अपनी संस्कृति को समझे बिना विदेशी संस्कृति को महान समझ कर उनका अन्धानुकरण मत करिये

संस्कृति व परिवेश भौगोलिक परिस्थितयों के अनुकूल होती हैं और उसी के अनुकूल होते हैं खान पान, रहन सहन आदि | हम जिस परिवेश में जाएँ, उसका सम्मान हमें करना ही होगा क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से हितकारी ही होता है | लेकिन पंथ मान्यताओं का आदान प्रदान के साथ साथ हम कुछ ऐसी चीजें भी अपना लेते हैं जो कि अपनी संस्कृति से मेल नहीं खाते और न ही उसके अनुकूल होते हैं |

मेरा ममेरा भाई सर्जरी-विशेषज्ञता की शिक्षा के लिए रशिया के एक प्रसिद्द मेडिकल कॉलेज गया | मामा उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे इसलिए उसे मिशनरी स्कूल में ही शिक्षा दिलवाई ताकि वह विदेशी तौर तरीके बचपन से ही सीख ले | तो जब वहाँ पहुंचा तो होस्टल से यूनिवर्सिटी तक जाने के लिए बर्फ की चादर को पार करना होता था | क्योंकि वहाँ बर्फ ही बर्फ थी चारों ओर | साथियों ने सलाह दिया कि थोड़ी वोद्का पी लो तो ठण्ड की मार नहीं पड़ेगी… लेकिन मामा ने उसे सख्त हिदायत दे रखी थी कि किसी भी कीमत में शराब को हाथ नहीं लगाना तो उसने शराब पीने से मना कर दिया और सभी के साथ निकल पड़ा बाहर…. लेकिन सौ कदम में ही नीचे गिर पड़ा | साथी उसे उठाकर भीतर लेकर आये और उसे होश में लाया किसी प्रकार और फिर उसे वोद्का दी पीने के लिए | और वोद्का पीने के बाद उसने पाया कि बिना वोद्का के बाहर निकलना बहुत मुश्किल है (यह घटना उसी की बहन से सुनी थी मैंने | लेकिन मामा को किसी ने यह बात नहीं बताई थी)

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इसी प्रकार कई और परमपराएं हैं जैसे कि हमारे यहाँ चप्पल पहन कर प्रार्थना स्थल या सम्मानित स्थलों पर नहीं जाया जाता | बंगाल और असाम में तो घर के भीतर भी चप्पल प्रतिबंधित होते हैं | लेकिन वहीं विदेश में यह बाध्यता नहीं है | अब सोचिये बर्फ से जमे चर्च में किसी को नंगे पाँव रहना हो तो क्या स्थिति होगी वहाँ ? फिर उनके जूतों में उतनी गंदगी नहीं रहती जितनी ही हमारे यहाँ हो जायेगी | आप दिन भर बाहर घूमते हैं और जूतों के नीचे जाने क्या क्या आता रहता है और न जाने कितनी बीमारियाँ साथ लेकर चलता है आपका चप्पल या जूता… और उसे ही आप घर के भीतर ले आते हैं तो सोचिये क्या बीमारियाँ घर में नहीं आयेंगी ? हमारे यहाँ तो नियम है जूते उतारने के बाद भी पैर धोकर ही कमरे में प्रवेश करना है | टॉयलेट से निकलकर पैर धोना अनिवार्य है यहाँ जबकि असाम में तो टॉयलेट से निकलकर नहाना आनिवार्य हुआ करता था किसी जमाने में |

तो विदेशी परमपराओं का सम्मान कीजिये लेकिन अपनी संस्कृति को समझे बिना विदेशी संस्कृति को महान समझ कर उनका अन्धानुकरण मत करिये | और न ही अपनी संस्कृति या परम्परा दूसरों पर थोपिए अनावश्यक रूप से | उन्हें वैज्ञानिक कारण भी समझाइये कि क्यों कुछ नियम भारत में आवश्यक हैं जबकि विदेशों में आवश्यक नहीं होते | फिर भारत में तो विश्व के सभी देशों की भौगोलिक परिस्थिति समाहित है इसलिए ही भारत में भिन्नताएं दिखती हैं | क्योंकि यहाँ बर्फीले प्रदेश भी हैं तो रेगिस्तान भी हैं | समुद्री किनारा भी है तो मैदानी और पहाड़ी बस्तियां भी | ~विशुद्ध चैतन्य

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