जब व्यक्ति मजबूरी में प्रधानमन्त्री या राष्ट्रपति बनता है, तो वह गुलाम हो जाता है

ईश्वर जब भी हमें किसी ऐसी परिस्थिति में डालते हैं जहाँ हम विवश हो जाते हैं वह करने के लिए, जो हम नहीं करना चाहते, तब समय होता है यह विचारने का कि हम कब और कैसे भटक गये | हम स्वयं से कब दूर हुए और कैसे हुए |

लगभग हर जागृत व्यक्ति, दार्शनिक व आध्यात्मिक व्यक्तियों ने यही कहा कि स्वयं को खोजो, स्वयं को जानो | लेकिन लोग ईश्वर को खोजने निकल पड़ते हैं, दुनिया भर के उलटे सीधे कार्यों और उत्पातों में लगे रहते हैं |

मैं स्वयं मानता हूँ कि दुनिया की सबसे बड़ी मुर्खता है ईश्वर की खोज करना और सबसे बड़ी बुद्धिमानी है स्वयं की खोज करना | लेकिन दुनिया ईश्वर को खोजना महान कार्य मानती है और स्वयं को खोजना मूर्खता मानती है | बचपन से ही समाज बच्चे से उसकी उसकी मौलिकता छीनने में लग जाता है, कहीं धर्म के नाम पर तो कहीं इज्जत और शोहरत के नाम पर, कहीं नौकरी और दौलत के नाम पर | परिवार व समाज बच्चे से कभी नहीं जानना चाहता कि वह किस उद्देश्य से आया है, बल्कि वे अपनी अपनी थोपना शुरू कर देते हैं उस पर | और एक समय आता है जब उसके मुँह से निकलता है, “मैं मजबूरी में प्रधानमंत्री बना, मैं तो संघ का आदमी हूँ |”

और जब व्यक्ति मजबूरी में प्रधानमन्त्री या राष्ट्रपति बनता है, तो वह गुलाम हो जाता है | वह कठपुतली बन जाता है उन लोगों का जिन्होंने उसे प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनाया अपने अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए | उसकी स्थिति उस नौकर की तरह हो जाती है, जो विवशता में नौकरी कर रहा है |

आपने ऐसे बहुत से लोग अपने जीवन में देखे होंगे और उस भीड़ में स्वयं को भी देखा होगा, जो विवशता में कोई काम करते हैं | तब काम की गुणवत्ता महत्वपूर्ण नहीं रहती, काम कैसे जल्दी से जल्दी समाप्त हो और पीछा छूटे वाली मानसिकता महत्वपूर्ण हो जाती है | बच्चे विवशता में यदि स्कूल जाते हैं, तो उनका मन स्कूल में कभी नहीं लगेगा, कोई शिल्पकार विवशता में कोई प्रतिमा बनाता है तो वह कितनी ही सुंदर दिखे, लेकिन बेजान लगेगी, वहीँ रूचि से बनाता है तो साधारण सी चित्रकारी भी जीवंत दिखने लगती है, जैसे कि मोनालिसा की पेंटिंग |

कुछ लोग पूजा-पाठ करने का ढोंग करते हैं और कुछ लोग वास्तव में पूजा करते हैं, दोनों को यदि आप ध्यान से देखें तो ढोंगी आपको अधिक भक्ति में डूबा दिखाई देगा और वास्तविक पुजारी साधारण लगेगा | दोनों में जो महत्वपूर्ण अंतर है वह यह कि ढोंगी दिखाने के लिए पूजा-पाठ करता है और वास्तविक पुजारी नियमित अपने में ही खोया हुआ पूजा करता है | उसे परवाह ही नहीं होती कि कोई देख रहा है या नहीं | इसी प्रकार किसी को बगीचे में रूचि है तो वह नियमित बागबानी करेगा, बिना कोई बहाना बनाये | वह बीमारी में भी अपने बगीचे में जाएगा… लेकिन नकली माली दिखाने के लिए ही करेगा जो कुछ भी करेगा, यदि कोई न हो तो वह तब भी बगीचे में झाँकने नहीं जायेगा जब सारे पौधे मर जाएँ |

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जिनके पास कारीगर हैं या कई कर्मचारियों का स्टाफ है, वे भी अच्छी तरह जानते हैं कि अगर उत्पादकता बढ़ानी है तो वहाँ खड़े रहना आवश्यक है, वरना उत्पादकता में कमी आ जाएगी | क्योंकि अधिकाँश तो मजबूरी में नौकरी कर रहे हैं, रूचि से नहीं | इसलिए जैसे ही मालिक या मैनेजर उनकी नजर से ओझल होता है उनके हाथ कमजोर पड़ने लगते हैं |

तो जिनकी रूचि होती है जिस काम में, वे उस काम में न केवल सफल रहते हैं, बल्कि वे कई असाधारण कार्य कर देते हैं जैसे कि एडिसन ने किये | इसी प्रकार अब्राहम लिंकन (Abraham Lincoln) विश्व के उन महान राजनेताओं में से एक थे जिन्होंने अमेरीका से गुलामी की प्रथा को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और 1862 में घोषणा कर दास बने लोगों को दास प्रथा से मुक्त किया। वे कभी स्कूल नहीं गए थे लेकिन पढ़ने कि इच्छा के कारण, स्वयं ही पढ़ना-लिखना सीख लिया। अब्राहम लिंकन से उसके बचपन में किसी ने पूछा कि वह बड़े होकर क्या बनना चाहता है तो लिंकन ने कहा, “राष्ट्रपति !”

अब्राहम लिंकन के जीवन में कई मुश्किलें आई –

वे 21 वर्ष की आयु में व्यापार में असफल रहे।

वे 22 वर्ष की आयु में विधानसभा के चुनाव में हार गये।

वे 24 वर्ष की आयु में दुबारा व्यापार में असफल रहे।

27 वर्ष की आयु में उन्हें नर्वस ब्रेकडाउन हो गया।

वे 29 वर्ष की आयु में स्पीकर का चुनाव हार गये।

वे 34 वर्ष की आयु में कॉग्रेशनल रेस हार गये।
वे 45 वर्ष की आयु में सीनेटॉरियल रेस हार गये।
वे 47 वर्ष की आयु में उप-राष्ट्रपति बनने से वंचित रह गये।
वे 49 वर्ष की आयु में सीनेट में दुबारा हार गये।

अब्राहम लिंकन इतनी असफलता के बाद भी निराश नहीं हुए, बल्कि एक नए उत्साह और समर्पण के साथ आगे बढ़ते रहे। यह बहुत ही आश्चर्य का विषय कि अब्राहम लिंकन स्कूल नहीं गए और वे जिंदगी में बार बार असफल रहे लेकिन अपने जीवन लक्ष्य को 52 वर्ष की आयु में प्राप्त कर लिया और 1860 में संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए।

लेकिन हम यदि अपने आसपास नजर दौडाएं तो अधिकाँश लोगों को आप पाएंगे कि विवशता में कर रहे हैं जो कुछ भी कर रहे हैं | कुछ लोग नौकरी विवशता में करते हैं, तो कुछ लोग विवाह विवशता में करते हैं और कुछ माएँ तो बच्चे भी विवशता में पैदा करती और पालती हैं | हमारे चारों ओर विवश लोगों की भीड़ है और ये विवश भीड़, विवश लोगों को अपना नेता चुनती है और जीवन भर अपनी विवशता को लेकर रोती रहती है |

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ऐसा देश जो विवश लोगों की भीड़ तैयार करता हो, व्यक्तिगत रूचि व योग्यता को कोई महत्व न देता हो, उसे विवश नेता और प्रशासनिक अधिकारी ही मिलेंगे | और ये विवश महत्वपूर्ण लोग अपनी खीज आप पर ही उतारेंगे | कल कहीं पढ़ रहा था कि सीआरपीऍफ़ के डीजी ने कहा कि जवानों की मौत होती है तो उनके परिवार किस मानवाधिकार के पास जाएँ…

यह वतव्य स्वयं ही यह सिद्ध कर रहा है कि वह पुलिस अधिकारी भी मोदी जी की तरह ही मजबूरी में अधिकारी बना | उसे नहीं पता कि पुलिस या फ़ौज में भर्ती होने का अर्थ ही है अपनी प्राणों को दाँव पर लगाना | और मानवाधिकार की बातें इन जैसे अधिकारीयों को तभी शोभा देती है, जब वे जवानों के लिए उचित खाने पीने व अन्य आवश्यक सुविधाओं का ध्यान रखें… वे जिस हाल में रहते हैं कभी कोई झांककर देख ले तो मानवाधिकार समझ में आ जायेगा |

वे जवान जो नागरिकों पर अत्याचार करते हैं, रेल में यात्रा करते समय महिलाओं से अभद्रता करते हैं, मौका मिला तो बलात्कार से भी नहीं चूकते, वे भी मजबूरी में ही सेना में भर्ती हुए हैं | सेना का अर्थ ही वेतन लेकर सरकार के आदेश पर हत्या या आतंक पैदा करना | उनकी नियुक्ति के साथ ही यह अलिखित समझौता हो जाता है कि उन्हें जनता के साथ नहीं, सरकार के साथ खड़े रहना है फिर चाहे सरकार सही हो या गलत | जबकि उनका मुख्य कार्य है बाहरी आक्रान्ताओं से सीमा की सुरक्षा करना और उनपर अपना आतंक बनाये रखना | लेकिन सेना का प्रयोग आम नागरिकों पर भी किया जाता है और चूँकि सरकार से आदेश प्राप्त होता है, इसलिए आम नागरिक उनके शत्रु ही हुए | इसलिए ये लोग रेल में यात्रा करते समय भी नागरिकों को अपना शत्रु मानते हैं क्योंकि ये राजसेवक हैं राष्ट्रसेवक नहीं | और राजसेवक इसलिए नहीं बने क्योंकि देशभक्ति कूट-कूटकर भरी हुई थी, बल्कि इसलिए बने क्योंकि जनता पर इनका रौब रहेगा | सौभाग्य से सेना में ऐसे राजसेवक कम ही हैं, अधिकांश राष्ट्रभक्त ही होते हैं |

इन अधिकारी महोदय को यह नहीं पता शायद कि सेना के जवानों को आप दूसरे की भूमि पर भेजोगे तो वे विरोध करेंगे ही | इनके जवान यदि उनके किसी व्यक्ति चोट पहुँचायेंगे तो इनको भी चोट पहुँचेगी ही | सेना का काम है अपने देश की सुरक्षा करना बाहरी आक्रमणकारियों से, लेकिन यहाँ तो सेना को लगा दिया जाता है अपने ही देश के असंतुष्ट नागरिकों के दमन में और फिर ये लोग मानवाधिकार की बात करते हैं | अरे आप लोग उनके उस मौलिक मानवधिकार का हनन कर रहे होते हो, जिसमें प्रत्येक नागरिक को उसकी अपनी भूमि में रहने का अधिकार है और आप लोग भूमाफियाओं के साथ मिलकर उनको उन्हीने की जमीन से खदेड़ रहे हो ? उन्हें अधिकार प्राप्त है असंतुष्ट होने पर विरोध करने का और आप उनका दमन कर रहे हैं तो क्या वे फूलमालायें पहनाएंगे ? जब सेना किसी निर्दोष को मार देती है, झूठे आरोपों में गिरफ्तार कर लेती है.. तब मानवाधिकार कहाँ चला जाता है ? जब पुलिस किसी को भी जब चाहे उठा लेती है और उस बेचारे को स्वयं को निर्दोष साबित करने में पन्द्रह बीस साल लग जाते हैं.. तब मानवाधिकार कहाँ चला जाता है ? अपनी विवशता की खीज को दूसरों पर थोपने से समस्या का हल नहीं हो जाएगा |

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तो हमने विवश लोगों का समाज बना रखा है | विवश लोगों को सत्ता और शासकीय अधिकार दे रखा है | और ये विवश लोग जनता को हर हाल में विवश रखना चाहते हैं क्योंकि इससे इनकी आत्मा को शांति मिलती है | कहीं लोग भूखों मर रहे हैं तो ये लोग उनकी सहायता करने नहीं जायेंगे, बल्कि जले में नामक छिड़केंगे पूंजपतियों के लाखों करोड़ों के कर्जे और टैक्स माफ़ करके | क्योंकि इससे उनको बदला लेने का अवसर मिल जाता है | कही कोई किसान भुखमरी में आत्महत्या कर रहा होता है तो उस समय ये विवश नेता 30 हज़ार रूपये किलो की सब्जी खा रहे होते हैं, क्योंकि इससे मन को एक तृप्ति मिलती है | असम में बाढ़ आ जाये तो कोई मिडिया न्यूज़ नहीं दिखाएगी, लेकिन कोई नेता उलटी कर दे तो उसे उठाकर दो दिन तक जुगाली करती रहती रहेगी | और यह सब क्यों ?

क्योंकि मीडिया में भी विवश लोग हैं | मजबूरी में मीडिया में नौकरी की मन मारकर काम कर रहे हैं |

जब तक समाज बच्चे को उसके मौलिक गुणों व योग्यताओं को निखारने में सहयोगी नहीं हो जाता है, हमें ऐसे ही विवश नेता, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षक और व्यापारी मिलेंगे | ऐसे ही विवश लोग नागरिकों के खून पसीने कमाई को घोटालों और आतंकियों को पालने पोसने में खर्च करते हैं और फिर उनसे निपटने के लिए अलग से खर्च करते हैं | जनता यह सोचती है कि हमें आतंकियों से सुरक्षा दी जा रही है, ये गौरक्षा के नाम पर उपद्रव, ये धर्म और जाति के नाम पर दंगे-फसाद सब इन्हीं विवश नेताओं की करतूत है, वरना जनता तो आपस में लड़ना ही नहीं चाहती | उसकी तो अपनी ही समस्याएं कम नहीं हैं वह तो स्वयं विवश है | और ऐसे विवश लोगों से समाज व राष्ट्र को कुछ भी श्रेष्ठ की आशा नहीं रखनी चाहिए | ~ विशुद्ध चैतन्य
 

यह तस्वीर बता रही है कि किसे नेता लोग जनता के पैसों को बरबाद करते हैं खुद के पैदा किये हुए आतंक से |

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