प्राचीन ऋषि-मुनि और कर्मकांडी पुरोहितों में बहुत अंतर था

पृथ्वी को विष्णु ने समुद्र से बाहर निकाला…. यह किसी भी पढ़े-लिखे की समझ से बाहर है | पृथ्वी में ही समुद्र है तो पृथ्वी को समुद्र से बाहर कैसे निकाला जा सकता है ?

धर्मों के ठेकेदार भी चूँकि पढ़े-लिखे ही होते हैं और अधिकाँश तो रट्टू तोते ही होते हैं तो वे ऐसे विषयों पर स्थिति को स्पष्ट करने के स्थान पर गाली-गलौज करने लगते हैं या हिन्दू धर्म खतरे में है का शोर मचाने लगते हैं ताकि कोई उन पर यह आरोप न लगा दे कि उसे कुछ पता नहीं है |

प्राचीन ऋषि-मुनि और कर्मकांडी पुरोहितों में बहुत अंतर था | ऋषि-मुनि प्रयोग करते थे और वे पंडितों और वर्तमान धर्मों के ठेकेदारों की तरह किसी पर कुछ थोपते नहीं थे और न ही किसी मत या मान्यताओं का विरोध या निंदा करते थे | वे सभी के प्रति उदारता रखते थे और स्वयं समझते थे, प्रयोग करके देखते थे और फिर जो सार्थक होते थे उन्हें वे कथाओं और काव्यों में आम जन तक पहुँचाते थे | इस प्रकार वे जन सामान्य तक अपनी बात पहुंचाने में सफल होते थे और लोगों को याद रखने में भी कठिनाई नहीं होती थी |
वहीँ पंडित-पुरोहित कंठस्थ करने में विशेषज्ञता रखते थे और सारा ज्ञान कंठ तक ही सीमित रखते थे | वे कभी कोई प्रयोग नहीं करते थे और न ही कभी जानने का प्रयास करते थे कि जो कुछ लिखा है उसमें कोई सन्देश छुपा है या नहीं | यही कारण है कि आज भी पंडितों और धर्म के ठेकेदारों के पास सिवाय पूर्वजों द्वारा किये गये प्रयोगों के अलावा और कुछ भी नहीं है सुनाने के लिए | वे यह नहीं कह पाते कि इतनी शक्ति है हमारे मन्त्रों में यह देखिये हम प्रयोग करके आपको दिखाते हैं | वे यह नहीं कह पाते कि पुष्पक विमान बनाने की विधि है हमारे पुराणों में आइये अपने देश के लिए हम पुष्पक विमान बनाएं | वे कह नहीं पाते कि तांत्रिक विधियों से हम शत्रुओं का नाश कर सकते हैं आइये हम आतंकवादियों का नाश करें | वे कह नहीं पाते कि विश्वशांति यज्ञ से विश्व में शान्ति हो जाती है, आइये हम विश्वशांति यज्ञ करके विश्व में शांति स्थापित करें | वे कह नहीं पाते कि फलां मंत्र से धन प्राप्ति हो सकती है तो आईये हम पीड़ित किसानो के लिए मंत्रोच्चार करके उन्हें धनि बनाएं…… क्योंकि कंठस्थ करना और समझना दो अलग अलग बातें हैं | कंठस्थ तो एक बच्चा भी कर लेता है गायत्री मंत्र लेकिन अर्थ उसे पता चलता है आधी उम्र गुजर जाने के बाद |

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पुराणों में जितनी भी कहानियाँ लिखी गयीं हैं वे वास्तविकता से परे दिखती हैं और हैं भी इसमें कोई संदेह नहीं हैं | लेकिन वे वास्तविकता पर ही आधारित होती थी जैसे कि आजकल की फिल्में | आज की फिल्मों को कोई आज से पाँच हज़ार साल बाद देखेगा तो वह भी उसी प्रकार मजाक उडाएगा जैसे कि आज पढ़े-लिखे लोग पुराणों की कहानियों का मजाक उड़ाते हैं |

पृथ्वी का सागर में डूब जाना, विष्णु का वराहअवतार, राक्षस से युद्ध… यह सब सांकेतिक हैं किसी फिल्म की तरह | इस कहानी को वर्तमान में इस प्रकार से समझा जा सकता है कि पृथ्वी है मानव जाती, पर्यावरण | विष्णु हैं विवेक, सागर है कामनाएं, लालसा और राक्षस हैं संघी-बजरंगी, आइसिस-अलकायदा, अमेरिका, भ्रष्ट और बिकाऊ नेता और मीडिया |

अपने विवेक यानि विष्णु को वराह (सूअर) का अवतार बनाना यानि सूअर की तरह मोटी चमड़ी वाला और राजनैतिक समाजिक कीचड़ में भी जीवन निर्वाह कर सकने की योग्यता विकसित करना, सूअर की तरह ही शान्त व धैर्यवान होना, बड़े बड़े नुकीले दांतों यानि आत्मरक्षा के संसाधनों से युक्त होकर मानवजाति व पर्यावरण को नफरत के बीज बोने वाले और मानवजाति के शत्रुओं द्वारा दिखाए जा रहे भय, और दिए जा रहे लोभ से मुक्त कराकर सुरक्षित कर
ना |

कई हज़ार वर्ष पहले ही यह सब समझा गए थे ऋषि मुनि क्योंकि उनको विश्वास था कि जब ऐसी परिस्थिति आएगी तब तक मानव इतना समझदार हो चुका होगा कि इन कथाओं में छुपे सन्देश को समझ जाएगा | और हो सकता है कि तब भी ऐसा ही कुछ होता रहा हो और वे इन कथाओं से जनता को सन्देश देते रहे हों | लेकिन चूँकि हम अब अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं और अंग्रेजी बोलते हैं इसलिए समझ नहीं पाते |

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यह और बात है कि अंग्रेज हमारे ही पुराणों और कथाओं को पढ़कर कई आविष्कार कर चुके हैं | क्योंकि वे विश्वास करने से पहले समझने का पूरा प्रयास करते हैं यह मानकर कि जो कहा जा रहा है उमें कोई सन्देश छुपा हो सकता है | ~विशुद्ध चैतन्य

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