प्रत्येक त्यौहार जो भी भारत में बनाये गये, वे सभी प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल हैं

भारत में जितने भी त्यौहार हैं, वे सभी किताबों पर आधारित नहीं हैं, कुछ प्राकृतिक वातावरण पर आधारित हैं | जैसे; दीवाली, वसंतोत्सव, होली, रक्षाबंधन, तीज, श्रावणी… आदि |
मुझे याद है बचपन में जब हम गाँव की रामलीला देखने जाया करते थे, तो कम्बल ओढ़ कर बैठना पड़ता था और बहुत से लोग कंडे (गोबर के उपले) लेकर जाया करते थे और वहीं अलाव जलाकर रामलीला देखने बैठते थे…. लेकिन पिछले कई वर्षों से ऐसा वातावरण रामलीला के समय देखने नहीं मिलता क्योंकि उतनी ठंड नहीं पड़ती | इसी प्रकार सावन का मेला खत्म हो गया और अब पिछले हफ्ते भर से मौसम सावन का बना हुआ है | दिन रात तेज हवा और बारिश… मुझे बचपन की यादों पर ले जाती है | शहरों में तो ऐसा वातावरण देखने नहीं मिलता, लेकिन यहाँ गाँव में तेज हवा और बारिश में पेड़ों का झूमना मन को आनंदविभोर कर देता है |

वैज्ञानिक कह रहे हैं कि ग्लोबली मौसम एक महीने शिफ्ट हो गया है, यानि जो वातावरण नवम्बर के महीने में होना चाहिए था, वह अब दिसम्बर में बनता है, जो जुलाई के दूसरे हफ्ते होना चाहिए, वह अगस्त के दूसरे हफ्ते होता है | तो क्यों न हम त्योहारों को एक महीने आगे कर दें ?

लेकिन हम ऐसा नहीं कर सकेंगे क्योंकि तब और अब में अंतर था | तब प्रकृति को हम महत्व देते थे, अब केलेंडर को | अब सब कुछ लिखा जा चुका है, अब संविधान बन गया है, अब ईश्वरीय वाणी लिखित रूप में है, इसलिए अब प्रकृति महत्वपूर्ण नहीं है अब किताबें और केलेंडर महत्वपूर्ण हैं | हाँ कुछ त्योहार ऐसे अवश्य हैं जो आज भी प्रकृति पर आधारित हैं, केलेंडर पर नहीं, जैसे चाँद देखकर मनाये जाने वाले त्यौहार जैसे ईद और करवाचौथ | ये दोनों त्यौहार चाँद पर आधारित हैं | लेकिन इनके लिए भी समस्या होने वाली है क्योंकि अमेरिका एक आर्टिफिशियल चाँद तैयार कर रहा है जो उन जगहों पर दिखाई देगा जहाँ चाँद नहीं दिखता या यह कहें कि चाँद के विपरीत रहेगा | यदि असली चाँद अमेरिका में होगा तो भारत में नकली चाँद दिखेगा….खैर अभी उसे तैयार होने में बहुत समय है शायद २०५० तक संभव हो पाए |

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सारांश यह कि प्रत्येक त्यौहार जो भी भारत में बनाये गये, वे सभी प्राकृतिक वातावरण के साथ मानसिक बदलाव के अनुकूल हैं | आप जरा सभी भारतीय त्योहार और उस समय की स्थिति पर ध्यान दें तो आपको पता चल जाएगा कि ये सभी त्योहार आर्थिक, मानसिक व प्राकृतिक सभी तरह के परिवर्तनों के साथ सामंजस्यता रखती हैं | ये त्यौहार केवल मान्यताएं नहीं हैं, प्राकृतिक रूप से सभी से जुडी हुई हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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