ये पढ़े-लिखे तो गुलाम मानसिकता के होते हैं और डिग्री मिलते ही खुद को अंग्रेज समझ लेते हैं |

एक समाचार पढ़ा,

जी बप्पूदुरई जो 1999 में 12वीं में एक विषय में फेल हो गए थे। बिना 12वीं पास किए ही उन्होंने अलगप्पा यूनिवर्सिटी के डिस्टेंस प्रोग्राम के तहत बैचलर्स डिग्री कोर्स जॉइन कर लिया। 2010 में उन्हें इतिहास में बीए की डिग्री मिल गई। इसके बाद वह मार्च 2010 में 12वीं के अरीर पेपर (बाकी पेपर) के लिए परीक्षा दी और इसमें पास हो गए। इसके बाद उन्होंने त्रिनुलवेली गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से 2010 में तीन साल की लॉ डिग्री का कोर्स जॉइन किया और 2013 में इसे पूरा कर लिया।

जस्टिस रामसुब्रमण्यन ने कहा कि क्योंकि याचिकाकर्ता ने अपने स्कूल और कॉलेज के सर्टिफिकेट्स नॉर्मल क्रम में हासिल नहीं किए हैं, इसलिए वह लीगल एजूकेशन 2008 के रूल 5 को पूरा नहीं करते और इसलिए वह एक एडवोकेट के रूप में नामांकन के लिए डिग्री का उपयोग करने के हकदार नहीं है

उपरोक्त घटना यह सिद्ध करती है…
कि शिक्षा और डिग्री में अंतर होता है | एक सिस्टम होता है डिग्री पाने के लिए और उस सिस्टम के अंतर्गत ही डिग्री मिलती है और वही मान्य है | यदि आपकी योग्यता किसी डिग्री धारी से अधिक होगी तो भी आपको शिक्षित नहीं माना जाएगा | इसका परिणाम यह हुआ कि डिग्री का उपयोग नौकरी तक ही सीमित रह गया और अब होनहार होने का अर्थ केवल सिस्टम को फ़ॉलो करने की योग्यता ही रह गयी है और मौलिकता का महत्व घट गया है |

एकलब्य आज भी बलिदान दे रहा है कहीं न कहीं क्योंकि उसने द्रोण से विधिवित शिक्षा नहीं ली थी क्योंकि वह सिस्टम को फ़ॉलो नहीं कर पाया… तो क्या हुआ वह अर्जुन के समकक्ष प्रतिभाशाली हुआ…?

READ  वे जीव जिनके पास न तो कोई डिग्री है, न ही कोई धर्मशास्त्रों का ज्ञान

शायद अब एकलव्यों की खोज शुरू करके उन्हें सम्मानित करने का समय आ गया ताकि भारत को फिर से राष्ट्र को समर्पित युवा मिल जाएँ क्योकि ये पढ़े-लिखे तो गुलाम मानसिकता के होते हैं और डिग्री मिलते ही खुद को अंग्रेज समझ लेते हैं |

आज जब ग्रामीणों की भीड़ बार बार कहने के बाद भी नहीं बैठ रही थी और मेरे भी बार बार कहने पर पहले अपना नाम लिखवाने के लिए टेबल पर पिल पड़े तो मास्टरजी उठकर खड़े हो गये और बोले कि… ये गाँव वाले ऐसे ही होते हैं.. अक्ल नहीं होती इनको…

मैंने उसकी शक्ल देखी और मन किया कि कहूँ कि तुम क्या विलायत से आये हो ? अपने ही गाँव वालों के लिय ऐसा कह रहे हो ?…. लेकिन चुप रह गया… मैं जानता हूँ कि उसकी डिग्री और उसकी शिक्षा में बहुत अंतर है | संगीत विशारद वह मास्टर सरगम तक सुर में नहीं बोल पाता | हमारे देश में डिग्रीधारी अर्थशास्त्री सत्ता में रहे, लेकिन अर्थ व्यवस्था का बेडागर्क कर दिया | इन डिग्रियों और डिग्रीधारियों ने बेड़ा कर दिया मेरे देश का | इनसे अच्छी तो हमारे गाँव की महिलायें ही हैं जो थोड़े से पैसों में ही पूरे परिवार को सम्हाल लेती हैं और बच्चों को पढ़ा लिखा लेती हैं, बेटियों की शादी के लिए भी पैसे जोड़ लेती हैं |

कुछ औरतें मेरे पास अलग से आयीं यह बताने के लिए उनकी चार-चार बच्चियाँ हैं शादी लायक | एक दो बेटी को ही इंटर तक पढ़ा पायीं हैं और पढ़ाने के लिए पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया तो छुड़वा दिया पढ़ाई | कोई पैर पकड़ रही थी तो कोई हाथ जोड़ रही थी.. मैं सोच रहा था कि ईश्वर न जाने मुझे यहाँ क्यों लेकर आ गया… मैं न तो धन्ना सेठ हूँ और न ही किसी राजनैतिक पार्टी से सम्बंधित | लेकिन भीतर कोई कहता है कि यही तुम्हारी हरामखोरी की सजा है कि इनके लिए कुछ करो | क्योंकि पढ़े-लिखों के बस का नहीं है इनके लिए कुछ कर पाना | इनका भला तो कोई अनपढ़ ही कर सकता है |

READ  न जाने क्यों जिस केजरीवाल को मैं नौटंकीबाज कहता था उसके जीतने पर ऐसा लगा कि....

मेरी अनपढ़ बुद्धि कहती है कि सरकार और अधिकारियों के हाथ पैर जोड़ने के स्थान पर ग्रामीणों
को आपस में जोड़ना होगा ताकि वे एक दूसरे के सहयोगी हो पायें | ~विशुद्ध चैतन्य

लेख से सम्बन्धित आपके विचार

avatar
  Subscribe  
Notify of