…सबका उद्देश्य है तो क्या हर कोई अपने आप उस रास्ते पर आ जाता है ?


“चैतन्य जी, ये हमें कैसे पता चलेगा कि इस दुनिया में हम किस उद्देश्य के लिए आये हैं, जैसे की मै अपनी ही बात करता हूँ, मेरी पढाई मेरे ही काम नही आ रही..कोचिंग पढ़ाने के बहुत प्रयास किये..असफल रहा..और भी कोशिश की कोई जुगाड़ जम जाए,अलग अलग क्षेत्र में कोशिश भी,बात भी हुई पर कहीं बात बढ़ी नही,…सवाल घूमते रहता है करू क्या ? आगे बढ़ने का थोड़ा तो घर में दबाव रहता ही है लेकिन ऐसा लगता है भटक रहा हूँ, आपके कहे अनुसार, सबका उद्देश्य है तो क्या हर कोई अपने आप उस रास्ते पर आ जाता है ? इस प्रकृति को कुछ देने के लिए ! क्या आप दूसरों की मदद कर सकते है उनके लिए सही रास्ता और उद्देश्य ढूँढने में ?” –मंगल 

आपने जो प्रश्न किये हैं, आज अधिकांश युवाओं के मन में यही प्रश्न घूम रहे हैं और कभी मेरे भी दिमाग में यही प्रश्न हलचल मचा रहे थे | आपके सभी प्रश्नों का उत्तर आपके ही इस प्रश्न में छुपा है, “हम दुनिया में किस उद्देश्य से आये हैं ?”

हम दो कारणों से भटकते हैं | सबसे पहला कारण तो यह होता है कि माता-पिता व समाज जैसा चाहते थे वैसे चले, कभी सोचा ही नहीं कि हम क्यों आये और भविष्य में क्या करना है | किसी ने कहा इंजीनियरिंग कर लो, तो कर ली | किसी ने कहा कि कॉमर्स ले लो, तो ले लिया | किसी ने कहा कि एमबीए कर लो, तो कर लिया | लेकिन कभी अपनी अंतरात्मा की नहीं सुनी और न ही उससे कभी कोई सलाह लिया, दूसरों की सुनते चले गये और जीवन के चौराहे पर आकर उलझ गये… क्योंकि अब कोई मार्गदर्शक नहीं है | हमने अंतरात्मा को सुनने का कभी कोई अभ्यास किया ही नहीं, और जो योग्यता बचपन में थी अंतरात्मा को सुनने की, व पढ़ाई-लिखाई, रटने… में कब खो गयी वह पता ही नहीं चला |

अक्सर लोग कहते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों के शत्रु नहीं होते क्योंकि वे जो कुछ करते हैं, अपने बच्चों के भले के लिए ही करते हैं | लेकिन माता-पिता भी कोई आसमान से तो उतरे नहीं होते, होते तो इसी समाज के अंग हैं ! इसलिए अधिकांश माता-पिता भेड़चाल पर ही चलते हैं यानि पड़ोसी को देखकर, समाज को देखकर… उनको आपके गुणों को देखने समझने की कभी फुर्सत ही नहीं मिली | उन्होंने कभी जानना ही नहीं चाहा कि आपको क्या पसंद है और क्या नहीं और कभी पूछा भी तो मन रखने के लिए, लेकिन घुमा फिरा कर आपको वही करने के लिए विवश किया जो वे चाहते हैं, न कि वह जो आप चाहते हैं | यहाँ तक कि शादी विवाह पर भी बच्चों की पसंद कोई मायने नहीं रखती माता-पिता के लिए | ऐसा नहीं है कि सभी माता पिता ऐसे ही हों, कुछ बच्चो की किस्मत अच्छी होती है इसलिए उन्हें समझदार माता-पिता मिल जाते हैं |

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तो पहला कारण तो यह कि बचपन से ही दूसरों के दिशा निर्देशों में चलते रहने के कारण अपनी निर्णय लेने की क्षमता पर असर पड़ जाता है | हम यह तय नहीं कर पाते कि हमने जो निर्णय लिया है वह सही है या गलत, या फिर कई अपने निर्णयों से होने वाले परिणामों की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते | क्योंकि बचपन से जो भी किया वह दूसरों के निर्णयानुसार ही किया |

दूसरा प्रमुख कारण है हम दूसरों की तरह बनना या होना चाहते हैं | हम जो हैं और जैसे हैं, उसे हम वैसे ही नहीं स्वीकार पाते | हम दूसरों को देखते हैं, और सोचते हैं हम भी उन्हीं की तरह सफल हो जाएँ… फिर चाहे उस काम में हमारी रूचि हो या नहीं | हमने तो पढ़ाई भी की होती है तो शिक्षा पाने के लिए नहीं, बल्कि नौकरी और छोकरी पाने के लिए की होती है | बचपन से यही सिखाया गया कि बेटा पढ़ ले, अच्छी नौकरी मिल जाएगी और अच्छी नौकरी मिलेगी तभी अच्छी छोकरी मिलेगी…. तो बचपन गुजर गया नौकरी और छोकरी के लिए पढ़ते हुए और जब पढ़ाई पूरी हुई तो न नौकरी मिल पाती है और न ही छोकरी | तब बहुत गुस्सा आता है, तब बड़ी बेचैनी होती है… कुछ लोग इतने विचलित हो जाते हैं कि वे आत्महत्या तक कर लेते हैं | लेकिन वही समाज, वही परिवार, वही माता-पिता उसी प्रकार बेबस हो जाते हैं, जैसे लाटरी विक्रेता आपको गारंटी देकर टिकट बेचता है और जब आपका नम्बर नहीं लगता, तब वह कह देता है भाई आपकी किस्मत ही खराब है तो हम क्या कर सकते हैं | हमने तो आपको सबसे गारंटी वाला टिकट दिया था |

तो अब जो हो गया, सो हो गया, अब जाग जाओ | अपने भीतर झाँको और खोजो बचपन में जो बच्चा खो गया था उसे | अपनी योग्यताओं को दूसरों की नजर से नहीं, अपनी ही नजर से देखना शुरू करो | यदि कोई आज आपको ठुकरा रहा है, आपको अयोग्य कह रहा है, आपको इंटरव्यू में फेल कर रहा है इसलिए आप स्वयं को अयोग्य, बदकिस्मत मान रहे हैं, तो आप अपना नहीं, उस प्रकृति व ईश्वर का अपमान कर रहे हैं जिसने आपको रचा, जिसने आपको दुनिया में भेजा | आप पढ़े-लिखे हैं इसलिए आपको पता ही होगा कि सबसे पहली प्रतिस्पर्धा तो आपके शरीर ने तभी जीत लिया था जब कई लाख शुक्राणुओं के जीवन मरण के दौड़ में स्त्री के डिम्ब को भेदकर उसमें अधिकार प्राप्त की थी | फिर आप अयोग्य कैसे हो गये और ये दुनिया वाले होते कौन हैं आपको सफल असफल कहने वाले ? आप विजेता हैं कई लाख प्रतिस्पर्धियों में और इसका प्रमाण है आपका शरीर जो आपको प्राप्त है |

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किसी समय लता मंगेशकर को भी कोरस ग्रुप से बाहर कर दिया गया था क्योंकि उनकी आवाज बहुत महीन थी और जिसके कारण लता जी को बहुत अपमानित महसूस हुआ और बहुत रोयीं थी | लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और ऐसी पहचान बन गयीं आवाज की, कि फिर कोई उनके सामने नहीं टिक पाया | कभी अमिताभ को भी उनकी आवाज की वजह से ऑल इंडिया रेडियो ने फेल कर दिया था और बाद में उनकी आवाज का ऐसा जादू चला कि लोग ऑल इण्डिया रेडियो भूल गये, लेकिन अमिताभ को नहीं भूले | कभी सलमान को एक डायरेक्टर ने अपने चपरासी से कहकर धक्के देकर बाहर निकाल दिया था, आज सलमान के पीछे डायरेक्टर लाइन लगाये बैठे हैं | कभी एडिसन को मंदबुद्धि माना गया और बाद में उसी की दिए हुए बल्ब के प्रकाश में पढकर लोग इंजिनियर और डॉक्टर बन रहे हैं |

तो अधिकांश युवा इसलिए नहीं भटक रहे हैं क्योंकि उनमे कोई योग्यता नहीं है, बल्कि इसलिए भटक रहे हैं क्योंकि उनकी अपनी योग्यता का उन्हें कोई ज्ञान नहीं है | दूसरों के द्वारा तय की गयी योग्यता जो कि मार्कशीट पर आधारित होती है, जो कि डिग्रियों और सर्टिफिकेट पर आधारित होती है, उसे वे अपनी योग्यता मानकर जी रहे हैं | जबकि ये सभी योग्यता थोपी गयी योग्यता है, आपकी अपनी मौलिक योग्यता नहीं है | कोई दूसरा आपको नम्बर देकर योग्य और अयोग्य घोषित कर देता है और आप मान लेते हैं, यही सबसे बड़ी समस्या है | आप अयोग्य घोषित हुए क्योंकि आप गलत जगह लाइन लगा रखे थे | जैसे कि अमिताभ एक्टर बनने के लिए दुनिया में आये थे और एनाउंसर की लाइन पर लगे थे | जैसे कि लता जी सोलो सिंगर बनने दुनिया में आईं थी और कोरस ग्रुप की भीड़ में खड़ी थीं… तो गलती उनकी नहीं है जो आपको फेल कर रहे हैं, गलती यह है कि आप स्वयं की योग्यता को नहीं समझ रहे हैं | इसीलिए भटक रहे हैं |

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अब प्रश्न खड़ा होता है कि हम स्वयं को कैसे खोजें ?

बहुत आसान है…अनपढ़ हो जाइए ! जो दुनिया ने पढ़ाया सिखाया वह सब भूल जाइए और सनातनी हो जाइए | यानि केवल अंतर्मन को सुनिए और दुनिया क्या कहती है उस पर ध्यान मत दीजिये… जैसे कि एडिसन ने किया | अपने भीतर झाँकिये, हो सकता है आपके भीतर कोई संगीतकार छुपा बैठा हो, हो सकता है, आपके भीतर कोई चित्रकार छुपा बैठा हो….. अपनी रुचियों पर ध्यान दीजिये, उन्हें निखारिये…. और उनसे सम्बंधित फील्ड पर प्रतिस्पर्धा के लिए उतर पड़िए | मान लीजिये आपकी चित्रकारी बहुत अच्छी है, तो आप एडवरटाइजिंग एजेंसी में नौकरी खोजिये, या ऐसे क्षेत्रों में नौकरी खोजिये जिसमें चित्रकारी, रेखाचित्रों के कलाकारों की आवश्यकता रहती है | इसी प्रकार जो भी आपकी रूचि है उसपर ध्यान केन्द्रित कीजिये और उसी से जुड़े फील्ड पर भाग्य आजमाइए | या फिर कोई ऐसा कार्य करें, जिससे आपका शौक भी पूरा होता हो और वही रोजगार का जरिया भी बनता हो, जैसे बाँसुरी वादन, पियानो वादन, खाना बनाना यानि शैफ का काम…. |

हर रात सोते समय आपके अंतिम विचार यही होने चाहिए, “सुबह जब मैं सोकर उठूँगा तब मैं वही नहीं रहूँगा जो आज था, बल्कि पूर्णतया नया व्यक्ति होऊंगा | मैं उत्साह से भरा हुआ उठूँगा और नयी चुनौतियों का सामना करने के लिए पुर्णतः समर्थ होऊंगा | मैं दूसरों पर निर्भर नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर व्यक्ति हूँ और यह बात दुनिया चाहे न जानती हो, परन्तु मेरी आत्मा जानती है | जो मेरा है और मैं जिसके योग्य हूँ वह मुझे अवश्य मिलेगा | अब मैं स्वयं को हर प्रकार से चिंता मुक्त करता हूँ और मैं अब गहरी नींद में जा रहा हूँ |”

बस यही सब दोहराते रहें और थोड़ी ही देर में आप गहरी नींद में चले जायेंगे | जब सोकर उठेंगे आप तब सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियों को रगड़े और फिर उन हथेलियों से अपनी आँखों को सेंक दें | ऐसा कम से कम तीन बार करें | फिर धीरे धीरे ऑंखें खोलें | अपने सर को दायें बाएं घुमाएं और फिर दोनों हाथों को जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद् दें और आभार प्रकट करके बताएं कि आपको आज बहुत ही अच्छी नींद आई | बस यही क्रम अपनी रोज की दिनचर्या में शामिल कर लीजिये |

एक हफ्ते बाद मुझे बताइये आपका अनुभव | ~विशुद्ध चैतन्य

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