संकीर्णता और स्वतंत्रता में जमीन आसमान का अंतर होता है

संकीर्णता व्यक्ति ही नहीं, समाज व राष्ट्र को भी ले डूबता है | जबकि स्वतंत्रता व्यक्ति व समाज के साथ राष्ट्र को भी समृद्ध व शक्तिशाली बनाता है |

यदि हम आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो कोई राष्ट्र नहीं है, कोई सीमा नहीं है | यदि सीमा कोई है तो वह भी इतनी ही कि हम पृथ्वी से बाहर जीवित नहीं रह सकते यदि वैज्ञानिक संसाधनों का प्रयोग न करें | हमें अंतरिक्ष में जाना होगा तो हम यह नहीं कह सकते कि हम अंतरिक्ष यात्रियों के लिबास नहीं पहनेंगे क्योंकि हमारी ईश्वरीय किताबों में वह वर्जित है, हम तो कुरता पजामा पहन कर ही अन्तरिक्ष जायेंगे | हिमालय में जाना हो तो इस्लामिक ड्रेस काम नहीं आएगी, वहां तो वही पहनना होगा जिससे जिससे ठण्ड से बचा जा सके | इस्लामी ड्रेस रेगिस्तान के लिए उपयूक्त है, लेकिन हिमालय या साइबेरिया में नहीं चलेगा |

तो कुछ सीमाएं स्वतः प्राकृतिक रूप से बन जातीं हैं, हमारी मन पसंद पोषक हमें छोडनी ही पड़ेगी | एक गाँव के जाट को पेड़ के नीचे चारपाई लगाकर आराम करने की आदत है, अगर वह हिमालय में चला जाये तो क्या वह पेड़ के नीचे चारपाई लगाकर वैसे ही आराम कर पायेगा, जैसे अपने गाँव में करता है ?

इसी प्रकार राष्ट्र की सीमाएँ तय हुईं और इस प्रकार मोहल्ला और मकान की सीमाएं तय हुईं | जब आप अपने मकान या घर में हैं तो आप स्वतंत्र हैं अपने अंदाज़ में जीने के लिए | लेकिन घर से बाहर निकलते ही आपको कुछ मर्यादाओं का ध्यान रखना होता है, आप नंगे बाहर नहीं निकल सकते | इसी प्रकार एक देश से दूसरे देशों में जाते समय उस देश की संस्कृति व समाज को को ध्यान में रखना चाहिए | जो अपने देश में हम स्वतंत्रतापूर्वक करते हैं वही हो सकता है कि दूसरे देश में स्वीकार्य न हो, तो उसे करने की आवश्यकता क्या है ? वापस अपने देश या अपने घर लौट आइये और वह कीजिये जो करना चाहते हैं |


स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि राष्ट्रीय भावनाओं और उसके सम्मान को ही ताक पर रख दो और यदि इतनी ही समस्या है तो उन मुल्कों पर जाते ही क्यों हैं ये लोग जिनमें राष्ट्रगीत गाने में परेशानी होती है ? इनकी इसी संकीर्णता के कारण ये लोग न खुद चैन से रहते हैं और न ही दूसरों को चैन से जीने देते हैं | इस्लामिक राष्ट्र बन गये इतने सारे, आराम से जाकर वहां रहें, दूसरे राष्ट्रों पर अपनी धार्मिकता क्यों थोप रहे हैं ?

स्वतंत्रता का अर्थ यह तो नहीं कि राष्ट्र से उपर हो गये या आपका धर्म ही सबकुछ हो गया और राष्ट्र कुछ नहीं ?

यह ठीक है कि राष्ट्रगान गाने से कोई राष्ट्रभक्त नहीं हो जाता और नहीं गाने से कोई राष्ट्रद्रोही नहीं हो जाता, लेकिन फिर बहुत सी बातें लागू हो जाती हैं | जैसे कि किसी भी धार्मिक ग्रन्थ में नहीं लिखा है कि फेसबुक प्रयोग करो, किसी भी धार्मिक ग्रंथों में नहीं लिखा है कि मोबाइल या लेपटॉप प्रयोग करो… यह भी छोड़िये | वही सब प्रयोग कीजिये जो आपके ग्रंथो में लिखा है | वही ऊंट की सवारी कीजिये, वही गधे की सवारी करिए.. काहे को हवाई जहाज और रेलगाड़ी या कारों का प्रयोग करते हैं ? यदि सच्चे मुस्लमान हैं तो आज से नहीं, बल्कि अभी से इन सब का प्रयोग बंद कर दीजिये और वही अपनाइए जो आपकी ईश्वरीय ग्रंथों में लिखा है | ~विशुद्ध चैतन्य
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