धार्मिक होने का भ्रम

एक ओर हैं आध्यात्मिक गुरु और एक ओर हैं सांप्रदायिक गुरु और दोनों के बीच में हैं वे भ्रमित सांसारिक लोग जो धार्मिकता के भ्रम में जी रहें हैं | आधा जीवन यह सोचते हुए निकल जाता है की पहले कुछ कर लें फिर आध्यत्मिक हो जायेंगे और आधे लोग आध्यात्मिक जीवन त्याग कर सांसारिक सुखों को भोगना चाहते हैं | परिणाम होता है कि जीवन उलझ जाता है और एक द्वंद चलता रहता है जीवन भर कि हम सही हैं या नहीं | मृत्यु के निकट आते ही और शरीर जब अपनी सारी उर्जा व शक्ति खो देता है तब भौतिकता में फंसे लोग भजन कीर्तन और तीर्थ करके अपने पापों का प्रायश्चित कर रहें होते हैं | वहीँ अध्यात्म के नाम पर भौतिक सुखों से वंचित हुए लोग व्यभिचार और अनैतिक कार्यो में लिप्त हो जाते हैं |

आध्यात्मिक गुरु कहते हैं की भौतिक संसाधनों का त्याग कर दो तभी आध्यात्मिक उत्थान संभव है और सांप्रदायिक गुरु कहता है की आध्यात्मिकता एक पाखंड है और इसको त्याग कर हमारे बाड़े में आ जाओ तभी तुम ऊँचाई पर पहुँच सकते हो | सांप्रदायिक गुरु धर्म के नाम पर रंग-बिरंगे बाड़े बना रखें हैं और साम-दाम-दंड-भेद अपना कर लोगों को धार्मिकता के रंगीन कम्बलों में ढँक कर अपने अपने बाड़ों में हाँक रहें हैं | और ये लोग सफल केवल इसलिए हो रहे हैं क्योंकि हर कोई डरा हुआ है | और कितनी अजीब बात है कि जिस स्वर्ग और जन्नत का लालच देते हैं, वहाँ भी वही सब है जो इस पृथ्वी में है | मतलब शरीर छोड़ने के बाद भी सुर, सूरा और सुंदरी का भोग कर सकेंगे जो इनके बनाए बाड़े में आ जाए तो, वरना नरक या दोजख मिलेगा और वहाँ भी वही सब यातनाएं होंगी जो कि केवल भौतिक शरीर को दी जा सकती हैं | यही कारण कि अध्यात्म एक मजाक बन गया जबकि आध्यात्मिक जगत और भौतिक जगत में समन्वय ही वास्तविक ब्रम्ह है | मेरी दृष्टि से भौतिक और अध्यात्मिक दो महत्वपूर्ण शक्तियों को एक दूसरे के विरोधी शक्तियों के रूप में देखना स्वयं को धोखा देने वाली बात है |

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मैंने सांसारिक भोग-विलास का जीवन और आध्यात्मिक अकर्मण्यता का जीवन दोनों का पूर्णता से अनुभव लेने के बाद जाना कि संतुलन ही अध्यात्मिक ज्ञान है और संतुलित व्यक्ति ही धार्मिक हो सकता है | धार्मिक होने के लिए स्वयं का मनोबल सशक्त व स्थिर होना आवश्यक है | धार्मिकता वह नहीं जो हम अपने चारों ओर देख रहें हैं, वे सभी साम्प्रदायिकता है | एक अभियान है अपने अपने संप्रदाय को विस्तार देने का; चाहे हिंदुत्व कहें या इस्लाम कहें या भक्ति मार्ग कहें या साँई या बाबा मंडली | सभी एक ग्रुप है, संगठन है, सम्प्रदाय है | आध्यात्मिकता से इनका कोई लेना देना नहीं है | इसे इस तरह से भी समझ सकते हैं की एक वकील है, एक डॉक्टर है और एक सैनिक है | तीनों के भेष-भूषा में अंतर है उनके अपने अपने कायदे कानून हैं, अपने सिद्धांत हैं और अपने ही कार्य करने की शैली व योग्यताएँ हैं | लेकिन यदि ये लोग आपस में कपड़े बदल लें तो इनका गुण-धर्म व सिद्धांत नहीं बदल जायेंगे | वकील डॉक्टर नहीं हो जाएगा और डॉक्टर सैनिंक नहीं बन जायेगा जब कर्म क्षेत्र पर पहुँचेंगे ये लोग | ठीक इसी प्रकार आपका हिन्दू होना, मुस्लिम होना भी केवल वह ड्रेस है जिससे आप पहचाने जाते हैं की आप किस सम्प्रदाय के हैं, लेकिन भ्रमवश हम इसे धर्म मान बैठे हैं | धर्म तो शाश्वत व सनातन है, वह संस्कारों के रूप  में अपना प्रभाव दिखाएगा ही चाहे कितने ही रूप बदल लें आप |

धर्म अद्वैत पर आधारित है, जबकि संप्रदाय द्वैत पर आधा
रित है | धर्म हारमनी क्रियेट करता है दूसरे व्यक्ति को भी अपने शरीर का एक अभिन्न सहयोगी अंग के रूप में स्वीकार करता है, जहाँ लय, गति, रोमांच, सुख समर्पण व पूर्णता एक ही समय में उपलब्ध हो जाता है | जबकि सम्प्रदाय वैमनस्यता व दूसरों से स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने में ही सारी उर्जा लगाता है और वह सब खो देता है जो धर्म से हमें प्राप्त होता है |

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मैं यहाँ एक विडियो दे रहा रहा हूँ उसे एकाग्र होकर देखिये और आपको सिर्फ देखना है, समझने या अर्थ निकालने के चक्कर में मत पड़ियेगा नहीं तो आप खो देंगे उस अभूतपूर्व अनुभव को | क्योंकि आप समझने के लिए उस दिमाग का प्रयोग करेंगे जो आपका नहीं है, वह समाज का सिखाया पढ़ाया हुआ है | उसमें आपका कुछ नहीं है, वही है जो समाज में आपने देखा और अनुभव किया लेकिन वह आपका अनुभव नहीं है | आपका अनुभव वह है जो आपने पूर्वजन्म और इस जन्म के बीच के अवकाश में मनन करके जाना | -विशुद्ध चैतन्य

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