द्वार पर उसने ऐसे दस्तक दी कि जैसे उसने सब जीवन लुटा दिया हो दान में

प्रश्न: आपने कहा कि महावीर हिंसा के भय से अनेक कर्मो से बचते रहे। यह हिंसा का भय था अथवा अहिंसा और करुणा का उद्रेक? 

महावीर के लिए तो अहिंसा और करुणा का उद्रेक ही था, लेकिन महावीर के अनुयायियों के लिए हिंसा का भय। वहीं सदगुरु और अनुयायियों में फर्क पड़ जाता है। कारण बदल जाते हैं, कृत्य एक से मालूम पड़ते हैं। अगर करुणा का उद्रेक हुआ हो, तो तुम दूसरा मर न जाए, इससे चिंतित नहीं हो, क्योंकि तुम जानते ही हो कि मृत्यु तो घटती ही नहीं। तुम सिर्फ इससे चिंतित हो कि मेरे कारण पीड़ा न पहुंचे! अकारण मैं किसी की पीड़ा के लिए आधार न बनूं! तुम्हारी करुणा के कारण ही तुम अपने को हटाते हो उन—उन जगह से, जहां किसी कै लिए पीड़ा बन सकती थी, दुख हो सकता था।

महावीर तो बचते हैं इसीलिए कि महाकरुणा का जन्म हुआ है। लेकिन महावीर के पीछे चलने वाला महाकरुणा के जन्म के कारण नहीं बच रहा है। वह केवल हिंसा न हो जाए, हिंसा होकर कहीं पाप न लग जाए, पाप लगकर कहीं नर्क में न पड़ना पड़े, कर्मबंध न हो जाए, वह हिसाब कर रहा है। उसे दूसरे से प्रयोजन नहीं है। उसे अपने से ही प्रयोजन है। वह हिसाब स्वार्थ का ही है।

लेकिन दोनों के कृत्य एक जैसे हैं। पहचानना बहुत मुश्किल है। क्योंकि दोनों बचते हैं। और बाहर से कोई भेद करना आसान नहीं है। इसलिए प्रत्येक को अपने भीतर ही भेद करने की क्षमता पैदा करनी चाहिए कि मैं किस कारण बच रहा हूं!

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तुम किसी को दान देते हो, तुम दान इसलिए भी दे सकते हो कि देने में तुम्हें आनंद आता है। तुम दान इसलिए भी दे सकते हो कि दान इनवेस्टमेंट है। भविष्य में, मोक्ष में, स्वर्ग में कहीं प्रतिकार, प्रत्युत्तर मिलेगा। तब तुम ब्याज सहित लेने की तैयारी रखोगे।

तुम दान इसलिए भी दे सकते हो कि यह आदमी सामने खड़ा है, मोहल्ले में परेशानी होती है, बेइज्जती होती है। यह मांगे चला जा रहा है और तुम दो पैसा नहीं दे रहे हो। तुम पड़ोस में प्रतिष्ठा बचाने के लिए दान दे सकते हो। तुम इससे छुटकारा पाने के लिए दान दे सकते हो।

हर हालत में कृत्य एक ही होगा कि तुमने कुछ दिया, लेकिन हर हालत में कृत्य का गुणधर्म बदल जाएगा। अगर तुमने आनंद— भाव से दिया है, तो ही दिया। अगर तुम इससे छुटकारा पाना चाहते हो, तो तुमने रिश्वत दी; कि बाबा, क्षमा कर; यहां से हट; कहीं और जा। ये दो पैसे ले और छुटकारा कर। तुमने रिश्वत दी।

अगर तुम पड़ोस के लोगों को दिखाना चाहते हो कि तुम महादानी हो—दो पैसे से महादानी होने में किसको लोभ नहीं सताता—तो तुमने पड़ोस के लोगों से अहंकार खरीदा, तुमने सौदा किया। अगर तुमने इसलिए दिया कि स्वर्ग में इसका प्रतिफल पाओगे और अपने हिसाब की किताब में लिख लोगे कि ब्याज सहित परमात्मा से वसूल करना है.।

मैंने सुना है, एक मारवाड़ी मरा। कुछ भूल—चूक हो गई : वह सीधा स्वर्ग पहुंच गया। द्वारपाल भी देखकर उसे घबड़ाया कि मारवाड़ी और स्वर्ग आ गया! उसने कहा, आप यहां कैसे? उसने कहा कि यहां क्यों न आऊंगा; दान दिया है।

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द्वारपाल भी डरा। खाते—बही खोले, देखा कि तीन पैसे उसने एक बुढ़िया को दिए हैं। तीन पैसों के बल वह स्वर्ग आ गया है। और द्वार पर उसने ऐसे दस्तक दी है कि जैसे उसने सब जीवन लुटा दिया हो दान में। द्वारपाल ने अपने सहयोगी से पूछा कि अब क्या करना? यह छोड़ेगा नहीं। यह ब्याज सहित वसूल करेगा, यह जिस अकड़ से खड़ा है। करना क्या है?

सहयोगी ने खीसे में हाथ डाला, चार पैसे निकालकर उसको दे दिए कि ले, यह तू चार पैसे ले और नर्क जा। और कोई उपाय नहीं है। तू अपना दान ब्याज सहित वापस ले ले और नर्क में निवास कर। कृत्य तो एक जैसे हो सकते हैं। कृत्य का सवाल ही नहीं है। वह भाव—दशा, वह अंत:स्रोत जिससे कृत्य डुबकर आता है, जिसमें से निकलता है, वही निर्णायक है। और उसके लिए तुम्हारे सिवाय और कोई नहीं जांच सकता कि तुम कैसे कर रहे हो।

महावीर की फिक्र छोड़ो। महावीर भय के कारण कर रहे हैं, करुणा के कारण कर रहे हैं, महावीर जानें। तुम अपने जीवन को जांचकर चलो। तुम जो भी करो, वह नकारात्मक न हो, विधायक हो। वह प्रेम से निकले, करुणा से निकले, देने के भाव से निकले, बांटने से निकले, तो तुम्हें अहोभाव उपलब्ध होगा। स्वर्ग में नहीं, क्योंकि इतनी देर नहीं है, यहीं और अभी। प्रेम से किए गए कृत्य में ही तुम्हें आनंद की झलक मिल जाएगी। फल दूर थोड़े ही है। मैं उन लोगों में भरोसा नहीं करता, जो कहते हैं, तुम करोगे अभी, और स्वर्ग में या नर्क में फल पाओगे या अगले जन्म में फल पाओगे! हाथ तो तुम आग में अभी डालोंगे, अगले जन्म में जलोगे। मैं नहीं मानता। हाथ आग में अभी डालोंगे, अभी जलोगे। फूलों के बगीचे से अभी गुजरोगे, अभी सुगंध लोगे।

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जीवन तो बहुत नगद है। उधार की बात ही कुछ शरारत की मालूम पड़ती है। उसमें कुछ चालबाजी है, कुछ चालाक लोगों का हाथ है। वे तुम्हें भरमा रहे हैं।

जीवन बिलकुल नगद है। होना भी चाहिए। जीवन कल के क्षण पर अपने को छोड़ता ही नहीं। तुमने प्रेम किया, तुम इसी क्षण आनंद से मगन हुए। तुमने घृणा की, तुम इसी क्षण नर्क की अग्नि में जले। तुमने क्रोध किया, तुमने विष पीया। तुमने क्षमा की, तुमने अमृत चखा। इसी क्षण! कृत्य में ही छिपा है फल। उससे दूर जाने की कोई भी जरूरत नहीं है।

~ओशो

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