न जाने क्यों जिस केजरीवाल को मैं नौटंकीबाज कहता था उसके जीतने पर ऐसा लगा कि….


मेरे अपने राज्य में चुनाव कब शुरू हुआ और कब ख़त्म हुआ मुझे पता ही नहीं चला | कौन मुख्यमंत्री बना और किस पार्टी का बना वह भी मुझे अभी तक नहीं पता और न ही मेरी कोई रूचि रही जानने में | क्योंकि किसी भी पार्टी के जीतने या हारने से मेरे आश्रम या मेरे गाँव में कोई फर्क नहीं पड़ता | और मुझे तो बिलकुल भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि न तो सरकार मेरा खर्चा देती है और न ही सरकार भूमाफियाओं से मेरे आश्रम की जमीन सुरक्षित करवाती है | मुझे तो व्यासायिक वकीलों और न्यायालयों के चक्कर लगाने ही हैं और न्याय खरीदने लायक पैसा होगा तो खरीद भी लेंगे एक दिन लेकिन तब तक तो खुद ही निपटना इन भूमाफियाओं और रिश्वतखोर अधिकारीयों और विभागों से | आखिर हैं तो सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे बस अलग अलग पार्टी या नेता के रूप में लोगों को बहकाते हैं और बाद में सभी एक हो जाते हैं | झारखण्ड हमेशा अपराधियों और रिश्वतखोरों का गढ़ रहा और आगे भी रहेगा क्योंकि सत्ता राज्य का विकास के लिए नहीं, बल्कि व्यवसाय करने के लिए चाहिए होता है इनको | आप आरटीआई डालें या कोई और शिकायत दें, सभी रद्दी में फेंक दी जाती है यहाँ और फिर पूछने वाला भी कोई नहीं होता |
खैर यह सब तो पारम्परिक राजनीती और प्रशासन है और आदिकाल से इसी को राजनीती कहा और माना जाता रहा है | कांग्रेस भी इसी राजनीति के कारण वर्षों टिकी रही और बाकी पार्टियाँ भी टिकी हुईं हैं…… एक दलित मुख्यमंत्री बनता है और पाँच साल बाद ग्यारह सौ करोड़ से अधिक की सम्पत्ति का मालिक हो जाता है लेकिन ग्रामीण पहले से भी बदहाल हो जाते हैं…..

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लेकिन न जाने क्यों जिस केजरीवाल को मैं नौटंकीबाज कहता था उसके जीतने पर ऐसा लगा कि धर्म के ठेकेदारों को किसी ने करारा तमाचा मारा है | ऐसा लगा कि ज़हर उगलने वाले और नफरत की राजनीति करने वालों को दिल्ली की जनता ने सबक सिखा दिया | लगा कि अचानक से दिल्ली आध्यात्मिक हो गयी और सम्प्रदाय और जाति की राजनीति से उपर उठकर नैतिकराज के लिए वोट कर दिया | यह जानकर ख़ुशी हुई कि पूरी दिल्ली आपसी मतभेद भुलाकर एक हो गयी….. यही देखना चाहता हूँ एक दिन पूरे देश में |

परिणाम कुछ भी हो… हो सकता है कि केजरीवाल भी मोदी की तरह केवल भाषणबाजी और बड़े बड़े वादे करने के माहिर हों और बाद में मुकर भी जाएँ | हो सकता है कि जिस प्रकार एफडीआई और महँगाई की विरोधी बीजेपी सत्ता जीतने के बाद कांग्रेसी नीति पर चल पड़ी और एफडीआई और महँगाई अच्छे हैं कहने लगी….. वैसे ही केजरीवाल भी पलट जाएँ | हो सकता है केजरीवाल मोदी की तरह किसानों को आत्महत्या करता छोड़ विदेश में मार्केटिंग करने के लिए निकल जाए और भारत को राष्ट्र के रूप में नहीं बाजार के रूप में प्रस्तुत करें विदेशों में और कहें कि मैं भी व्यापारी हूँ…… और धंधा करने के लिए ही सत्ता में आया हूँ |

कुछ भी हो सकता है लेकिन दिल्ली ने एक दांव खेला है सबकुछ दांव पर लगाकर | एक नौसिखिये को सत्ता सौंप दी वह पूरे पाँच साल के लिए खुले दिल से | खुले दिल तो भाजपा को भी सौंपा गया था देश लेकिन भाजपा तो घरवापसी और धर्मपरिवर्तन करवाने में लग गयी, विकास वगैरह तो जुमला मात्र रह गया |

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आज मैंने देखा केजरीवाल का वह रूप जो देखना चाहता था कभी अपने देश केनेताओं में | आज मैं दूसरी बार केजरीवाल का पूरा राजतिलक आयोजन लाइव देखा टीवी पर | आज मैंने पूरा भाषण सुना…. और मुझे लगा कि शायद एक वास्तविक नेता दिल्ली को मिल गया है | आज लगा कि शायद राजनैतिक नेता से अलग वह नेता जिसमें नैतिकता हो, जो लिए गए शपथ के अर्थ को समझने के स
ाथ साथ व्यवहार में भी ला सकता हो, दिल्ली को मिल गया | और हो सकता है कि दिल्ली ने धोखा खाया हो.. लेकिन खानदानी पार्टियों और नेताओं से बार बार धोखा खाने से तो यह धोखा खाना अधिक सार्थक है | ~विशुद्ध चैतन्य

केजरीवाल का भाषण यदि आप चूक गयें हों तो एक बार फिर सुन लीजिये….

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