मेरा आत्मज्ञान

समाज के बिछाए जाल पर फँसने की बजाय उसेअपनी शक्ति बना लीजिये 

मुझे कई वर्षों तक अपनी ही तस्वीर खिंचवाने में शर्म आती थी क्योंकि मैं स्वयं को सुंदर नहीं मानता था | मुझे लगता है कि दूसरे लोग मुझसे अधिक सुंदर हैं | बड़ी मजबूरी में पासपोर्ट साइज़ तस्वीर खिंचवाता था वह भी एक ही बार में साठ-सत्तर कॉपियां निकलवा लेता था, ताकि दुबारा न आना पड़े यदि और कहीं आवश्यकता पड़े | तो मैं उन्हीं तस्वीरों को हर जगह प्रयोग करता था, चाहे बैंक हो, चाहे और कोई सरकारी काम हो….वे सारी कॉपियां खत्म होते-होते तीन-चार साल निकल ही जाते थे या फिर वे खुद ही खराब हो जाते थे….. तब फिर कहीं जरूरत पड़ती तब खिंचवाता था |

मेरी पहली पोर्टेट तस्वीर मेरी बहन ने खिंचवाई फोटो स्टूडियो में बस वही ऐसी तस्वीर थी जो मुझे पसंद आई उसके बाद उसी तस्वीर की निगेटिव से तस्वीर निकलवाता और उसको आधा काट कर पासपोर्ट साइज़ की तस्वीर बनाता और वही प्रयोग करता | उस तस्वीर को लगभग दस वर्ष प्रयोग किया | दस वर्ष बाद लोग बोलने लगे कि भाई नई तस्वीर लगाओ, इस तस्वीर से तो आपकी शक्ल बिलकुल नहीं मिलती |

यह कॉम्पेक्स मुझे पिताजी के कारण मिला, क्योंकि वे हमेशा मुझमे कोई न कोई खोट निकालते ही रहते थे | बचपन से ही उनका व्यव्हार मेरे प्रति एक अवांछित बच्चे जैसा रहा | तो मैं अपनी तस्वीरें खुद ही देखना पसंद नहीं करता था, आईना भी मुझे चिढ़ाता हुआ सा लगता था | बेशक मैंने बहुत ही कम उम्र में बहुत ऊँचाइयाँ छू लीं, बहुत मान-सम्मान कमा लिया.. लेकिन अपनी लुक को लेकर मैं हमेशा काम्प्लेक्स में रहा | कभी किसी लड़की ने प्रेम का इज़हार किया भी तो लगा कि वह मेरा मजाक उड़ा रही है क्योंकि मुझसे सुंदर लड़के उसके पीछे पड़े हुए हैं तो मेरे जैसा बदसूरत लड़के को वह भला कैसे प्रेम कर सकती है ?

मैं अपनी इस कमी को छुपाने के लिए अपने हुनर पर ध्यान दिया और बहुत ही जल्दी अपनी एक पहचान बना ली | एक समय था मेरा नाम ही काफी था फिर चाहे वह दूरदर्शन हो, या एडवरटाइजिंग, या म्यूजिक या फिल्म प्रोडक्शन हाउस | लेकिन मैं उसमें भी संतुष्ट नहीं था क्योंकि भीतर एक खालीपन था | कई नौकरियां बदलीं, दो जगह से निकाला भी गया… लेकिन भीतर का खालीपन दूर नहीं हुआ |

फिर एक दिन दुनिया बदल गयी और मैं फूटपाथ पर आ गया | बस वहीँ मुझे पहला आत्मज्ञान हुआ कि मैं कौन हूँ | ये दुनिया मुझसे नहीं, अपने स्वार्थ से प्रेम करती थी | जिनका काम निकलता गया वे किनारे होते गये…. फूटपाथ पर मैं अकेला था | अब भीतर का खालीपन और बाहर का खालीपन बराबर हो गया था | अब मैं पुर्णतः स्वयं में था और अपनी पूर्णता में था | अब कोई दुविधा नहीं रही थी, अब मैं कहीं भी जाकर सो सकता था, कई कई दिन तक बिना खाए रह सकता था…. और चूँकि भूख सहने की आदत पहले से ही थी, तो पेट के लिए मुझे कभी भीख माँगने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी | तो यहाँ से मेरी तपस्या शुरू हुई यानि फूटपाथ से | एक ऐसी स्वतंत्रता का अनुभव हुआ जो पहले कभी नहीं था | अब मुझे यह चिंता नहीं करनी पड़ती थी कि दुनिया क्या कहेगी | अब में जो हूँ जैसा हूँ, वैसा ही हूँ | कई कई दिन बिना नहाये घूमता रहता था सड़कों पर | लेकिन अब मन प्रसन्न था | अब ऐसा लग रहा था कि मैं स्वयं को पा लिया है | अब मैं अकेला नहीं हूँ, क्योंकि अब मुझे किसी की आवश्यकता नही महसूस होती | और इसी अवस्था में अपना मैला कुचैला चेहरा जब सार्वजनिक शौचालयों के शीशे में देखता तो स्वयं से ही प्रेम हो जाता | बहुत ही अद्भुत और आकर्षक लगता था वह चेहरा | और अध्यात्मिक मार्ग वास्तव में क्या है, वह भी वहीं अपने अकेलेपन में ही जाना | अब बहुत कुछ वह बातें समझ में आयीं जो शास्त्रों में तो पढ़ा था, लेकिन अनुभव नहीं था |

वहीँ मैंने ध्यान की कई विधियां भी खोजीं और उनके प्रयोग के परिणाम भी देखे | और वे ही प्रयोग हैं जो मुझे आज ऐसी जगह ले आये, जो मेरे लिए सर्वथा उपयुक्त है | वही साधनाएँ हैं जो मुझे आज आत्मविश्वास से भरा व स्वयं से संतुष्ट अनुभव करवाते हैं | और आज मुझे अपनी तस्वीरों से बिलकुल भी नफरत नहीं होती क्योंकि यह चेहरा यह शरीर ईश्वर ने मुझे मेरे अपने प्रयोग के लिए भेंट की है | दूसरों को मेरे चेहरे और शरीर से कोई लेना देना नहीं, इसलिए उन्हें पसंद आते हैं या नहीं यह अब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता |

जो लोग इस कुंठा से पीड़ित हैं कि लोग क्या कहेंगे, क्या सोचेंगे उन्हें मेरी इस आत्मकथा से शायद कोई लाभ हो, इसलिए मैंने यह आत्मकथा लिखी | हम स्वयं को स्वयं की नजर से ही देखने का अभ्यास यदि शुरू कर दें, हम स्वयं को स्वयं के रूप में ही स्वीकार लें, तो हमारी परिस्थितियां बदलने लगतीं हैं | जो लोग विरोधी होते हैं वे भी आपके महत्व को स्वीकारने लगते हैं, यदि आप स्वयं के आस्तित्व व महत्व को स्वीकारते हैं | यदि आप बाहर की और दौड़ना बंद कर देते हैं, दूसरों का पीछा करना बंद कर देते हैं, तो आपकी मुलाक़ात स्वयं से हो जाती है | और जिस दिन आपकी भेंट स्वयं से होती है, सब कुछ बदलने लगता है | दुःख आपसे पीछा छुड़ाने लगती है और सुख आपको गले लगाने को लालायित रहती है | दुनिया में जितने भी समृद्ध व प्रसिद्द व्यक्ति रहे, उन्होंने दूसरों का पीछा नहीं किया, बल्कि खुद को खोजा | अपनी खूबियों को निखारने में ध्यान दिया अपनी छुपी हुई प्रतिभाओं को खोजा |

इसलिए स्वयं को खोजिये और स्वयं को खोजने के लिए आवश्यक नहीं कि फूटपाथ पर जाएँ या जंगलों पर जाएँ | बस अपने लिए ऐसा वातावरण स्वयं तैयार कर लें कि आपको दूसरों की आवश्यकता ही न पड़े | अधिक से अधिक काम स्वयं करें | रोज सुबह घर से निकलें तो डिग्रीधारी, पढ़े-लिखे बनकर न निकलें यदि आप बेरोजगार हैं | बल्कि एक ऐसा व्यक्ति बनकर निकलें जो शहर में बिलकुल अपरिचित है और शाम तक यदि सौ रूपये नहीं कमा पाए तो भूखे सोना पड़ेगा | मानकर चलिए कि आपको कोई भीख भी नहीं देगा, मानकर चलिए कि आपको कोई उधार भी नहीं देगा, मानकर चलिए कि कोई मुफ्त में खाना भी नहीं खिलायेगा…. बस आप उसी अवस्था में पहुँच जायेंगे जिस अवस्था में कोई तपस्वी जंगल में होता है या मैं था शहर के फूटपाथ पर | और जब इस अवस्था में आप जायेंगे तब आपकी भेंट स्वयं से हो जाएगी | कुछ दिन भूखे भी रहना पड़े तो कोई बात नहीं रहिए.. आप मरेंगे नहीं | लेकिन सुबह सूर्योदय से पहले सारे सुख सुविधा छोड़कर बाहर निकल जाइये… आप पाएंगे कि जल्दी ही आप आत्मनिर्भर हो जायेंगे क्योंकि शाम तक आप सौ रूपये कमाना शुरू कर देंगे | आपने पढ़ा ही होगा की ओबामा की बेटियाँ भी होटल में वेटर का काम कर रहीं हैं…तो वहाँ बच्चों को बचपन से ही आत्मनिर्भर होनी की शिक्षा दी जाती है | आपने पढ़ा ही होगा कि गुजरात के सबसे बड़े हीरा व्यापारी ने अपने बेटे को चार हज़ार मासिक की नौकरी करने चेन्नई भेजा | तो ये लोग बड़े ऐसे ही नहीं बने हैं.. उनकी बुनियाद मजबूत थी और यही चाहते हैं कि उनके बच्चों की बुनियाद भी मजबूत रहे |

तो निकल पड़िए स्वयं की खोज पर ! भूल जाइए वह सब जो दुनिया ने आपके विषय में कहा था, जो दुनिया ने सिखाया पढ़ाया और ब्रह्म से ज्ञान प्राप्त कीजिये सीधे ही | ~विशुद्ध चैतन्य

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