धर्म मुख्यतः तीन ही हैं

भारत ही नहीं, सम्पूर्ण एशिया ही आध्यात्म पर आधारित रहा । भारत उसका केंद्र रहा और आध्यात्म का स्त्रोत व गुरु रहा । क्योंकि हमने जाना कि बाहरी वस्तुएं क्षणिक आनंद देती हैं और भीतरी समझ शान्ति और समृद्धि देती हैं । इसलिए हम विश्व में इतने समृद्ध थे कि पूरा विश्व ही हमें लूटने चला आया और आज तक लूट रहे हैं । लेकिन फिर भी हमारी समृद्धि कम नहीं हुई ।
आज भी जो गरीब और असहाय इस देश में दिखते हैं या हैं, वे भी केवल इसलिए क्योंकि वे पश्चिमी सिद्धांत पर सुख को बाहर खोज रहे हैं ।
रही धर्म की बात तो धर्म केवल अनुशासन मात्र है एक नियम है व्यवस्था बनाये रखने के लिए । धर्म मुख्यतः तीन ही हैं;
1- सनातन धर्म: जो सूर्य चाँद, तारों, खगोलीय गतिविधियों जीवन-मरण को, हृदय व शरीर की कार्यप्रणालियों को नियंत्रित करता है । दया, करुणा, प्रेम, काम, क्रोध, हिंसा, क्षमा, सहभागिता, समर्पण… आदि सभी सनातन धर्म के अंतर्गत ही आते हैं ।
2. मानव निर्मित धर्म: हिन्दू, मुस्लिम, सिख ईसाई…. आदि । संविधान, ट्रैफिक रूल्स, सामाजिक नियम, प्रार्थना, कर्मकाण्ड आदि ।
3- स्वधर्म- यह तब भी दो प्रकार के होते हैं:
अ. दूसरों द्वारा थोपा हुआ, जैसे आपको कोई कहे कि फलाने को गुरु बना लो और आपने बना लिया । आपसे कहा गया कि फलाने से शादी कर लो तो सुखी रहोगे तो आपने कर ली… अब आप उनके प्रति कर्तव्यों से बंध गए । या जानते हुए भी कि यह सब थोपे गए हैं आप ढो रहे हैं स्वधर्म मानकर ।
ब. स्वयं को जाना, समझा और फिर अंतः प्रेरणा से अपने को प्रसन्नचित व सुखी रखते हुए दूसरों को सुख पहुंचाने के लिए लिए गए संकल्प जैसे विवाह, राष्ट्रभक्ति, जनकल्याण आदि । ~विशुद्ध चैतन्य 
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