एक बीज में पूरा एक पौधा समाया हुआ होता है

आप में से कई लोगों ने देखा होगा इसे उड़ते हुए हवा में कई बार | आपके पास से गुजर गया होगा यह | यह बीज है जो यहाँ वहाँ भटकता रहता है और उपयुक्त जगह मिलने पर वहाँ अंकुरित हो जाता है |

जब हम प्रकृति की व्यवस्था को देखते हैं, तो पाते हैं कि प्रकृति ने कितनी स्वतंत्रता दी है सभी को | यह स्वतंत्रता इन्हें दूर दूर जाकर अपनी नई दुनिया बसाने की योग्यता के साथ ही मिलती है | एक बीज में पूरा एक पौधा समाया हुआ होता है, लेकिन दिखने में वह निर्जीव दिखता है, असहाय दिखता है, हवा के थपेड़ों में भटकता हुआ दिखता है | लेकिन जब वह अंकुरित होता है, तब स्वयं से परिचित होता है | वह आम के बगीचे में जाकर आम बनने कि कोशिश नहीं करता |

लेकिन मानव करता है | क्योंकि मानव को बचपन में ही उसके गुणों से, उसके उद्देश्य से भटका दिया जाता है | वह दुनिया में क्यों आया यही उसे भुला दिया जाता है और उसे सिखाया जाता है पडोसी की तरह बनो, इंजिनियर बनो, डॉक्टर बनो, गांधी, बनो, नेहरु बनो, बिलगेट बनो, अम्बानी बनो, अदानी बनो….लेकिन वह मत बनो जो तुम हो, जो तुम बनने के लिए आये हो | और वह भूल जाता है कि वह कौन है और फिर भेड़ों और बतखों की तरह जीने लगता है | परम्परा सही है या गलत, वह प्रश्न करने की योग्यता खो चुका होता है | वह भी भेड़चाल (अंग्रेजी में #ट्रेंड और #फैशन) में शामिल हो जाता है | हम अपने बच्चों को भी भेड़-बकरी बना देते हैं | बचपन से ही उनके दिमाग को फार्मेट कर देते हैं और एक ही बात समझा देते हैं कि मनुष्य का जन्म नेताओं की जयकारा लगाने, अन्याय को सहने और नौकरी करने के लिए हुआ है | अब किसानों को भी यही बात स्कूल खुलवाकर समझाई जा रही है | किसानों के बच्चे भी अब किसान नहीं बनना चाहते क्योंकि उन्होंने अब अंग्रेजी की पढ़ाई कर ली है, और उस पढ़ाई में एक ही बात समझाई जाती है कि सरकारी या कंपनी में नौकरी करना ही मानव जीवन की सार्थकता है | किसान होना यानि भुखमरी और आत्महत्या है |

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यदि हम अपने आस पास देखें तो कितने बच्चे सड़कों में इसी बीज की तरह भटक रहे होंगे, कितने बच्चे नशे में धुत्त पड़े होंगे… क्योंकि उन्हें उपयुक्त वातावरण नहीं मिला | लेकिन न जाने इन्हीं में कितने बच्चे ऐसे भी होंगे जो देश के लिए कुछ श्रेष्ठ कर सकते थे |

प्रकृति ने स्वतंत्रता दी, अपने विवेकानुसार जीवनयापन करने की लेकिन हमने गुलामी को चुन लिया | मैंने भी कई वर्षों की नौकरी करने के बाद जाना कि मैं गलत था | मैं किसी भी समूह में शामिल होता, चाहे वह साधू-समाज ही क्यों न हो, लेकिन वहाँ भी व्यक्तित्व विकास को महत्व नहीं दिया जाता | वहाँ भी कर्मकांड और आडम्बरों को महत्व दिया जाता है | आप फेसबुक पर ही देख लीजिये, जिस प्रकार के लोग आपसे जुड़े हैं, वे यदि भेड़चाल में होंगे तो आप भी स्वतः ही उनकी तरह होने लगेंगे | अब तो नेता-भक्त टोली बनाकर घूमते हैं फेसबुक में भी और जहाँ भी उन्हें अपने नेता के विरोध में कोई दिखता है, सही-गलत पर चर्चा न करके गाली-गलौज करेंगे और सिद्ध करने का प्रयास करेंगे कि उनके नेता के विरोध में कुछ कहा तो बहुत बुरा होगा | ये वे लोग होते हैं जो अपना दिमाग गिरवी रख चुके होते हैं | अब आप यह सोचते हैं कि इन्हें आप सही राह पर ले आयेंगे तो आप गलती कर रहे हैं | ये सही राह पर तो तब आयेंगे जब इनके पास अपना दिमाग होगा | इनके पास तो दिमाग भी इनका अपना नहीं होता | तो इनके साथ चर्चा करके अपना समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए |

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केवल सन्यास ही वह एक मार्ग मुझे सही दिखा जहां आप स्वयं से परिचित हो सकते हैं | सन्यास का सीधा सा अर्थ है, निरंतर स्वयं पर केन्द्रित रहना | एक समय ऐसा आ जाता है, कि फिर आप को पता चलने लगता है
कि आप भी उसी बीज की तरह यात्रा पर निकले हैं, जो सही समय और वातावरण की प्रतीक्षा में हैं | आपके भीतर कुछ नवीन है, कुछ ऐसा है जो समाज और मानवता के लिए उपयोगी है | लेकिन आप अभी भटक रहे हैं |

और जब यह समझ में आ जाता है, तब आप के भीतर एक बेचैनी अवश्य होती है, लेकिन यह एक सुखद बेचैनी होती है | अब आप जल्दबाजी में नहीं होते और कुछ अनैतिक करने की आवश्यकता भी नहीं होती | क्योंकि तब आप प्रकृति के साथ सामंजस्यता में आ जाते हैं | अब आप बिलकुल उस बीज की तरह स्वयं ईश्वर, प्रकृति या हवा के झोंकों पर बहने लगते हैं | तब आपको जीवन छोटी नहीं लगती क्योंकि आप जानते हैं कि जीवन तो बहुत लम्बी है बस बीच में दिन रात होते रहते हैं, बस बीच बीच में आप अपने कपड़े बदलते रहते हैं | ~विशुद्ध चैतन्य

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