जो ठग रहे हैं, जो लूट रहे हैं उन्हें ये समाज बड़े सम्मान की नजर से देखते हैं…. दोष किसका है ?

न तो गौतम बुद्ध निकले थे गरीबों की सेवा करने और न ही महावीर और न ही ओशो | इन सभी ने केवल मार्ग दिखाया, जो आगे बढ़ना चाहते थे वे बढ़ गये, जो भीख और दान की आस में बैठे थे, वे बैठे रह गये | बुद्ध को गए वर्षो बीत गये, महावीर को गये वर्षों बीत गये, ओशो भी चले गये…. लेकिन लोग आज भी बैठे हैं कि कोई दान कर दे कोई भीख दे तो दो वक्त की रोटी मिल जाये |

श्री कृष्ण भी राजा रहते हुए, कभी किसी गरीब को रोटी खिलाने नहीं पहुंचे यहाँ तक कि अपने मित्र सुदामा को भी | वह तो सुदामा जब स्वयं उनके पास पहुँचा तो उनकी सहायता हुई, वरना वे तो ईश्वर थे, क्या उनको सुदामा की आर्थिक स्थिति के विषय में पता नहीं था ?


अक्सर जमीन से जुड़े लोग, मेहनती और पढ़े-लिखे अंग्रेजी बोलने वाले विद्वान उन लोगों को निकम्मा, मुफ्तखोर कहते हैं जो साधक हैं या समाज से हटकर रहते हैं, जैसे कि बौद्ध भिक्षुक, संन्यासी, तपस्वी आदि | इन मेहनती लोगों को लगता है कि वे लोग समाज पर बोझ हैं जो ध्यान, साधना के नाम पर निठल्ले बैठे रहते हैं, न कहीं नौकरी करते हैं और न कुछ कमाते हैं | लेकिन यदि ध्यान दे तो समाज पर उनका कोई बोझ है ही नहीं, वे तो केवल उतना ही लेते हैं जितना आप देना चाहें | न तो वे आपको धर्मों के ठेकेदारों की तरह डरा धमका कर पैसे वसूलते हैं, न ही ठग व लुटेरों की तरह और नहीं सरकार की तरह महँगाई और नए नए टैक्स के नाम पर | और इनकी निंदा भी वही लोग सबसे अधिक करते हैं, जो कभी इनपर तो क्या, किसी भी असहाय कमजोर की कोई आर्थिक सहायता नहीं करते | कभी दिल खुश हुआ और बहुत उदारता आई भी तो एक-दो रूपये का सिक्का उछाल देते हैं किसी भिखारी के सामने | बस समझते हैं कि बहुत बड़ा दान कर दिया और अब राजा हरिश्चन्द्र या कर्ण से बड़े दानी हो गये |

लेकिन फिर इन साधू-सन्यासियों या बुद्ध जैसे चैतन्यों का योगदान होता क्या है समाज पर जब ये लोग कुछ नहीं करते, केवल अपने में मस्त रहते हैं और भिक्षा या दान पर जीवित रहते हैं ?

यहाँ में उन साधू-सन्यासियों की या बाबाओं की बात नहीं कर रहा जो जन्मजात बनिया होते हैं और बाबागिरी का धंधा जमाये बैठे हैं | न ही उन बाबाओं की बात कर रहा हूँ जो इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट बिजनेस में व्यस्त है | मैं बुद्ध, महावीर, स्वामी विवेकानंद, ठाकुर दयानन्द, रामकृष्ण परमहंस जैसे महात्माओं की बात कर रहा हूँ | ये लोग ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे होते हैं, ये लोग सनातन धर्म का पालन कर रहे होते हैं इसलिए इनका सम्मान है | और यदि कोई इनकी नकल करने निकल पड़े, जैसे कि आजकल अधिकांश साधू-संत और संन्यासी कर रहे हैं, तो वे बुद्ध व चैतन्यों को कलंकित ही कर रहे होते हैं | आजकल गोल्डनबाबा जैसे बाबाओं का जमाना चल रहा है | अब बाबागिरी एक व्यवसाय में परिवर्तित हो गया है और बनियों ने भगवाधारण कर रखा है | लेकिन स्वार्थ में डूबा समाज इनको सर आँखों में बैठाये हुए है | वास्तविक संत या संन्यासी आज भी अपनी साधना में ही रत है, लेकिन उसे ये समाज हिकारत की नजर से देखता है | क्योंकि उन्हें लगता है कि ये लोग उनपर निर्भर हैं और समाज पर बोझ हैं | जो ठग रहे हैं, जो लूट रहे हैं उन्हें ये समाज बड़े सम्मान की नजर से देखते हैं…. दोष किसका है ? उस समाज का जो व्यक्तिगत स्वार्थ को सर्वोपरि मानता है | और ये स्वार्थी लोग उन को समाज पर बोझ कहते हैं, जिनको दो वक्त की रोटी खिलाने की भी हैसियत नहीं होती | लेकिन को खाते पीते, सोने में लदे घूम रहे हैं, उन साधू-संतो खिलाने पिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ते |

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तो ये बुद्ध और महावीर जैसे लोग, ये ठाकुर दयानंद, स्वामी विवेकानंद, ओशो जैसे लोग आप पर निर्भर नहीं हैं, और नहीं ये लोग कोई साधारण कार्य कर रहे होते हैं | ये लोग समाज को नई दिशा दिखा रहे होते हैं, ये लोग समाज को जागृत कर रहे होते हैं और यह कोई आसान काम नहीं है और न ही नौ से पांच की ड्यूटी है | न ही ये लोग सैनिकों और पुलिस की तरह सरकार के गुलाम हैं कि जब आदेश मिला तो किसी पर भी लाठी चला दो, पेलेट गन चला दो या जेल में ठूँस दो झूठे सबूत और गवाहों के बल पर | ये लोग स्वतंत्र हैं और सनातन धर्म पर आधारित ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए समाज को जागृत कर रहे होते हैं |

स्वाभाविक ही है कि यह प्रश्न उठे कि अपनी मेहनत के बल पर कमा खा नहीं सकते जो, वे समाज को भला कैसे जागृत कर सकते हैं ? वे लोग समाज का भला कैसे कर सकते हैं ? जबकि आप लोगों का मानना है कि समाज का भला तो साइंटिस्ट करते हैं नए नये अविष्कार करके |

तो अविष्कार यानि खोज दो प्रकार के होते हैं; एक भौतिक और एक पारलौकिक | भौतिक आविष्कारों का परिणाम है परमाणु बम, दूषित जल, वायुप्रदुषण, प्रदूषित वातावरण, दूषित नदी और सागर, कूड़े-कचरों का ढेर, लुप्त होते वन, खेत, किसान व आदिवासी, लुप्त होते वन्य जीव, सिमटता परिवार, मानसिक अशांति, तनाव, हिंसा, अत्याचार, बलात्कार, शोषण… आदि |

लेकिन परालौकिक आविष्कारों से मानसिक शांति मिलती है, परस्पर सौहार्द की भावना जागृत होती हैं, सामाजिक एकता व सहयोग की भावना जागृत होती है, अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध रखें के प्रयोजन किये जाते हैं, व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए किसी का शोषण व अत्याचार न करने की भावना विकसित होती है | और यह सब होता है उन्हीं सनातनियों के कारण जिन्हें आप समाज पर बोझ कहते हैं | वे लोग कई तरह से समाज को योगदान देते हैं जैसे कि; अपने व्यव्हार से व सदाचार से, भगवत या कथावाचन से, ध्यान व योग की विधियाँ सिखाकर, लेखन द्वारा समाज को अपने विचारों से अवगत करवाकर, या फिर साधना से स्वयं के आसपास के वातावरण को आलौकित करके | ये लोग न तो धर्मों के ठेकेदारों की तरह विषैला वातावरण बनाकर आपस में लोगों को लड़वाते हैं, न ही आणविक अस्त्र-शास्त्रों पर जनता की खून पसीने की कमाई बर्बाद करते हैं, न ही विकास व धर्मरक्षा के नाम पर धन ठग कर विदेशों में जमा करते हैं…..यदि आप इनको दान करते भी हैं, तो उसमें से अधिकांश तो किसी और की सहायता में खर्च कर देते हैं | हाँ यह सही है कि ऐसे साधू-संत अब दुर्लभ हैं लेकिन बिलकुल ही लुप्त हो गये ऐसा भी नहीं है |

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यह और बात है कि ऐसे ही साधू-संतों की आढ़ में बहुरूपिये बनिए आजकल बाबागिरी का धंधा जमा रखे हैं और यही लोग आपको हर जगह मिलेंगे | फिर आप किसी तीर्थस्थल पर जाएँ या किसी धार्मिक स्थल पर, हर जगह इन्हीं व्यापारियों ने अड्डा जमा रखा है और वास्तविक साधू-सन्यासियों से भेंट शायद ही किसी की हो पाती हो | और यह सही भी है, क्योंकि वास्तविक साधू-संन्यासी आपके व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ती के लिए होता भी नहीं, आपके व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति के लिए तो ये ठग और बहुरूपिये साधू-संन्यासी ही सही हैं | ये ही ढोंगी-पाखण्डी, बहुरूपिये साधू-संत आपकी मनोकामनाएं पूरी करने में सक्षम होते हैं, वास्तविक साधू संन्यासी ऐसा कोई तमाशा नहीं दिखाते | उन्हें आपके दिखावों और आडम्बरों से भरा स्वार्थी सेवाभाव पहली ही नजर में समझ में आ जाता है, इसलिए आपकी सेवा और भेंटों का उनपर कोई असर नहीं पड़ता | बहुत ही कम लोग होते हैं, जो निश्छल निःस्वार्थ भाव से उनकी सेवा करते हैं या आर्थिक सहयोग करते हैं | और ऐसे लोगों को बिना मांगे ही बहुत कुछ प्राप्त होने लगता है और उन्हें कभी पता भी नहीं चल पाता की जिनकी वे सेवा कर रहे थे, उनकी कृपा हुई उनपर | लेकिन कुछ भौतिक सुख पाने की आस में कोई सेवा करता है, तो उन्हें वास्तविक साधू-संतों से कुछ भी प्राप्त नहीं होता |

तो आज पाखंडी साधू संतों का यदि साम्राज्य है, तो उसका दोष साधू-संतों को मत दीजिये, उन्हें दीजिये जो स्वार्थ की आराधना करते हैं | जिनके लिए व्यक्तिगत स्वार्थों से अधिक और कुछ नहीं | और ऐसे निम्नस्तर के लोगों के लिए निम्नस्तर के साधू-संत उपलब्ध हैं और ऐसे साधू-संतों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है | क्योंकि समाज दिन-प्रति-दिन गिरता ही जा रहा है | तो स्वाभाविक ही है, जैसे ऋषि-मुनि लुप्त हो गये, वैसे ही वास्तविक सनातनी साधू-संत भी जल्द ही लुप्त हो जायेंगे और रह जायेंगे धर्म के नाम पर लड़ने-लड़वाने वाले, समाज में नफरत के ज़हर घोलने वाले साधू संत |

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वापस मुड़कर देखिये, क्या बुद्ध ने समाज में ज़हर बोया ? क्या महावीर ने समाज में ज़हर बोया ? क्या शिर्डी के साईं ने समाज में ज़हर बोया ? क्या स्वामी विवेकानंद, ठाकुर दयानंद देव ने समाज में ज़हर बोया, क्या ओशो ने समाज में ज़हर बोया ?

नहीं न ? लेकिन समाज उपर उठने के बजाये नीचे ही गिरता जा रहा है, नफरत फ़ैलाने वाले साधू-संतों, गहनों जेवरों में लदे रहने वाले साधू-संतों को सर आँखों में बैठा रहा है | और फिर कहता है कि साधू-संन्यासी समाज पर बोझ हैं ! ~विशुद्ध चैतन्य

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