ईश्वर, संत-महंतों के नामों का दुरुपयोग न करें

होली का उत्साह व उमंग, बचपन में ही खो दिया मैंने | ग्यारह बारह वर्ष की आयु तक ही आनन्द ले पाया होली का, लेकिन फिर कभी होली नहीं खेला | कल भी आश्रम के अध्यक्ष ने मुझे अबीर लगाया, और सेवकों ने भी अबीर चढ़ाया… लेकिन न जाने क्यों भीतर ऐसा कुछ नहीं हुआ कि मुझे कोई ख़ुशी मिले | ऐसा लगा कि सब कुछ रसहीन, बेरंग है | शायद यही बैराग है |

हम होली मनाते हैं लेकिन नहीं जानते उद्देश्य क्या है | बस कर्मकांडों की तरह निपटा देते हैं | हम कहते हैं, “बुरा न मानो होली है !” लेकिन इसके आड़ में ऐसे काम कर जाते हैं, जो आदमी तो क्या जानवर को भी बुरा लगेगा | होली की आढ़ में हम बदला लेने से भी नहीं चूकते और पीठ में छुरा भोंकने से भी नहीं चूकते | फिर कहते हैं, “बुरा न मानो होली है |
आज सुबह हमारा रसोइया देर से उठा क्योंकि कई मेहमान आये हुए हैं, तो उसे खाना बनाने खिलाने.. में बहुत देर हो गयी थी | मैं नीचे गया तो देखा एक सन्यासी जो कि बहुत ही बुजुर्ग हैं, चाय का कप लिए रसोई के पास बैठे हुए हैं | मुझे देखते ही शिकायती लहजे में बोले, “कल से ठाकुर को चाय भोग मैं लगा दूंगा, मुझे रसोई की चाबी दिलवा दीजिये | चंदू टाइम पर कभी नहीं उठता और ठाकुर को हमेशा देर से चायभोग लगता है….|”

“क्यों ठाकुर का नाम लेकर चाय पीना चाहते हो, सीधे सीधे चाय नहीं माँग सकते ? और ठाकुर को चाय पिलाने की इतनी ही चिंता है तो बाहर दूकान से लाकर नहीं पिला सकते ? शाम को जब कीर्तन होता है तब आपके पैर में दर्द होता है या सर में दर्द होता है और आप कीर्तन पर बैठ नहीं सकते | चंदू अकेले सारा दिन तुम सब लोगों की सेवा में लगा रहता है कभी कोई हाथ बटाते नहीं…. लेकिन भोग समय पर लगना चाहिए…. ! मैंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया | जो बाहर से पिकनिक मनाने आये हुए श्रृद्धालु थे उन्हें भी शायद समझ में आ गया | क्योंकि वे भी यहाँ आकर आँख खुलते ही चाय मांगते हैं, जैसे आश्रम में नहीं, किसी होटल में आये हुए हों |

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त्रिकुटआचल में भी ठाकुर के नाम पर लोग सर फुटव्वल कर रहे थे, लेकिन मूल में निजी स्वार्थ ही है | कल त्रिकुटाचल में चढ़ावा चढ़ना बंद हो जाए, तो इन संतमहंतों की श्रृद्धा भी खत्म हो जायेंगे | इनसे बड़ा त्यागी फिर कोई नजर नहीं आएगा | जैसे इस आश्रम की स्थिति थी | पहले कोई इस आश्रम में रुकना ही नहीं चाहता था क्योंकि कोई चढ़ावा नहीं चढ़ता था | चढ़ावा तो आज भी नहीं चढ़ता लेकिन अब कम से कम अपनी ही भूमि से इतनी इनकम हो जाती है कि कोई भूखा नहीं मरता | इसलिए अब उतना विराना नहीं है |

सारांश यह कि अपने अपने स्वार्थ के लिए लोग ईश्वर, संत-महंतों के नामों का दुरुपयोग करते हैं, वह ठीक नहीं है | राजनैतिक व साम्प्रदायिक पार्टियों और संगठनों की तो विवशता है, लेकिन कम से कम सामान्य जन तो ऐसा न करें | ~विशुद्ध चैतन्य

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