महानुशासन

धार्मिक पंरपराओं के, खासतौर पर शंकराचार्य मठों की विधिव्यवस्था के जानकार मानते हैं कि आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों की व्यवस्था और उसके पीठासीन आचार्यों के रहन सहन और आचार विचार की विधि पहले से तय है। बारह सौ साल पहले इन मठों की स्थापना से पहले ही आचार्य शंकर ने यहां के अधिकारियों की पात्रता और मर्यादा निश्चित कर दी थी।

व्यवस्था कुछ इस तरह की गई थी कि कदाचित कोई विवाद हो तो मठ के भीतर, या चारों मठों के अधिकारी अथवा उस समय सक्रिय धर्माधिकारियों के मंच पर ही मतभेदों को सुलझा लिया जाए। तिहत्तर श्लोकों की एक काव्यरचना महानुशासन के अनुसार चारों मठों के आचार्यों को अपने क्षेत्र में धर्मप्रचार के लिए निरंतर भ्रमण करते रहना चाहिए (महानुशासन 45)। उनके पास संपदा तो रहे ताकि मठ की शिक्षा और संस्कारों की गतिविधियां सुचारू रूप से चलती रहे लेकिन आचार्य को सामान्य संन्यासी की तरह ही रहना चाहिए। किसी आचार्य का दूसरे आचार्य के क्षेत्र में जाना भी मना है। (इस मर्यादा की तुलना मौजूदा आचार्यों के दूसरों के क्षेत्र में जाने और अधिकार जताने से की जानी चाहिए।)

आदि शंकर ने महानुशासन संहिता में व्यवस्था दी है कि मठों में आंतरिक विवाद तो दूर की बात हैं, आपसे में एक दूसरे के बीच भी कोई टकराव या विग्रह नहीं होना चाहिए। अगर विवाद उत्पन्न भी हो जाए तो आपस में मिल जुलकर या अन्य आचार्यों के सहयोग से हल कर लेना चाहिए। अभी की स्थिति यह है कि उत्तराधिकार संबंधी दावेदारियों के लिए भी कोर्ट कचहरियों का आश्रय लिया जा रहा है। आचार्य शंकर ने लिखा है कि पीठ के आचार्य को अपनी मेधा, बुद्धि और चरित्र से राज्य में नीति न्याय की स्थापना के लिए सक्रिय रहना चाहिए। उसका ज्ञान और शासक की सामर्थ्य मिल कर राज्य में सुशासन स्थापित करे (श्लोक 62)।

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कितने आश्चर्य की बात है कि यही शंकराचार्य सत्ता के लिए कोर्ट में धक्के खा रहे हैं और न्याय व नीति की स्थापना का कार्य तो दूर, उलटे राष्ट्र में द्वेष के बीज बो रहे हैं |

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