क्या वही युग वापस आप ला पाएंगे ?

हम सब विकास चाहते हैं…लेकिन विकास की सही परिभाषा ये पढ़े-लिखे, डिग्रीधारी, मैडल धारी नहीं जानते | जानेंगे भी कैसे ? गुलामी में जिए, पले-बढे, शिक्षा भी पायी तो गुलामी कैसे की जाए, अच्छे नौकर कैसे बना जाए वाली शिक्षा ही पायी | पैदा होते ही माँ-बाप को नौकर के रूप में देखा, नौकरी चली न जाए के डर से जीते हुए देखा, नौकरी को ही जीवन का उद्देश्य जाना, पैसे वालों, नीली-लाल बत्ती वाली गाड़ियों को भगवान् जाना…. तो विकास की परिभाषा इनकी केवल नोट कमाना, खरीदने की क्षमता बढ़ाना और अधिक खरीदना और अधिक खरीदना.. बस खरीदते जाना….

आइये हम चलते उस युग में जिसे हम स्वर्णयुग कहते हैं या चलिए और पीछे चलें हम जब छोटे-छोटे राज्य हुआ करते थे जिसमें एक राजा होता था, एक प्रधानमंत्री होता था, एक सेनापति होता था…… उस समय एक अच्छा राजा वह माना जाता था जो एक अच्छा योद्धा हो और शत्रुओं से राज्य की रक्षा करने, न्याय करने में समर्थ हो | उनके पास कोई अधिक काम होता नहीं था यदि युद्ध न हो रहा हो | तो वे शिकार पर निकल जाते थे या फिर नृत्यसंगीत का आनंद लेते थे | सब कुछ स्वतः व्यवस्थित रहता था… कोई उपद्रव करता था तो न्याय भी तुरंत मिल जाया करता था | कोई वकील, कोर्टफीस, आदि की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी |

जनता के अच्छे बुरे दिन भी प्रकृति ही तय करती थी | सूखा, अकाल पड़ा तो बुरे दिन और नहीं तो अच्छे दिन | कोई प्रदुषण नहीं था, स्वच्छ वायु, जल, वातावरण…. दिन भर खेती में व्यस्त शाम को नाच-गा कर थकान उतार लिया | युद्ध हुआ तो सारे नागरिक हथियारों के साथ सैनिक के रूप में खड़े हो गये | तब राज्य का हर पुरुष योद्धा होता था |

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लेकिन आज विकास का मतलब कंक्रीट के जंगल और प्राकृतिक जंगलों का विनाश है | बड़े बड़े भवनों को विकास कहा जाता है और उन बड़े भवनों में बने 2-3 बेडरूम के दडबों को मकान माना जाता है | एक बच्चा उस दड़बे में ही पैदा होता है और बड़ा होता है और उसे ही दुनिया मानता है | घुमने भी कभी निकले बाहर तो मेकडोनाल्ड्स, विम्पीज़, नरुलाज़…में घूम आये नहीं तो मॉल में घूम लिए | घर से बाहर निकलते ही खर्चे शुरू हो गये…और घर लौटने के बाद हिसाब लगाया जाता है कि आज कितना खर्च हो गया.. कहीं बजट तो नहीं गड़बड़ा गया… फिर क्रेडिट कार्ड हैं.. उधार लो और ब्याज चुकाओ… सारी उम्र इसी खरीद-फरोख्त में निकल जाती है और पता ही नहीं चलता कि जीवन क्या है और क्यों जिए हम |

मुट्ठी भर कुछ पूंजीपति और नेता पूरी दुनिया के मालिक बने हुए हैं और उनके इशारे पर हमारा उठना-बैठना सोना निर्भर है | हमारे देश में अरबों के हथियार खरीदे जाते हैं.. जिनका शायद ही कही कभी प्रयोग होना होता है… लेकिन परम्परा है इसलिए खरीदे जा रहे हैं | शहरों को अधिक से अधिक सुविधा सम्पन्न बनाना है ताकि अधिक से अधिक टैक्स और सुविधा शुल्क लिया जा सके | धीरे धीरे हम ऐसे चक्रव्यूह में फंस जाते हैं कि फिर बाहर निकलना असंभव हो जाता है | झूठी मुस्कान चिपकाए दूसरों को दिखाते हैं कि कितने खुश हैं हम, जबकि वास्तव में कर्जो के बोझ तले दबे हुए होते हैं | आज विकास का अर्थ हो गया कि कितने अधिक कर्जा किसके सर पर है | एक गरीब से कर्जा वसूली के लिए घर तक नीलाम करवा देते हैं लोग, वहीँ पूंजीपतियों के करोड़ों के कर्जे माफ़ हो जाते हैं | बैंक भी लिखकर दे देता है कि वसूली नहीं हो सकती…. और भूल जाते हैं फिर लोग | जबकि एक किसान दस हज़ार के कर्जे से मिल रही अपमान के चलते आत्महत्या कर लेता है |

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आज न शान्ति है न चैन है…पानी और जीवन के लिए कीमत चुकानी पड़ रही है | कुछ जो इस सृष्टि के इस सृष्टि के ईश्वर बने बैठे हैं और हमें सिखा रहे हैं कि विकास क्या ह
ोता है | क्या आपलोग इसे विकास मानते हैं ?

मैं नहीं मानता इसे विकास | आज हमारी प्राकृतिक संपदा का सर्वनाश करके… आप लोग तो विदेशो में सुरक्षित हो जाओगे… हमलोग कहाँ जायेंगे ? आज कह रहे हैं कि जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है इसलिए भूमिअधिग्रहण आवश्यक है… कल जब कोई भूमि ही नहीं बचेगी सभी बिक चुकी होगी तब हम कहाँ जायेंगे ? कल आप नौकरी कहाँ से लाओगे और कितनों को नौकरी दोगे | आजादी के बाद से लेकर आज तक वही एक नारा.. “गरीबी, बेरोजगारी…” मिटाने का लेकिन आज तक तो मिटी नहीं | गरीब और गरीब होते चले गए अमीर और अमीर होता चला गया… और आप कह रहे हैं कि विकास हो रहा है |

क्या वही युग वापस आप ला पाएंगे जब एक राजा होता था एक प्रधानमंत्री होता था एक सेनापति होता था… और जनता चैन से सोती थी… घरों में ताले भी नहीं पड़ते थे…. क्या वही युग लौटा पाएंगे जब ऐतिहासिक शिल्पकलाओं का निर्माण होता था, जब हर कोई एक दूसरे के काम आता था… क्या वही सब आप वापस ले आयेंगे ? क्या चिड़ियों को उनके जीने का अधिकार वन्यजीवों को जीने का अधिकार, मानवों को जीने का मूलभूत अधिकार आप दे पाएंगे ? ~विशुद्ध चैतन्य

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