तुमने विभाजन कैसे किया?

एक गुरु के दो शिष्य थे। गर्मी की दोपहर थी, गुरु विश्राम कर रहा था, और दोंनो उसकी सेवा कर रहे थे। गुरु ने करवट बदली-तो दोनों शिष्यों ने आधा-आधा गुरु को बांट रखा था सेवा के लिए, बायां पैर एक ने ले रखा था, दायां पैर एक ने ले रखा था |

गुरु ने करवट बदली तो बायां पैर दाएं पैर पर पड़ा गया। स्वभावतः झंझट खड़ी हो गई। गुरु तो एक है। शिष्य दो थे। तो उन्होंने हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बांटा हुआ था। तो जब दाएं पैर बायां पैर पड़ा, तो जिसका दायां पैर था उसने कहा,

“हटा ले अपने बाएं पैर को ! मेरे पैर पर पैर ? सीमा होती है सहने की ! बहुत हो चुका, हटा ले।”

तो उस दूसरे ने कहा, “देखूं किसकी हिम्मत है कि मेरे पैर को और कोई हटा दे! सिर कट जाएंगे, मगर मेरा पैर जहां रख गया। यह कोई साधारण पैर नहीं, अंगद का पैर है।”

भारी झगड़ा हो गया, दोनों लट्ठ लेकर आ गए। यह उपद्रव सुनकर गुरु की नींद खुल गई, उसने देखी यह दशा। उसने जब लट्ठ चलने के ही करीब आ गये-लट्ठ चलने वाले थे गुरु पर! क्योंकि जिसका दायां पैर था वह बाएं पैर को तोड़ डालने को तत्पर हो गया था। और जिसका बायां पैर था वह दाएं पैर को तोड़ डालने को तत्पर हो गया था। गुरु ने कहा,

“जरा रुको, तुम मुझे मार ही डालोगे। ये दोनों पैर मेरे हैं। तुमने विभाजन कैसे किया?”

अज्ञानी बांट लेता है और भूल ही जाता है। भूल ही जाता है कि जो उसने बांटा है वे एक ही व्यक्ति के पैर हैं, या एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं। अज्ञानी ने उपद्रव खड़ा किया। अज्ञानी लड़े। एक-दूसरे का विरोध किया। एक- दूसरे का खंडन किया। एक-दूसरे को नष्ट करने की।

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जब संप्रदाय अज्ञानी के हाथ में पड़ता है तब खतरा शुरू होता है। ज्ञानी संप्रदाय को बनाता है, क्योंकि धर्म की शाखाएं-प्रशाखाएं पैदा होती हैं। जितना जीवित धर्म, उतनी शाखाएं-प्रशाखाएं। दुनिया से संप्रदाय थोड़े ही मिटने हैं, अज्ञानी मिटाने हैं। जिस दिन संप्रदाय मिट जाएंगे, दुनिया बड़ी बेरौनक हो जाएगी। उस दिन गुरु
बिना पैर के होगा। उसको फिर, जैसे भिखमंगों को ठेले पर रखकर चलाना पड़ता है, ऐसे चलाना पड़ेगा। फिर वृक्ष बिना शाखाओं के होगा। न पक्षी बसेरा करेंगे, न राहगीर छाया लेंगे। और जिस वृक्ष में पत्ते न लगते हों, शाखाएं न लगती हों , उसका इतना ही अर्थ है कि जड़ें सूख गयी। अब वहां जीवन नहीं। जीवन छोड़ चुका उसे, उड़ गया। ~ ओशो

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