ईश्वर की खोज या स्वयं की खोज ?

अकसर मित्र मुझसे कहते हैं कि बड़ी असुविधा हो गयी, बचपन से सुनते आ रहे हैं कि ईश्वर की खोज करो, ईश्वर को पाना ही जीवन का सार है…. आदि इत्यादि | और आप कहते हैं कि स्वयं की खोज करो, स्वयं को जानो ! बहुत कोशिश की जानने की लेकिन अब और उलझते जा रहे हैं | कैसे जाना जाए स्वयं को ? क्या आपने जाना है स्वयं को ?

मैं उत्तर में कहना चाहता हूँ कि मैं कोई भी नई बात नहीं कह रहा, केवल कॉपी-पेस्ट ही है | श्रीकृष्ण से लेकर ओशो तक जितने भी महान आत्माएँ आयीं, सभी ने यही कहा | यहाँ तक कि एप्प्ल के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने भी यही बात कही;

“Your time is limited, don’t waste it living someone else life. Don’t be trapped by dogma, which is living the result of other people’s thinking. Don’t let the noise of other opinions drown your own inner voice. And most important, have the courage to follow your heart and intuition, they somehow already know what you truly want to become. Everything else is secondary.”

| जितने भी महान आविष्कारक हुए वे सभी स्वयं से परिचित थे या दुनिया ने उन्हें विवश किया स्वयं की शक्तियों को पहचानने के लिए जैसे कि थॉमस एडिसन | आप सभी को अवसर मिलता है, प्रकृति पूरा प्रयास करती है आपको जगाने के लिए, कभी भुखमरी और बेरोजगारी से, कभी किसी संत-महंतों के प्रवचनों से, कभी अन्याय व अत्याचार करने वालों द्वारा, कभी मेरे जैसे अनपढ़ के फेसबुक पोस्ट द्वारा…. जैसे कि अभी आप इस पोस्ट को पढ़ रहे हैं |

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ईश्वर की खोज करने वाले तो आपने देखे ही होंगे और उनको भी देखे होंगे जिन्होंने ईश्वर को पा लिया और ब्रम्हज्ञानी हो गये… आजकल ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मचारी, योगी, जगद्गुरु, महामंडलेश्वर….. आदि आपको उसी तरह गली-गली में मिल जायेंगे, जैसे डिग्रीधारी बेरोजगार | डिग्रीधारी बेरोजगारों और इन सब विभूतियों में एक समानता है और वह है कि दोनों के पास डिग्रियाँ (उपाधियाँ) हैं लेकिन दोनों ही अन्धकार में हैं | एक को नौकरी नहीं मिली और दूसरे को ईश्वर नहीं मिला लेकिन दोनों ही आस में धुनी रमाये बैठे हैं कि एक न एक दिन तो मिल ही जाएगा |

अब आइये समझते हैं ईश्वर और स्वयं की खोज में भेद को |

मान लीजिये मक्खन ईश्वर है, दही, छाछ और मलाई अवतार है | इन सबको बेचने वाला बाबा, पंडित, मौलवी, पादरी आदि हो गये | अब आप को कहा जा रहा है कि जय दही कहिये, जय छाछ कहिये, जय मलाई कही और मक्खन की खोज करिए | फिर ये दुकानदार बताते हैं कि कौन से ब्रांड या रंग के पैकेट वाला मक्खन खोजना है | फिर यही बताते हैं कि फलां दूकान में चले जाइए, भगवा पैकेट वाला मक्खन लीजिये या हरे पैकेट वाला या सफ़ेद पैकेट वाला…… | आप मक्खन लेकर घर में आ जाते हैं और मंदिर नुमा फ्रिज में लाकर रख देते हैं….. | लेकिन कोई भी दुकानदार आपको यह नहीं बताता कि दूध खोजिये |

ये दूध ही है आप स्वयं | स्वयं को मथिये, स्वयं को बिलोइए, और आपको मक्खन, छाछ दही, मलाई सभी कुछ प्राप्त हो जाएगा | एक बार आपको दूध से मक्खन निकालने की विधि समझ में आ गया तो आपको किसी ईश्वर के दलाल या एजेंट की आवश्यकता नहीं रहेगी | आपको किसी धर्म की दूकान में जाने या किसी ईश्वर के दलाल के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी | आपको किसी मंदिर-मस्जिद नुमा दफ्तर में ईश्वर को रिश्वत देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी | फिर आपको धर्म, सम्प्रदाय, जाति, भाषा, प्रांत… ईशनिंदा, ईश्वर का अपमान आदि के नाम पर किसी की गर्दन काटने या जिन्दा जलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी | फिर आपको महंगे महंगे भगवान् खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और न ही आवश्यकता पड़ेगी सोने के मुकुट और रेशमी चादर चढ़ाने की |

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जब तक आप स्वयं से परिचित नहीं हो जायेंगे, तब तक आपका शोषण ये नेता, पंडित-पुरोहित, मौलवी-पादरी, बाबा आदि करते रहेंगे | एक बार आप स्वयं से परिच
ित हो गये तो फिर आप के लिए ईश्वर उतने ही निकट हो जायेंगे जितने कि सतयुग में थे | जब हर आम व्यक्ति ईश्वर से सीधे ही अपनी शिकायत कर लिया करता था | यह तो बाद में ईश्वर के नाम पर दफ्तर खुले, दलाल आये, रिश्वत और चढ़ावों का चलन शुरू हुआ…. पहले ऐसा नहीं था | पहले तो भेंट दी जाती थी स्वेच्छा से वह भी तब जब आप खुश होते थे | जबकि आज हर जगह फीस तय कर दी गयी है | हर पूजा और थाली की कीमत तय है | फूल से लेकर पत्ती तक मोल लेनी पड़ती है | और उसके बाद भी ईश्वर आपकी सहायता नहीं करता | क्योंकि ईश्वर आपके साथ ही रहता है हर क्षण हर पल, ठीक वैसे ही जैसे दूध के साथ मक्खन रहता है | तो वह भी आपके साथ ही ईश्वर के दलाल के पास जाता, ईश्वर के दफ्तर जाता है और आपको रिश्वत देते देखता है… तो वह भी निश्चिन्त हो जाता है कि शायद कोई ऐसा काम है जो आप किसी और ईश्वर से करवाना चाहते हैं, इसलिए वह आपके साथ होते हुए भी आपकी सहायता नहीं कर पाता |

जिस दिन आप स्वयं के भीतर ही स्थित ईश्वर यानि स्वयं से परिचित हो जायेंगे, उस दिन आप भजन सुने, या सूफियाना कलाम सुनें, शब्द-कीर्तन सुनें या कव्वाली सुनें…. सभी आपको भावविभोर कर देंगे क्योंकि अब आप बाहर से नहीं, भीतर से सब कुछ समझ पा रहे हैं | फिर आप मंदिर में बैठें, मस्जिद में बैठें, या गिरजाघर में बैठें…. कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि अब आप वास्तव में समझते हैं कि ईश्वर एक ही है और वह आपके भीतर ही है | जबकि अभी आप जानते हैं कि ईश्वर एक है, लेकिन यह नहीं जानते कि वह हिन्दू है, मुस्लिम है, ईसाई है, सिख है, बौद्ध है, जैन है, यहूदी है, पारसी है, यजीदी है….. शिया है, सुन्नी है, ब्राह्मण है, क्षत्रिय है, वैश्य है, यादव है, जाटव है, जाट है, कुम्हार है, सुनार है, लोहार है…… लेकिन लोग रटे चले जा रहे हैं ईश्वर एक है | ~विशुद्ध चैतन्य

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नोट: आशा है इस पोस्ट को किसी सम्प्रदाय या धर्म के अपमान के रूप में न लेकर शुद्ध धार्मिक विचार के रूप में लिया जाएगा | जो कुंठित बुद्धि के लोग हैं उनसे तो इस पोस्ट को समझने की आशा करना ही बेकार है |

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