ब्रम्हचर्य !

भारतीय संस्कार व धर्म में ब्रह्मचर्य का बहुत महत्व है | शिक्षा और अध्यात्म का केंद्र ही ब्रह्मचर्य को माना गया है | कोई भी शिक्षा ग्रहण करना हो, आश्रम में रहना हो, ब्रह्मचर्य को ही सर्वप्रथम समझाया और पालन करवाया जाता है, उसके बाद ही कोई आगे की गति कर पाता है |

मैं स्वयं ब्रम्हचर्य को बहुत अधिक महत्व देता हूँ और जितना संभव हो, ब्रहचर्य का पालन करता हूँ | लेकिन….

ब्रह्मचर्य की मेरी परिभाषा वह नहीं है, जो विद्वान धार्मिक लोग समझाते हैं, बल्कि वह है जो होना चाहिए | अर्थात ब्रह्मचर्य का अर्थ स्त्री से परहेज, या वीर्य संग्रहण नहीं है, बल्कि ब्रह्म (ब्रह्माण्ड का वह नियम जो शाश्वत सत्य है, सनातन है) के साथ तारतम्यता रखना है | प्रकृति के साथ समन्वयता रखना ही ब्रम्हचर्य है | आपकी दैनन्दिनी क्रिया-कलाप प्रकृति के विरुद्ध न हो, इसके प्रति सजग रहना व हर घटना के प्रति सहज रहना ही ब्रह्मचर्य है |

लेकिन समाज ने ब्रम्हचर्य को ही विकृत कर दिया | कारण केवल इतना रहा कि समाज दो टांगों के बीच से कभी मुक्त नहीं हो पाया और न इतना उठा पाया कि मूलाधार से ऊपर की यात्रा कर सके | सात चक्रों की यात्रा करने वाले व्यक्ति को ब्राहमण माना गया और पौराणिक कथाओं में नारद ही ऐसा महापुरुष था जो सातों चक्रों की यात्रा में रहता था | जो हृदय चक्र में स्थिर हो गये वे श्रीकृष्ण और ओशो थे | जो सह्स्र्सार में स्थिर हो गये, वे बुद्ध, और महावीर थे | इस प्रकार लगभग सभी महान आत्माओं ने मूलाधार से ऊपर की यात्रा की लेकिन किसी ने भी मूलधार चक्र की निंदा नहीं की | क्योंकि नाम से ही ज्ञात होता है कि वही जीवन का आधार है |

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लेकिन धर्मों के ठेकेदारों ने ब्रह्मचर्य के नाम पर मूलाधार चक्र को ही कलंकित कर दिया | धर्मों के ठेकेदार समझ चुके थे कि यदि लोगों ने मूलाधार को समझ लिया, जी लिया तो वे ऊपर की यात्रा पर निकल जायेंगे | ऊपर की यात्रा पर निकलते ही वे प्रकृति से समन्वय स्थापित कर लेंगे और ब्रह्म की सारी शक्तियां उनके सहयोग में स्वतः ही काम करने लग जायेंगी | ऐसे में दरिद्रता, दुःख आदि उनके लिए कोई मायने नहीं रखेंगी और तब उनकी दुकानदारी चल नहीं पाएगी | आज जो वे दुःख दूर करने वाले, धन समृद्धि देने वाले लाकेट और यंत्र आदि बेच कर कमा खा रहे हैं, वह सब बंद हो जाएगा | वे जानते हैं कि कमर से ऊपर की यात्रा उन्होंने भी नहीं की है, अतः वे ऊपर उठ चुके लोगों को मूर्ख बना नहीं पाएंगे…. तो उन्होंने ब्रम्हचर्य के नाम पर सेक्स को ही प्रतिबंधित कर दिया | चूँकि सेक्स ही अब पाप हो गया तो स्वाभाविक है कि जीवन वहीँ सिमट कर रह गया | एक बूढा व्यक्ति में काम शक्ति बढाने के उपाय खोजने में लगा रहता है क्योंकि अतृप्त है | क्योंकि वह कमर से ऊपर उठना तो दूर अभी उसे समझ भी नहीं पाया था | वह उस अनुभूति से ही चूक गया जो प्राकृतिक था, जो सनातन था |

आप देखेंगे कि पशु-पक्षियाँ जो कि शुद्ध रूप में ब्रम्हचर्य का पालन करते हैं, वे तनाव मुक्त रहते हैं | वे किसी नंगी स्त्री को देखकर पागल नहीं हो जाते, वे बलात्कार करते नहीं फिरते | उनके लिए सेक्स उतना ही सहज है, जितना कि मूत्र त्याग करना | जबकि हमारा सारा समाज ब्रह्मचर्य का ढिंढोरा पीटने में लगा हुआ है, बिना यह समझे कि ब्रम्हचर्य वास्तव में है किस चिड़िया का नाम | ~विशुद्ध चैतन्य

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