की योग्यता स्वयं ही खोजिये और खोज निकालिए वह खुशियाँ जिसके आप वास्तव में अधिकारी हैं | नकल करके पाई हुई खुशियाँ भी नकली ही होती हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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