गुरु को कैसा होना चाहिए

एक सज्जन मुझे उदाहरण किसी और का देकर समझा रहे थे कि गुरु को कैसा होना चाहिए | फिर उनकी बातों से मुझे लगा कि वे मुझे ही अप्रत्यक्ष रूप से कह रहे हैं कि गुरु को कैसा होना चाहिए | कुल मिलाकर मुझे जो समझ में आया कि वे मुझसे यह आशा कर रहे हैं कि मैं गुरु के रूप में उभरूँ या फिर वे यह मान रहे हैं कि मैं गुरु होने योग्य ही नहीं हूँ | वे समझाना चाह रहे थे कि गुरु बनने के लिए पहले खुद को ऊपर उठाना पड़ता है, खुद को बहुत कुछ सीखना पड़ता है और तब जाकर वह किसी को शिष्य बनाने योग्य होता है…. हालाँकि जिस व्यक्ति का वे उदाहरण ले रहे थे उसका गुरु होने या उन सब से कोई लेना देना नहीं था वह तो बेचारा एक बूढ़ा नौकर था किसी का और वह भी अब शान्ति से पड़ा रहता है क्योंकि कुछ काम वगैरह करने लायक भी नहीं है | और मुझे नहीं लगता कि वह किसी का गुरु होने जैसी कोई बात कभी की हो या होना चाहता हो….

तो फिर ले दे कर मैं ही रह गया जो फेसबुक में प्रवचन देता रहता हूँ | यह और बात है कि वह किसी के समझ में आती नहीं फिर भी लोग टाइमपास कर लेते हैं और मन बहला लेते हैं | कुछ लोग मुझे गुरूजी भी बोल देते हैं खुश करने के लिए और कुछ लोग स्वामी जी बोल देते हैं तो कुछ लोग सरजी भी कहते हैं | यही सब देखकर उन सज्जन को मुझपर दया आ गयी होगी क्योंकि उनके तो ढेर सारे शिष्य हैं |

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हालांकि मैं पहले भी कई बार स्पष्ट कर चुका हूँ कि मैं कोई गुरु-वुरु नहीं हूँ और न ही कोई शिष्य वगैरह रखता हूँ | इस विषय पर एक पोस्ट पहले भी दे चुका हूँ यदि आपने नहीं पढ़ा तो पढ़ लीजिये… ‘गुरु कि तलाश’

फिर मैं दुनिया से थोड़ा अलग हटकर सोचता हूँ इसलिए दुनिया वालों से हटकर रहता हूँ | जैसे कि गुरु की जो परिभाषा आप लोग जानते हैं या मानते हैं मैं वैसा नहीं मानता | गुरु मेरी दृष्टि में बिलकुल ही अलग स्थान रखता है | गुरु न तो कोई चुन सकता है और न ही गुरु किसी शिष्य को चुनता है | गुरु और शिष्य स्वाभाविक रूप से किसी विशेष प्रयोजन के लिए किसी विशेष योग्यतानुसार ही मिलते हैं | कौन कब किसका शिष्य हो जायेगा और कौन कब गुरु हो जाएगा किसी का वह कोई नहीं जानता | जैसे कि मैं नहीं जानता था कि मेरा गुरु कौन कब कहाँ कैसे मिलेगा | मेरे गुरु ने मुझे कोई शिक्षा या प्रवचन नहीं दिया और न ही कभी कहा कि मुझे क्या करना है और कैसे करना है | लेकिन फिर भी हम गुरु शिष्य हैं | न तो वे कोई अध्यात्मिक विषय पर चर्चा करते हैं और न ही कभी कोई जनकल्याण से सम्बन्धी चर्चा करते हैं… लेकिन फिर भी हम गुरु शिष्य हैं | कोई मुझसे पूछे कभी कि आपके गुरु ने क्या सिखाया आपको, तो मेरे पास कोई उत्तर नहीं होगा | लेकिन दुनिया हमें गुरु शिष्य के रूप में जानती हैं और हम दोनों का ही सम्मान करती है |

तो… गुरु और ट्रेनर में अंतर होता है | गुरु और शिक्षक में अंतर होता है | गुरु और अध्यापक में अंतर होता है | एक गुरु शिक्षक भी हो सकता है, अध्यापक भी, ट्रेनर भी और इसके विपरीत एक शिक्षक गुरु हो सकता है, एक अध्यापक गुरु हो सकता है, एक ट्रेनर गुरु हो सकता है… लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि गुरु कुछ आपको सिखाये ही | हो सकता कि गुरु से आपकी बातचीत भी न होती हो और हो सकता है कि गुरु से कभी भेंट भी न हुई हो | लेकिन गुरु तब भी बाकी सभी से ऊपर ही रहेंगे | हो सकता है कि गुरु से रोज ही आपका झगड़ा होता हो, हो सकता है कि गुरु से रोज ही आपकी मार-पीट, गाली-गलौज होती हो, हो सकता है कि आपको पता ही न हो कि यही आपका गुरु है… हो सकता है कि गुरु आपकी उम्र से बहुत ही छोटा हो, हो सकता है कि गुरु कोई छोटा बच्चा ही हो….. लेकिन आप स्वयं तय नहीं कर सकते और न ही जान सकते है कि
आपका गुरु आपके साथ है या आप अपने गुरु से रोज फेसबुक पर चैट करते रहते हैं….लेकिन एक दिन स्वयं भीतर ही यह अहसास होने लगता है कि आपने गुरु को पा लिया है | ठीक वैसे ही जैसे किसी को अपना प्रेमी या प्रेमिका के विषय में पता चलता है | जैसे कि किसी को ईश्वर के विषय में पता चलता है कि ईश्वर ने कैसे बुरे समय में उसकी सहायता की या दर्शन दिए और वह भी ऐसे रूप में ज्सिमें कभी वह सोच ही नहीं सकता था |

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इसलिए जो भी सज्जन मेरे पोस्ट में लोगों को गुरूजी, स्वामीजी कहते देखकर जलते हैं या मेरी योग्यता की परीक्षा लेने के लिए तरह तरह के प्रश्न पूछते रहते हैं… वे निश्चिन्त हो जाएँ | क्योंकि मैं आपकी दुनिया का गुरु नहीं हूँ और यदि कभी किसी का गुरु हो भी गया तो सैकड़ों शिष्यधारी गुरुओं की सत्ता पर कोई संकट नहीं आएगा | क्योंकि जिस तरह के गुरु और शिष्यों को दुनिया में सम्मान मिलरहा है और गुरु या शिष्य हवा में उड़ रहे हैं…. मैं न तो उन गुरुओं की श्रेणी में आता हूँ और न ही शिष्यों की श्रेणी में आता हूँ | हमें तो ईश्वर ने सिंगल पीस बना कर भेजा है और साथ ही आशीर्वाद भी दे दिया था कि विशुद्ध जैसा न कोई हुआ था कभी और न ही कभी होगा | यह और बात है कि यह आशीर्वाद कब दिया, किसके सामने दिया मुझे भी नहीं पता | ~विशुद्ध चैतन्य

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